अब काहे के अच्छे दिन

अब काहे के अच्छे दिन
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'अच्छे दिन आने वाले हैं' गीत सुन-सुन कर हम बड़े खुश थे कि चलो हमारे अच्छे दिन और भी अच्छे होने वाले हैं। इस गीत को सुनते-गाते पूरा एक साल बीत गया किन्तु अच्छे दिन हमारे अच्छे दिनों से बदतर निकले। अब साहब! अपने एक साल पहले के अच्छे दिनों की हम अपने किस मुँह से तारीफ करें, समझ नहीं आ रहा है। इधर एक साल में किसी और के अच्छे दिन आये हों या न आये हों पर हमारे विगत दस सालों से चले आ रहे अच्छे दिनों की जरूर वाट लग गई है। इस एक साल में हमारी क्या गत बनी पूछो नहीं। पैट्रोल, डीजल, रसोई गैस तो आये दिन गला दबाने लगे, मँहगे हो-होकर दाल, सब्जी, आटा, तेल ने भी छठी का दूध याद दिला दिया। आप लोग मानोगे नहीं हमारी बात का विश्वास, क्योंकि आप ठहरे भक्त सो अपनी भक्तई दिखाएँगे फिर भी हम बताए देते हैं, मानना न मानना आपकी मर्जी। 'अच्छे दिन आने वाले हैं' गीत बजने के पहले का हमारा जो अच्छा समय था, वाह-वाह! क्या दिन थे। पैट्रोल, डीजल की कीमतों की कोई चिन्ता ही नहीं थी। मौनी बाबा की कृपा से पैट्रोल पम्प का मालिक खुद आकर सारी गाड़ियाँ ले जाता, घनघोर मुफ्त पैट्रोल डालकर वापस घर खड़ी कर जाता। विश्वास नहीं हुआ न? अरे! रसोई गैस की स्थिति तो ये कि रोज सिलेंडर भरवाओ और हर भरवाई पर वापस नकद सब्सिडी ऊपर से पाओ। दाल, सब्जी, भाजी, तेल की तो मानो नदियाँ बह रही थी चारों ओर। उन दसवर्षीय अच्छे दिनों ने गणित पक्की कर दी थी। जहाँ तक गिनती सोच भी न सके थे, वहाँ तक की संख्या याद करवा दी गई थी, घोटाले कर-करके। अब तरस रहे हैं संख्याबल को। ये अच्छे दिन वाले निवेश के नाम पर गणित पटक रहे हैं तो इससे हमें क्या। विदेशी पैसा विदेशी लाभ ले जायेंगे, हमारे अच्छे दिन कैसे आयेंगे? अब पछता रहे हैं कि काहे इन 'अच्छे दिन आने वाले हैं' गाने वालों को बुलाया। अब सामान खरीदो तो रकम चुकाकर, लोगों के काम करो तो बिना रकम पाकर, खबरें पढ़ो तो विकास की। अब न पड़ोसी देशों से जुतियाये जा रहे हैं न किसी विदेशी ताकत की घुड़की खा रहे हैं, समूचा थ्रिल समाप्त करके रख दिया इन अच्छे दिनों ने। हमारे तो वही दससाला दिन अच्छे थे, मौनीबाबा की मौन तपस्या, मम्मी की बयानबाजी, बाबा की बिलावजह नौटंकी, जीजा की खातिरदारी, डॉगी सिंह की चापलूस खौं-खौं आदि से दिन भयंकर वाले अच्छे लग रहे थे। अब सब शांत है, खामोश है, कहीं ये भी अच्छे दिन होते हैं? चलो जी, सामान ले आएँ बाजार से, अब न कोई मौनी है, न कोई मम्मी है, न कोई बाबा है.... अब कोई कुछ भी मुफ्त न देगा, न पानी, न बिजली, न लैपटॉप, न वाईफाई... सबका मूल्य चुकाओ। धत तेरी! फिर काहे के अब अच्छे दिन?


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उक्त व्यंग्य जनसंदेश टाइम्स, दिनांक - 29-05-2015 के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया