मृग मारीचिका का शिकार हैं नेता जी


मृग मारीचिका का शिकार हैं नेता जी
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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नेता जी भटकाव की स्थिति में हैं या कहें कि दिग्भ्रमित से हैं. कुछ भी समझ नहीं पा रहे हैं कि करना क्या है? कैसे करना है? कब करना है? दिग्भ्रम की स्थिति इतनी विकट है कि करना कुछ चाहते हैं और कर कुछ जाते हैं. अपने इस दिग्भ्रम से न केवल वे परेशान हैं बल्कि अपने आसपास वालों को भी परेशान किये हैं. कभी गाड़ी से चल देते हैं तो कभी पद-यात्रा का की घोषणा करने लग जाते हैं; कभी दिन-रात एक करते हुए जनता जनार्दन के बीच घुसे रहते हैं तो कभी अचानक महीनों के हिसाब से गायब हो जाते हैं; कभी बड़ी-बड़ी पार्टियों की रौनक बनते हैं तो कभी मूड आते ही किसी भी गरीब की रोटी खाने पहुँच जाते हैं; कभी मजदूर के साथ खड़े होकर तसला भर-भर मिट्टी डालते हैं तो कभी खुद को किसान का हमदर्द बताने लगते हैं. इतना सब करने के बाद भी उनकी बात को कोई गंभीरता से नहीं लेता है. इसके पीछे शायद नेता जी का खुद का गंभीर न होना भी है. चूँकि राजनीति करना नेता जी का पारिवारिक शौक रहा है, इस कारण से भी नेता जी पूरी गंभीरता तो दर्शाते हैं किन्तु हास्यबोध का शिकार हो जाते हैं. लोग भी इस बात को समझते हैं कि नेता जी के परिवार ने लम्बे समय तक सत्ता सुख भोग है और खुद नेता जी ने भी जन्मते ही अपने आसपास जी-हुजूरी करने वालों की एक लम्बी फ़ौज देखी है; ‘पेटीकोट सरकार’ जैसे देशज से लेकर ‘किचेन कैबिनेट’ जैसे भयंकर शालीन शब्दों का पालन करने वालों को अपनी आज्ञा का पालन करते देखा है, इसके अलावा नेता जी जहाँ-जहाँ गए वहाँ-वहाँ भी सत्ता से दूर हो गए, ऐसे में नेता जी का व्यथित सा घूमना लाजिमी है. लोगों की उनके प्रति सहानुभूति भी है मगर सिर्फ बातों की, वोट की नहीं. नेता जी भी आये दिन चौराहों पर लोगों को रोक-रोक कर अपने नक़ल किये भाषण की पेलमपेल मचा देते हैं. व्यथितपन तथा दिग्भ्रम की स्थिति में वे कुरते की बाँह चढ़ा-चढ़ा कर बाकी दलों को, नेताओं को गरियाने लग जाते हैं. एक दिन तो वे यहाँ तक कह बैठे कि वे और उनकी पार्टी सत्ता से बाहर इस कारण हुए क्योंकि सत्ता मद में वे किसानों, मजदूरों, आम जनता के पास पहुँच नहीं पा रहे थे. अब सत्ताधारी हैं नहीं सो फुल्ली फालतू, बस निकल जाते हैं दौरे को. ऐसे में किसी ने उनके पहनावे की बात छेड़ दी तो वे चट से चिल्ला दिए कि अब तो सूट-बूट चोर भी पहनते हैं, हम असल खादीधारी परिवार के हैं इस कारण सिर्फ और सिर्फ खादी का कुरता-पाजामा धारण करते हैं. इधर नेता जी जोश में दिख रहे हैं, कई-कई मुद्दों को अपनी झोली में समेत लेने का दम भरने वाले नेता जी अबकी पवित्र नगरी से पदयात्रा करने की सनक बना चुके हैं. आखिर हनक तो बनाये रखी न जा सकी शायद सनक से ही काम चल जाए, ऐसा सोचकर नेता जी भले ही निकल रहे हैं तो पर सब जानते हैं कि वे एक बार फिर मृग-मारीचिका में भटकने वाले हैं; फिर से एक और हास्यबोध उत्पन्न करने वाले हैं.
 

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उक्त व्यंग्य जनसंदेश टाइम्, दिनांक-08-06-2015 के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.