कृत्रिम दुनिया की अपनी-अपनी कलाकारियों को दिखाने हेतु, उनको और अद्भुत रूप में प्रदर्शित
करने के लिए मेला लगा हुआ था. चकाचौंध भरे वातावरण में सभी मदारी अपने-अपने जमूरों
के साथ खेल दिखाते नजर आ रहे थे. सबकुछ हँसते-खेलते चल रहा था कि अचानक एक कुत्ता
रंग में भंग करने को आ गया. आश्चर्य देखिये कि आरोप लगाया जा रहा कि कुत्ता चोरी
का है. कृत्रिम कुत्ते पर भी कोई दूसरा दावा कर रहा कि वो कुत्ता उसका है. देखते-देखते
कृत्रिम कुत्ते की चर्चा चारों तरफ छा गई.
अपने आपको चर्चाओं से अलग करने का विचार बना ही रहे थे कि एक मित्रवर ने घर पर
धमकते हुए ‘चाय पिलवाओ’ के नारे को उछाल कर मेले के कुत्ते को, मतलब कुत्ते की चर्चा को सामने उगल
दिया. बोले यार, दिमाग लाख चाहने के बाद भी कुत्ते से अलग
नहीं हो पा रहा है. कृत्रिम दुनिया के इस एक कुत्ते ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींच
लिया है. हमने भी बात को टालने की गरज से कहा कि कुत्ता चोरी करने वाले का खेला
मेले से अलग कर दिया गया है, अब छोड़ो ये मगजमारी.
मित्रवर ठहाका मारकर हँसे और बोले कैसे छोड़ दें इस मगजमारी को? एक कुत्ता चोरी सबके सामने आ गई तो चर्चा
बन गई मगर कभी सोचा है कि ऐसा हुआ क्यों? हमारी प्रश्नवाचक
आँखें देखकर वे आगे बोले, जब तक शिक्षा संस्थानों को,
प्राध्यापकों को आँकड़ेबाजी में लगाये
रखा जायेगा, तब तक यही चुरकटपना
देखने को मिलता रहेगा. आँकड़े इधर-उधर करने के खेल में चौबीस घंटे व्यस्त रहने वाले
मौलिकता, वास्तविकता की
तरफ कैसे और कब ध्यान दे पाएँगे? चाय के अंतिम घूँट तक
आते-आते मित्रवर ने कमजोर नब्ज पर चोट करते हुए बाँयी आँख दबाते हुए हमें आइना
दिखाया कि खुद अपने उच्च शिक्षा क्षेत्र को देखो. दो-चार किताबों से चोरी करके कुछ
बनाया तो उसे कह दिया रिसर्च पेपर और चालीस-पचास किताबों से चुराकर जो बनाया वो
बता दी थीसिस. क्या कहेंगे इसे, एपीआई का जुगाड़, पोर्टल की आँकड़ेबाज़ी या फिर मौलिक काम?
मित्र के जाने के बाद अपने गिरेबान में झाँकने की कोशिश की तो नीतिगत झोल, चौर्य बौद्धिकता जैसा बहुत कुछ नजर
आने लगा. एक बनाया गया था विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, जिसे लोग प्यार से यूजीसी
कहते हैं. हाल-फिलहाल तो ये भी चर्चा के केन्द्र में बना हुआ है मगर जब इसे बनाया
गया था तो उसका उद्देश्य उच्च शिक्षा क्षेत्र में कुछ क्रांतिकारी कदमों का उठाया
जाना था. प्यारे-प्यारे से यूजीसी को बनाने वालों को लगा कि देश भर में उसके खेल
के मुकाबले बहुत बड़ी संख्या हो गई है तो खेला करने को कुछ और नया चाहिए. समय बदलता
रहा, व्यक्तियों का मूल्यांकन होता रहा तो विचार किया गया कि
अब संस्थानों का भी मूल्यांकन किया जाए. विचार का आना भर था कि उसी के साथ आ गए ‘नैक’
वाले. इनके द्वारा अनेकानेक तरह से संस्थानों को मथा जाने लगा पर किसी की समझ में
नहीं आ रहा था कि ये चकरघिन्नी का खेल किसके लिए खेला जा रहा है. सबकुछ ‘मैनेज’ करने के चक्कर में ‘इधर की ईंट, उधर का रोड़ा’ वाला
हाल बना हुआ है.
परेशान लोग और अधिक परेशान होते रहे मगर खेला बंद न हुआ. मौलिक और नवीन के
चक्कर में सबकुछ घालमेल किया जाने लगा, ‘चोरी का कुत्ता’ आजमाया जाने लगा. ऐसा होता देखने के बाद भी नीतियों से खेलने
वालों का मन न भरा तो धीरे-धीरे ‘अबेकस’, ‘मानव सम्पदा पोर्टल’ नजर आने लगे. इनको कुछ-कुछ समझना
शुरू किया ही था कि ‘समर्थ पोर्टल’ के अवतरण ने असमर्थ सा करना शुरू कर दिया. ‘नेकी
कर दरिया में डाल’ की तर्ज़ पर ‘कुछ भी कर, समर्थ में भर’ के आदेश आने लगे. फ़ाइलों पर चल रही प्रोन्नति
प्रक्रिया हो नहीं पा रही, अब ‘समर्थ’
को प्रमोशन करने की जिम्मेदारी दे दी. दो हाथों और एक दिमाग से काम करने वाले
शिक्षक की समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने कागजों को सही करे या फिर पोर्टल पर बने
पेज को?
इससे पहले कि पोर्टल में, आँकड़ों में फँसा उच्च शिक्षा संस्थान, प्राध्यापक अंतिम साँस ले पाता कि उसकी साँस अटकाने को
‘प्रमाण पोर्टल’ आ गया. पहले लगा कि ये हम सबको प्रणाम करने आया है पर नहीं,
ये तो चालीस से अधिक बिन्दुओं पर प्रमाण
माँगने लगा, वो भी प्रतिमाह. इससे
भी मौलिकता का विकास होने के स्थान पर जोड़-तोड़ की विकास-दर बढ़ गई. फ़िलहाल तो साँस हलक
में अटकी है, आँखें फिर गई हैं,
धड़कन बेतरतीब है, बीपी का उच्चावचन समझ से परे है. ये सब इसलिए
नहीं कि नदारद विद्यार्थियों के बीच, नकलची शोध-प्रक्रिया के साथ, एपीआई के खेल के लिए आँकड़ों को जबरन पैदा करना है या अपने मित्र के शब्दों
में चुरकटपना फैलाना है वरन् इसलिए कि कल सुबह आँख खुलते किसी नए पोर्टल की आहट डरा
न दे. समझ नहीं आ रहा कि शिक्षा क्षेत्र में कितना छीछालेदर रस पिलाया और फैलाया जाएगा? मौलिकता के बजाय कृत्रिमता के लिए कितना
उकसाया जायेगा?

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