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गुरुवार, 8 मार्च 2018

मातृत्व भी बाजार के हाथों में


शिक्षित व्यक्ति विमर्श करने की क्षमता का विकास कर लेता है. तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर तर्कशील बन जाता है. इधर कुछ समय से लगने लगा है कि आधुनिकता के नाम पर साक्षरता जैसे देह के आसपास सिमटती जा रही है. इस देह में भी उस विमर्श के लिए स्त्री-देह सबसे सहज विषय-वस्तु बन गई है. इसी कारण अब तर्क-वितर्क में बहुधा महिलाओं से सम्बंधित मुद्दे, महिलाओं से सम्बंधित विषय ज्यादा सामने आने लगे हैं. इन विषयों पर, मामलों पर कुतर्क जैसी स्थितियाँ न केवल पुरुषों द्वारा बल्कि स्त्रियों द्वारा भी अपनाई जा रही हैं. विगत कुछ समय से स्त्री-विषयक बहसें लगातार सामने आ रही हैं. समझ से परे है कि ये स्त्रियों को स्वतंत्रता का अधिकार का ज्ञान कराने के लिए हो रहा है या फिर उनकी स्वतंत्रता की आड़ में बाजार को सशक्त किया जा रहा है? कुछ दिनों पहले हैप्पी टू ब्लीड जैसा आन्दोलन चला. जिसके द्वारा महिलाओं की माहवारी को केंद्र में रखा गया. कुछ अतिजागरूक महिलाओं ने खुद को इस आन्दोलन में सूत्रधार की तरह से आगे धकेलते हुए माहवारी के दाग के साथ खुद को प्रदर्शित किया. इस हैप्पीनेस को पाने के बाद इन्हीं आन्दोलनरत महिलाओं ने सेनेटरी पैड के मुद्दे को हवा देने का काम किया. इस बार इनका मुद्दा सस्ते पैड नहीं वरन इन पैड के विज्ञापनों में दिखाए जा रहे नीले रंग को लेकर था. आखिर जब खून लाल रंग का होता है तो फिर पैड के विज्ञापन में नीला रंग क्यों? वाकई स्त्री-सशक्तिकरण के नाम पर धब्बा था ये नीला रंग. आखिर लाल को नीले से परिवर्तित करके पुरुष महिलाओं को रंगों के अधीन भी लाना चाहता होगा.


अब एक नई बहस छिड़ी हुई है स्तनपान को लेकर. एक पत्रिका के कवर पर स्तनपान कराती मॉडल का चित्र बहुतों के लिए अशोभनीय रहा, बहुतों के लिए मातृत्व का परिचायक. इस मॉडल के मातृत्व के पक्ष में बहुतों ने न केवल हिन्दू धार्मिक उदाहरणों को सामने रखा वरन विदेशी संसद की कुछ महिलाओं के उदाहरण भी दिए. इस तरह की चर्चा लगभग दो-तीन साल पहले उस समय भी छिड़ी थी जबकि कुछ मॉडल्स ने नग्न, अर्धनग्न रूप में स्तनपान कराते हुए फोटोसेशन करवाया था. बहरहाल, स्तनपान किसी भी महिला के जीवन का सुखद क्षण होता है, सुखद अनुभूति होती है. स्तनपान की अहमियत को एक महिला, जो माँ बन चुकी है, बखूबी समझ सकती है. किसी पत्रिका के कवर पेज के लिए, भले ही उसका मंतव्य किसी न किसी रूप में स्तनपान की अवधारणा को विकसित करना ही क्यों अ रहा हो, स्तनपान को सार्वजनिक करना मातृत्व का परिचायक नहीं है. बहुत सूक्ष्म रूप में इसे न समझ सहज भाव से समझने की आवश्यकता है कि स्तनपान के द्वारा एक माँ न केवल अपने शिशु को भोजन दे रही होती है वरन उस शिशु के साथ गहरा तादाम्य स्थापित कर रही होती है. उन पावन क्षणों को जिन महिलाओं और पुरुषों ने पावनता के रूप में देखने की कोशिश की होगी उनको इसका अनुभव होगा कि उस क्षण जहाँ शिशु के हाथ-पैर माता के स्तन से खेल रहे होते हैं वहीं माता के हाथ उसके सिर पर आशीष-रूप बने रहते हैं. इस दौरान उन माताओं के हावभाव कम से कम इस पत्रिका की मॉडल जैसी भाव-भंगिमा जैसे नहीं होते हैं. उनके चेहरे की आत्मीयता, संतुष्टि का भाव इसके चेहरे जैसा कामुक नहीं होता है.

समझने वाली बात यह भी है कि जो महिलाएं कुछ दिनों पूर्व तक हैप्पी टू ब्लीड के नाम पर उस मानसिकता से स्वतंत्रता पाना चाहती थीं जो स्त्रियों को माहवारी के दिनों में कैद जैसी स्थिति दे देता है वे आज़ादी के रूप में स्तनपान की सार्वजनिकता चाह रही हैं. यही महिलाएं ब्रा से मुक्ति की चाह में सडकों पर ब्रा की होली जलाती हैं, खुद को बिना ब्रा के प्रदर्शित करती हैं वही महिलाएं अब स्वतंत्रता, सार्वजनिक होने के नाम पर ब्रा-युक्त स्तनपान की अवधारणा पैदा कर रही हैं. आखिर स्वतंत्रता को किस पैमाने पर उतारकर महिलाओं की आजदी के लिए वास्तविक आज़ादी की माँग ये कर रही हैं, इन्हें स्वयं नहीं मालूम. असल में बाजार ने महिलाओं को आधुनिकता के नाम पर उत्पाद बनाकर रख दिया है. स्त्री-सशक्तिकरण से जुडी महिलाएं, अपने आपको मंचों के सहारे महिलाओं की अगुआ बताने वाली महिलाएं ऐसे किसी भी मामले के लिए पुरुष को दोषी ठहराएँ मगर सत्य यही है कि आज महिलाएं स्वतः बाजार के हाथ की कठपुतली बनती जा रही है. न केवल महिलाओं से जुड़े उत्पादों में वरन पुरुषों से जुड़े उत्पादों में भी स्त्री-देह निखर कर सामने आ रही है. विज्ञापनों में महिलाओं को विशुद्ध कामुकता की पुतली बनाकर पेश करने की होड़ लगी हुई है. बॉडी स्प्रे का विज्ञापन हो तो महिला ऐसे दिखाई जाती है जैसे वह सारी उम्र, सारी शर्म छोड़कर सिर्फ देह की चाह रखती है. एक अगरबत्ती का विज्ञापन ऐसे दिखाता है जैसे उसकी महक किसी भी स्त्री को सेक्स के लिए उत्तेजित कर सकती है. चाय हो, ब्लेड हो, बनियान हो, साबुन हो, सौन्दर्य प्रसाधन हो या फिर कोई अन्य उत्पाद सभी के द्वारा महिलाओं को कामुक, उत्तेजक भूमिका में इसी बाजार ने खड़ा कर दिया है.

वर्तमान में उठा स्तनपान का ये मुद्दा विशुद्ध बाजारीकरण की देन है. जिस तरह से उस मॉडल को स्तनपान कराते प्रस्तुत किया गया है वह बाजारी दृष्टि को ही प्रदर्शित करता है. ऐसे बाजार को न माता से मतलब है, न शिशु से मतलब है और न ही स्तनपान से. इसके लिए बस अपने उत्पादों का विक्रय अनिवार्य है. किसी न किसी कीमत पर उनको बेचना उनकी प्राथमिकता है. अब इसके लिए चाहे हैप्पी टू ब्लीड के दाग हों, चाहे पैड का नीला-लाल रंग हो, कंडोम की कामुकता हो, अगरबत्ती में छिपी मादकता हो, ब्रा-पैंटी का उभार हो या फिर स्तनपान के द्वारा स्त्री-देह का प्रदर्शन हो. मातृत्व की आड़ में सामने लाये गए, बहस का विषय बनाये गए स्तनपान के बाद देखिये बाजार किस-किस गोपन को अगोपन बनाकर सामने लाता है?


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यह आलेख जनसंदेश टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर दिनांक 08-03-2018 को प्रकाशित किया गया.

सोमवार, 24 जनवरी 2011

नारी की बदलती छवि को दर्शाता आलेख -- कुमारेन्द्र

परिवर्तन की दिशा : नारी की बदलती छवि

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परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत सत्य है और इस सत्य का उद्घाटन समाज और उसके अंगों-अपांगों पर समय-समय पर होता रहता है। समाज का ही एक अंग होने के कारण साहित्य भी इससे अछूता नहीं है। हिन्दी साहित्य ने अपने आर्विभाव से अद्यतन परिवर्तन के विविध चरणों को एकदम नजदीक से देखा और महसूस किया है। इन्हीं विविध चरणों को हम हिन्दी साहित्य में काल विभाजन की दृष्टि से स्वीकार करते हैं।

आदिकाल से लेकर अद्यानुतन चलती आ रही साहित्यिक परम्पराओं में युगकारी परिवर्तन देखने को मिले। इनमें सम्बन्धित युग की प्रवृत्तियाँ-परिस्थितियाँ स्पष्ट रूप से साहित्य को प्रभावित करती रही हैं। प्रत्येक युग की प्रवृत्तियाँ भी तत्कालीन युग के परिवर्तन को इंगित करती रहीं हैं और स्वयं को युगीन बोध के अनुसार परिवर्तित भी करती रही हैं।

आधुनिक काल के साहित्य पर दृष्टिपात करें तो स्पष्ट होता है कि इस कालखण्ड में परिवर्तन की दिशाएँ विविध एवं तीव्रतम रहीं हैं। स्वतन्त्रता आन्दोलन के युग में उत्पन्न हुई साहित्यिक एवं सामाजिक चेतना ने परिवर्तन की दिशा निर्धारित की। इस युग के साहित्य ने पूर्व साहित्य के इतर मानवीय संवेदनाओं को इंगित करने वाली परम्परा पर विशेष बल दिया। मानवीय संवेदनाओं और युगीन बोध ने साहित्य को बँधी-बँधाई परिपाटी से परिवर्तित कर एक नई दिशा प्रदान की।

मनोरंजन, ऐयारी, जासूसी साहित्य सर्जना से इतर मानवीय संवेदनाओं और क्रिया-कलापों को केन्द्र में रखकर साहित्य-रचना ही जा रही थी। तत्कालीन युग-बोध को दर्शाने के साथ-साथ स्त्री को भी साहित्य के केन्द्र में रखा जाने लगा था। अब स्त्री को प्यार की जागीर, उसे दासत्व जैसी स्थिति में देख साहित्यकारों को भी पीड़ा का एहसास हो रहा था। नारी अब मात्र बिलासिता और नख-शिख सौन्दर्य की वस्तु नहीं रह गई थी। साहित्य के द्वारा स्त्रियों की दशा का चित्रण कर उनके समाधान का आधार भी निर्मित किया जा रहा था। राजा राममोहन राय, महर्षि कर्वे, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, दयानन्द सरस्वती जैसे समाज-सुधारकों के प्रयासों के परिणामस्वरूप लाला श्रीनिवास दास, श्रद्धानन्द किल्लौरी, बालकृष्ण भट्ट, किशोरीनसन गोस्वामी, भारतेन्दु हरिश्चन्द आदि जैसे साहित्यकार अपनी रचनाओं के द्वारा नारी-शिक्षा, नारी समस्या उन्मूलन जैसे विषयों को सामने ला रहे थे। इस युग में सामाजिक उपन्यासों के द्वारा जुआ, शराब, वेश्या-नृत्य, चाटुकारिता आदि बुराइयों का पर्दाफाश कर समाज को सही राह पर चलने की दिशा दी जा रही थी।

स्वाधीनता आन्दोलन में स्त्रियों की सशक्त भूमिका ने साहित्य में भी स्त्रियों की भूमिका को परिवर्तित किया। नारी-शिक्षा को लेकर रचे जा रहे ग्रन्थों से परिवर्तित होकर साहित्य की दिशा नारी के बंधनों को तोड़ने की दिशा में बढ़ गई। द्विवेदी युग में राष्ट्रवादी कवयित्री राजरानी देवी ने राष्ट्र की स्वतन्त्रता के साथ-साथ स्त्री स्वतन्त्रता की भी आवाज उठाई।

राजरानी देवी ने स्त्री को किसी भी प्रकार के बंधनों में न बँधकर स्वतन्त्र बनने का संदेश दिया। वे स्त्रियों का आहवान भी करती हैं-
‘सोच लो, संसार के कांतार में,
बद्ध होकर यदि जिए तो क्या जिए?
कर्म के स्वच्छन्द, सुखमय क्षेत्र में,
किंकिणी के साथ भी तलवार हो।’

इसी युग में नारी स्वयं भी लेखन के द्वारा अपनी समस्याओं और उनके समाधान को खोजती नजर आई। बंग महिला (राजेन्द्र बाला घोषा) की कहानी ‘दुलाईवाली’ को हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी स्वीकारना महिला सशक्तीकरण की आधारभूमि तैयार करना ही था। इस कहानी में स्त्रीचेतना और स्त्री सरोकार को एक स्त्री की दृष्टि से ही दिखा कर स्त्री की भूमिका को प्रतीकात्मक ढंग से सशक्त रूप में दर्शाया गया था। बंग महिला द्वारा साहित्य लेखन को इस कारण से भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है कि इस समय गोपालदास गहमरी और देवकीनन्दन खत्री जैसे स्थापित पुरुष साहित्यकार साहित्य-सर्जना कर रहे थे वहाँ बंग महिला ने नारी-सुधार जैसे विषय को केन्द्र बना कर लिखी कहानी से स्त्री चेतना और सशक्तीकरण की दिशा तय की।

नारी-शक्ति लगातार साहित्य-सर्जना की ओर प्रवृत्त हो रही थी। यशोदा देवी, प्रियंवदा देवी, शारदा देवी जैसी लेखिकाओं ने महिला शक्ति को, अस्तित्व को स्वर प्रदान किया। समय परिवर्तित होता रहा, प्रवृत्तियाँ लगातार बदलती रहीं और इसी परिवर्तन के साथ-साथ स्त्री चेतना के स्वरों में भी परिवर्तन होते रहे। सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ देने के आहवान, बंधनों से मुक्ति के प्रयासों को मुखरता महादेवी वर्मा के आने से मिली। छायावादी सात्विक नारी प्रेम की भावना से इतर महादेवी वर्मा ने नारी-स्वर को ओज देकर ‘स्त्री-विमर्श’ की स्थापना हिन्दी साहित्य में की। प्रसाद की नारी की उज्ज्वल, पावन छवि के साथ-साथ जो सामाजिक स्थिति बनी इस छवि की दीनता और असहायता की स्थिति को निराला ने ‘विधवा’ तथा ‘तोड़ती पत्थर’ जैसी रचनाओं के द्वारा दर्शाया। इन्हीं के समकालीन पन्त नारी को भोग का साधन अथवा वासना तृप्ति का साधन मात्र न स्वीकार कर उसे भी एक मानवीय स्वरूप प्रदान करते दिखे।

महादेवी वर्मा ने नारी की इन परम्परागत छवियों से अलग सशक्त चरित्र, जीवट व्यक्तित्व एवं स्वतन्त्र अस्तित्व छवि का निर्माण किया। महादेवी वर्मा ने परिवार और समाज के बंधनों में सिर्फ नारी के बँधने का विरोध किया। परिवार और समाज के इन बंधनों का विरोध करती हुईं वे ‘पथ के साथी’ में कहती भी हैं- ‘‘समाज और परिवार व्यक्ति को बंधन में बाँधार रखते हैं। ....ये बंधन व्यक्तित्व के विकास में सहायता करने के बदले बाधा पहुँचाते लगते हैं। ये बंधन कितने ही अच्छे उछ्देश्य से क्यों न नियत किये गये हों, हैं बंधन ही और जहाँ बंधन है वहाँ असंतोष तथा क्रांति है।’’ महादेवी वर्मा इसी क्रांति की ज्वाला ‘शृंखला की कड़ियाँ’ कृति के द्वारा तत्कालीन नारियों के मघ्य प्रज्ज्वलित करतीं हैं।

लगातार होते साहित्यिक परिवर्तनों ने नारी के व्यक्तित्व को स्वतन्त्रता प्रदान की। इस स्वतन्त्रता ने स्त्री को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के साथ-साथ सामाजिक-पारिवारिक-आर्थिक-सांस्कृतिक-साहित्यिक स्वतन्त्रता प्रदान की। नारी की स्वतन्त्रता मुखर होकर साहित्य में नवीन दिशाओं का निर्माण करती दिखी। सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति, आराधना योग्य देवी की स्वीकार्य छवि से इतर वह उच्छृंखल छवि का निर्माण करने लगी। परम्पराओं और मूल्यों के बंधनों को तोड़कर वह ‘बोल्ड’ लेखन ओैर ‘बोल्ड’ चरित्र प्रदर्शित करने लगी। मानसिक-शारीरिक-यौनिक स्वतन्त्रता ने यद्यपि नारी छवि को परम्परागत भारतीय नारी छवि से अलग पहचान दी साथ ही साथ इस छवि को आरोपित भी किया। इन सबके बाद भी वह अपनी बेलाग, बेलौस, स्वच्छन्द छवि से साहित्य में नवीन प्रवृतियों और दिशाओं को जन्मने लगी।

नया कालखण्ड, नया युगबोध और स्त्री-चरित्र को लेकर स्थापित होती नई परिवर्तनकारी अवस्थाओं ने स्त्री-चेतना को स्वच्छन्द यौनिक अवस्था में परिवर्तित कर दिया। अब नारी साहित्य के द्वारा सोचती है कि पुरुष वेश्यालय कब खुलेंगे? उसके नारी पात्र एक साथ कई पुरुषों की शारीरिक शक्ति का परीक्षण करने लगे। अपनी विशिष्ट दैहिक संरचना की स्वीकारोक्ति से अपने अंगों-उपांगों के चित्रण और उनकी सौन्दर्यानुभूति को स्वयं प्रदर्शित करने लगी। माँग के सिन्दूर, सिर के आँचल, पैरों की पायल-बिछिया, व्रतों-त्योहार का बहिष्कार सा कर स्वतन्त्र नारी ने स्वतन्त्र अस्तित्व की अवधारणा निर्मित की। साहित्य सर्जना करती नारी, उसके नारी-पात्र स्वतन्त्र यौन सम्बन्ध्ाों को बनाने में, सेक्स पार्टनर बदलने में, विवाहेत्तर अथवा विवाहपूर्व शारीरिक सम्बन्धों को बनाने में, अनब्याही माँ बनने में, अविवाहित जीवन व्यतीत करने में किसी तरह का अपराध-बोध नहीं स्वीकारते हैं। स्वीकारें भी क्यों, आखिर साहित्य की परिवर्तित होती दशाओं और दिशाओं ने स्त्री को स्वतन्त्र मानवीय पहचान प्रदान की है।

नारी की परिवर्तित छवि से, उसकी स्वतन्त्र, स्वच्छन्द, उच्छृंखल मानसिक सोच से सामाजिक संरचना, पारिवारिक संरचना, सामाजिक सरोकारों, जीवन-मूल्यों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, यह अलग से चिन्तन का विषय है। परिवर्तन की दृष्टि से नारी की परम्परागत छवि का विखण्डित होना रूढ़ियों, सड़ी-गली मान्यताओं, पुरुषजन्य विकृत सोच को परिवर्तित करता है। यह कहीं न कहीं स्वस्थ समाज के निर्माण का कार्य भी करता है।

शनिवार, 24 मई 2008

स्त्री विमर्श के पीछे

भूमन्दलीकरण के इस दौर में जब समाज में स्त्री विमर्श की चर्चा की जाती है तो स्त्री विमर्श की वास्तविकता और कल्पना के मध्य बारीक सी रेखा विश्व स्तर पर दिखाई देती है. इसी बारीक अन्तर के मध्य चार घटनाओं को स्त्री विमर्श के साथ रेखांकित किया जाना भी अनिवार्य प्रतीत होता है. सन् १७८९ की फ्रांसीसी क्रांति जिसने समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व के नैसर्गिक अधिकारों को लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के रूप मे प्रतिष्ठित किया. सन् १८२९ का राजा राममोहन राय का सती प्रथा विरोधी कानून जिसने स्त्री को मानव के रूप में स्वीकारा. तीसरी यह कि सन् १८४८ में ग्रिम्के बहिनों ने तीन सौ स्त्री पुरुषों की सभा के द्वारा नारी दासता को चुनौती देकर स्त्री विमर्श की आधारशिला रखी और चौथी घटना सन् १८६७ में स्टुअर्ट मिल द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट में स्त्री के वयस्क मताधिकार का प्रस्ताव रखा जिसने स्त्री को भी मिलने वाले कानूनी और संवैधानिक अधिकारों को बल दिया. इन घटनाओं में ध्यान देने योग्य यह है की पूर्व हो या पश्चिम, स्त्री विमर्श की सैधांतिक आधारशिला पुरुषों द्वारा ही तैयार की गई जिस पर आधुनिक स्त्रियों द्वारा स्त्री विमर्श को आन्दोलन बना कर नारी स्वरूप को विकृत करने का प्रयास किया जा रहा है.
स्त्रियों ने अपनी स्थिति को सुद्रण किया, स्वयं को शिक्षा, राजनैतिक अधिकारों, संवैधानिक अधिकारों से परिचित करवाया तो इसी शक्ति का प्रयोग उसने स्वयं को संस्कारों, परिवारों से मुक्त कर देने में किया. यह विडम्बना है कि आज की नारी स्त्री विमर्श की, स्त्री शक्ति की सफलता इस बात पर मानती है की वह एक साथ कितने पुरुषों की शारीरिक शक्ति का परीक्षण कर सकती है. वह सोचती है की पुरूष वेश्यालय कब बनेंगे. आज स्वतंत्र घोषित कर चुकी नारी की चाह अपने परिवार की लडकी का भविष्य बनाने में नहीं वरन यह ध्यान देने में है कि कहीं असुरक्षित यौन संबंधों से वह एड्स का शिकार न हो जाए. वह परिवार में रह कर पिता, पति, पुत्र के रूप में अपना शासक पाकर स्वयं को शोषित समझती है किंतु वह इस बात में संतुष्टि पाती है की वह अविवाहित रह कर प्रत्येक रात कितने अलग अलग पुरुषों का भोग कर सकती है, अपने मांसल शरीर के पीछे नचा सकती है.
शारीरिक – मानसिक और भावनात्मक रूप से स्त्री शक्ति की पहरुआ नारियों ने स्त्री विमर्श को स्त्री स्वतंत्रता को नारी देह के आसपास केंद्रित कर दिया है. पुरूष वर्ग के विरोध में खड़ी नारी शक्ति स्वयं को नारी हांथों में खेलता देख रही है. यदि कुछ वास्तविकताओं को ध्यान में रखा जाए तो महिलाओं को मिलते अधिकार, शिशु प्रजनन अधिनियम, अपनी मर्जी से परिवार को सीमित रखने का अधिकार, तलाकशुदा नारी को बच्चा पाने का कानूनी अधिकार आदि महिलाओं के यौन प्रस्तुतीकरण से सम्भव नहीं हुआ है. गे-कल्चर, स्पर्म बैंक, सरोगेत मदर्स, ह्यूमन क्लोनिंग की संभावनाओं ने स्त्रियों की आजादी को नया आयाम दिया है तो उसे भयाक्रांत भी किया है. टी वी की सेत्युलैद चमक और परदे की रंगीनियाँ स्त्री को आजादी की राह का सपना तो दिखा सकती हैं पर आजादी नहीं दिला सकती है. तभी तो अपने उत्पाद को बेचने के लिए निर्माता वर्ग किसी नग्न महिला को ही चुनता है.
कम से कमतर होते जा रहे वस्त्रों ने नारी वर्ग को उत्पाद सिद्ध किया है. स्त्री विमर्श के नाम पर देह को परोसा जा रहा है. पुरूष निर्मित आधार तल पर खड़े होकर, स्वयं को उत्पाद बना कर, देह को आधार बना कर स्त्री विमर्श, नारी मुक्ति की चर्चा करमा भी बेमानी सा लगता है. स्त्री विमर्श की आड़ में नारी को सपना दिखा रही नारी जात को विचार करना होगा की स्त्री अपनी मुक्ति चाहती है तो क्या पुरूष वर्ग के विरोधी के रूप में? यहाँ विचार करना होगा की बाजारवाद के इस दौर में स्वयं को वस्तु सिद्ध करती नारी किस स्वतंत्रता की बात करना चाह रही है?

( साहित्यिक पत्रिका ‘कथा क्रम’ अप्रैल-जून २००८ में प्रकाशित लेख “स्त्री विमर्श के पीछे क्या छिपा है?” का अंश। पूरे लेख के लिए देखें www.kathakram.in
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