शनिवार, 6 जून 2020

दो दिलों की राहें

कितने बजे पहुँचोगी स्टेशन? रुद्रांश ने सीधा सा सवाल पूछा.


क्यों, मिलने की बहुत जल्दी है? ट्रेन के समय पर ही पहुंचेंगे. उधर से अनामिका ने खिलखिलाते हुए उसकी बात का जवाब दिया. दोनों तरफ से फिर हलकी-फुलकी नोंक-झोंक होते हुए बात समाप्त हुई.

ट्रेन अपनी स्पीड से दौड़ी जा रही थी. दोनों का दिल भी उसी तेजी से धड़क रहा था. उनका दिल कर रहा था कि ये सफ़र कभी ख़तम न हो, बस ऐसे ही चलता रहे और वे दोनों भी साथ चलते रहें. उनके चाहने से क्या होना था क्योंकि न तो समय को उन दोनों के लिए रुकना था और न ही ट्रेन को. समय ने तो जैसे उनका साथ ही नहीं दिया. किसी न किसी रूप में उनको बंधन में बाँधे रखा था, जिसके चलते वे दोनों कभी एकदूसरे से अपने दिल की बात न कह सके. आज दोनों के पास उतना ही समय था, जितना कि उस यात्रा ने दे रखा था. इसको वे दोनों पूरी आज़ादी से बिताना चाह रहे थे, बिता भी रहे थे.

अनामिका रुद्रांश के साथ अकेले यात्रा कर रही थी. अकेले क्या, अनामिका पहली बार रुद्रांश के साथ किसी यात्रा पर थी. उस छोटे से शहर में जहाँ लोग क्या कहेंगेका संकोच होने के कारण अनामिका कभी भी रुद्रांश के साथ न पैदल घूमने निकली न कभी उसकी बाइक पर. ऐसा नहीं कि रुद्रांश ने कभी अनामिका से नहीं कहा साथ चलने को या ऐसा भी नहीं कि अनामिका का मन न हुआ उसके साथ घूमने को मगर अपनी सीमाओं के कारण वे दोनों कभी एकसाथ अपने ही शहर की गलियों में, सड़कों पर न टहल सके.


चाय पियोगी या कोल्ड ड्रिंक? कोच में आये वेंडर को देखकर रुद्रांश ने उससे पूछा.

कुछ भी, जो तुम्हारा मन हो वही पी लेंगे. अनामिका ने अपनी पसंद भी रुद्रांश की पसंद से जोड़ दी.

हमारा मन तो कुछ और पीने का रहता है और वो यहाँ मिलेगा नहीं. तुम भी पियोगी? कहते हुए रुद्रांश हँस दिया.

अनामिका ने मुँह बिचकाते हुए उसके चेहरे पर पंच मारने का भाव दिखाया, फिर पी लो, जो पीना हो. हमसे क्यों पूछ रहे. हमें न पीना कुछ, न तुम्हारी चाय न कोल्ड ड्रिंक.

अरे, गुस्सा न हो. चाय ही पीते हैं. कहते हुए रुद्रांश ने दो चाय का आर्डर दिया.

हमें न पीनी. तुम ही पी लो दोनों कप. अनामिका मुँह फेर कर बैठी गई.

रुद्रांश ने मुस्कुराते हुए एक कप अनामिका की तरफ बढ़ा दिया. उसने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए रुद्रांश के हाथ से कप लेकर होंठों से लगा लिया.

वैसे चाय जैसा स्वाद तो नहीं होता है बीयर में. रुद्रांश ने कहते हुए जीभ अपने होंठों पर फिराई.

अनामिका ने आँखें तरेरते हुए उसे देखा. फिर शुरू हो गए.

रुद्रांश ठहाका लगाते हुए चुपचाप चाय पीने लगा.

क्या राक्षसों जैसे हो-हो-हो करने लगते हो? अनामिका ने भी उसके हँसने की नक़ल उतारी.

ऐसा ही हल्का-फुल्का हँसी-मजाक दोनों के बीच ऑफिस में भी चलता रहता था. वे दोनों एकदूसरे को पसंद करने के बाद भी अपनी भावनाओं का इजहार नहीं कर पाये थे या ऐसा करने से बचते रहे थे. दोनों तरफ किसी न किसी तरह के बंधन स्पष्ट रूप से उनको रोकने का काम करते.

पूरे सफ़र के दौरान कई बार रुद्रांश के मन में आया कि अनामिका से अपने दिल की बात कह दे मगर वह समझता था कि अब इसका कोई अर्थ नहीं. अब तो सामाजिक परम्पराओं, रीति-रिवाजों ने भी उन दोनों के पैरों में बंधन बाँध दिए थे. उसके साथ यात्रा कर रही, हँसती अनामिका उसके साथ होकर भी उसकी न थी. उसके पास होकर भी उससे बहुत दूर थी. आँखें बंद कर उसने अपना सिर सीट पर पीछे की ओर टिका लिया.

क्या हुआ? क्या सोचने लगे?

रुद्रांश ने अनामिका के सवालों का जवाब देने के बजाय आँखें खोले बिना ख़ामोशी से अपनी हथेलियों के बीच अनामिका की हथेली को थाम लिया. अनामिका ने महसूस किया जैसे वह अपने आगोश में उसे छिपाने की कोशिश कर रहा हो. ट्रेन की रफ़्तार भरे शोर के बीच भी दोनों एकदूसरे के दिल की धड़कन को सुन पा रहे थे. ऐसा लग रहा था जैसे पूरे कोच में नितांत ख़ामोशी के बीच सिर्फ वही दोनों हैं. अनामिका ने अपनी दूसरी हथेली रुद्रांश के हाथ पर रखते हुए अपना सिर उसके कंधे पर टिका आँखें बंद कर लीं.

एकदूसरे के जज्बातों को वे दोनों ही समझ रहे थे. उनके बीच का मौन वार्तालाप ही सबकुछ कह रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे दोनों के दिल आपस में अपने दिल की बात कर रहे हों. इससे पहले की दोनों की मौन भावनाएँ आँखों के रास्ते से बाहर आ जाएँ रुद्रांश ने शरारत से अनामिका को छेड़ते हुए उसके कान में धीरे से कहा वो महिला सोच रही होगी कि ये कैसी लड़की इसके साथ बैठी है. जरा भी मैच नहीं कर रही.

अनामिका ने आँखें खोलकर देखा तो सामने बैठी एक महिला को अपनी ओर ताकते पाया. उसने कोहनी मारते हुए बनावटी गुस्सा दिखाया, तो उसी के बगल में बैठ जाओ. खुद को ज्यादा स्मार्ट न समझो.

दोनों एकदूसरे की तरफ देख मुस्कुरा दिए. रास्ते भर कभी संवेदित होते, कभी भावनाओं में बहते हुए, कभी हास-परिहास करते, कभी दिल की बात कहते-कहते रुकते, कभी एकदूसरे को छेड़ते कब वे अपने शहर के प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े थे, उन्हें पता ही न चला. शाम गहराकर रात में बदलने वाली थी. सडकों को अँधेरे ने घेरना शुरू कर दिया था.

हमारे साथ चलो रिक्शे से. पहले तुमको घर छोड़ देते हैं. रुद्रांश ने कहा.

, , मैं चली जाऊँगी. लोग देखेंगे एकसाथ तो न जाने क्या कहें. अब तो और भी कहेंगे. संकोच अनामिका के शब्दों में स्पष्ट झलक रहा था.

दोनों ख़ामोशी के साथ अपरिचितों की तरह बाहर निकले. रुद्रांश का रिक्शा कुछ दूरी बनाकर अनामिका के रिक्शे के पीछे तब तक चलता रहा जब तक कि वह सुरक्षित अपने घर न उतर गई.

छोटे से शहर के बड़े से अनजाने भय में दो दिल अलग-अलग चलते रहे. अलग-अलग चलते चले गए.

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शुक्रवार, 22 मई 2020

हम ही जीतेंगे कह दो ये सबसे मगर - कविता

फूल खिलने लगे गुलशन के मगर,
फूल गुमसुम हैं कितने घर के मगर.
कौन आया जहाँ में ये हलचल हुई.
आज डरने लगे लोग खुद से मगर.


दौड़ती-भागती ज़िन्दगी है थमी,
न आये समझ क्या गलत क्या सही.
सबकी आँखों में कितने सवालात हैं,
उनके उत्तर नहीं हैं मिलते मगर. 



लोग हैरान हैं और परेशान हैं,
खोजते मिलके कोई समाधान हैं.
एक पल में अँधेरा ये छंट जाएगा,
दीप विश्वास के रहें जलते मगर.

जिनकी कोशिश कोई साँस टूटे नहीं,
हम सब संग हैं वे अकेले नहीं.
है लड़ाई अनजान अदृश्य से,
हम ही जीतेंगे कह दो ये सबसे मगर.


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गुरुवार, 21 मई 2020

वेबिनार के रूप में बन्दर को मिला उस्तरा-आईना : व्यंग्य

लॉकडाउन में कहीं आना-जाना तो हो नहीं रहा है सो दिन-रात मोबाइल, लैपटॉप की आफत बनी हुई है. शुरू के कुछ दिन तो बड़े मजे से कटे उसके बाद इन यंत्रों के सहारे दूसरे लोग हमारी आफत करने पर उतारू हो गए. सुबह से लेकर देर रात तक मोबाइल की टुन्न-टुन्न होती ही रहती है मैसेज के आने की सूचना देने के लिए. समस्या इस मैसेज की टुन्न-टुन्न से नहीं बल्कि आने वाले मैसेज से है. मैसेज भी ऐसे कि बस अभी के अभी विद्वान बना देंगे. सोशल मीडिया के किसी भी मंच पर जाओ, इसी तरह का ट्रैफिक देखने को मिल रहा है. अरे लॉकडाउन में अपने घर बैठे हो तो काहे जबरिया ट्रैफिक बढ़ाने में लगे हो?


अभी भी नहीं समझे क्या? कहाँ से समझेंगे आप क्योंकि अभी बताया ही नहीं हमने कि मैसेज काहे के आते हैं. असल में दिन भर में करीब पंद्रह-बीस मैसेज आते हैं वेबिनार के. एक फॉर्म भरकर आप तैयार होकर अपने घर पर ही बैठे रहें. कहीं जाना नहीं, किसी जगह जाने की, रुकने की चिंता नहीं. समस्या तो अब पूरी तरह से तैयार होने की भी नहीं. ऊपर शर्ट अकेले डाल लो और बैठ जाओ कैमरे के सामने जाकर. शुरू में इसके बारे में जानकारी हुई तो लगा कि चलो कुछ लोगों को बैठे-बैठे समय बिताने का अवसर मिल जायेगा. इसके बाद तो जैसे-जैसे दिन गुजरने शुरू हुए तो लगा जैसे बन्दर के हाथ अकेले उस्तरा नहीं पकड़ाया गया है बल्कि उसके साथ में आईना भी थमा दिया गया है. अब आईना देख-देख कर उस्तरा घुमाया जा रहा है. ज़िन्दगी में पहली बार इस तकनीक से सामना, परिचय होने के कारण वे इसे पूरी तरह निचोड़ लेना चाहते हैं. इनका वश चले तो इसी तरह कोरोना को निचोड़ डालें. 



आज इसी वेबिनार (बेबी-नार नहीं) के मारे एक बेचारे मिले. वे पहले से ही अपनी नार के मारे तो थे ही अध्यापन के दौरान सेमी-नार से भी परेशान होने लगे. सेमी-नार में आनंद आने लगा और बजाय पढ़ाने के वे उसी के विशेषज्ञ बन गए. कालांतर में जब उनके बाल सफ़ेद होने लगे, घुटने कांपने लगे, चश्मे का नंबर लगातार बढ़ने लगा तो उन्हें अपने विषय का विशेषज्ञ भी मान लिया गया. अब वे सेमीनार करवाने के बजाय उसमें कुर्सी चपेट की भूमिका में आने लगे. उद्घाटन सत्र से लेकर समापन सत्र तक किसी न किसी रूप में वे मंच पर ही दिखते.

आज मिलते ही बातों-बातों में वेबिनार की चर्चा निकल आई. बस वे अपने लड़खड़ाते हत्थे से उखड़ गए. हाँफते-थूक निकालते उन्होंने वेबिनार संस्कृति को समूची सभ्यता के लिए, मान-मर्यादा के लिए, सम्मान के लिए खतरा बता दिया. उन्हें इसमें अपने जैसे बड़े-बूढ़े विशेषज्ञों की कुर्सी पर खतरा मंडराता दिखा. कुर्सी के साथ-साथ जेब में आती सम्पदा पर भी संकट आते दिखा. समाचार-पत्रों में छपने, लोकल चैनल पर चेहरे के चमकने का टोटा दिखाई दिया. उन्होंने इसे सीधे-सीधे युवाओं के द्वारा बुजुर्गों के खिलाफ साजिश बता दिया. इस कदम को बुजुर्गों के अपमान से जोड़कर प्रचारित कर दिया. उनके अन्दर का सारा गुबार थूक, लार के रूप में उनके साथ-साथ आसपास वालों को भी अपने चक्रवाती तूफ़ान में लेने की कोशिश करने लगा.

उनकी हाँफी-खाँसी-थूक-लार से खुद को बचाते हुए कथित कोरोना को भी दूर किया. उनके हाँफने से प्रभावित अपने हाँफने को नियंत्रित करके हमने उनकी बातों पर विचार किया तो लगा कितनी व्यापक चिंता कर गए वे तो. अब ऊपर से मिलने वाली ग्रांट पर भी रोक लग सकती है. स्थानीय स्तर पर हनक की दम पर वसूले जाने वाले विज्ञापनों से होने वाली आय भी समाप्त हो सकती है. अनावश्यक छपाई कार्यक्रम से होने वाले अपव्यय को रोका जा सकता है. अंधा बांटे रेवड़ी, चीन-चीन के दे के आधार पर परिचितों की जेब में जाने वाले धन का रास्ता भी अवरुद्ध हो सकता है. फिर सिर झटका कि ये सब ठीक है मगर ये रोज-रोज के दर्जन भर लिंक से कौन जूझेगा? गली-गली विद्वता प्रदर्शित करने वालों से कौन, कैसे निपटेगा?

इसी निपटने में याद आयी एक और समस्या. वेबिनार के साथ-साथ उस्तरा थामे महानुभाव आपसे एक लिंक के द्वारा बस एक फॉर्म भरने का निवेदन करेंगे. इसके भरते ही और उसमें दिए गए कुछ विशेष, रटे-रटाये सवालों के जवाब देकर आप विशेषज्ञ हो जायेंगे कोविड-19 के, कोरोना के. इसके लिए आप अपने को कोरोना योद्धा भी कह सकते हैं. जिन खबरों से बचने के लिए टीवी बंद करवा दिया, समाचार-पत्र बंद करवा दिया, इंटरनेट पर भी समाचार चैनलों को, लिंक को खोलना-देखना बंद कर दिया वही विषय सिर खाने के लिए मोबाइल से झाँकने लगा है.

समझ नहीं आ रहा कि सरकार ने लॉकडाउन कोरोना संक्रमण से बचने के लिए किया है या कोरोना विशेषज्ञ बनाये जाने वालों की पैदाइश के लिए? सरकार को इस अनावश्यक टॉर्चर किये जाने को भी लॉकडाउन का उल्लंघन माना जाना चाहिए. वैसे भी उच्चीकृत मास्टर इस समय या तो मूल्यांकन कार्य में छपाई कर रहा होता या फिर घूमने में गँवाई. ऐसे में उन नवोन्मेषी वेबिनार वालों पर संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए जो न केवल लिंक भेजने का कार्य करते हैं बल्कि असमय फोन करके लॉकडाउन की शांति भंग करने का प्रयास भी करते हैं.

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बुधवार, 20 मई 2020

छीछालेदर रस से सराबोर सम्मान और उपाधि ले लो रे

चीनी उत्पादों के जैसे इसकी तासीर न निकली. जैसे सारे चीनी उत्पाद सुबह से लेकर शाम तक वाली स्थिति में रहते हैं ठीक उसी तरह से इस कोरोना वायरस को समझा गया था. हर बार की तरह इस बार भी चीन को समझने में ग़लती हुई और कोरोना हम सबके गले पड़ गया. कोरोना का इधर गले पड़ना हुआ उधर सरकार ने लॉकडाउन लगा दिया. कहा जा रहा था कि इस आपदा में भी अवसर तलाशने चाहिए. आपदा को अवसर में बदलने की कोशिश करनी चाहिए. बस, इसे गाँठ बांधते हुए बहुत से अति-उत्साही अवसर बनाने निकल आये. कुछ खाना बनाने में जुट गए तो कुछ ने जलेबी बनाने में विशेषज्ञता हासिल कर ली.


इसके साथ ही बहुतेरे लोग ऐसे थे जो स्वयंभू रूप में कोरोना योद्धा बने युद्ध करने में लगे थे. इनका युद्ध किसी को नहीं दिख रहा था. जैसे युद्धनीति में एक कौशल छद्म युद्ध की मानी जाती है, गुरिल्ला युद्ध तकनीक मानी जाती है, कुछ ऐसा ही ये योद्धा कर रहे थे. बिना किसी की नजर में आये, बिना किसी को हवा लगने के ये युद्ध किये जा रहे थे. अब चाहे जितना छद्म युद्ध लड़ लो, चाहे जितना गुरिल्ला युद्ध लड़ लो, चाहे जितना छिपकर काम करो मगर तकनीक के आगे किसी की नहीं चलती. तकनीक से सारी गोपनीयता उजागर हो जाती है. तो इसी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए बहुत से तकनीकबाजों ने पता लगा ही लिया कि कौन-कौन कथित योद्धा है. बस, इस खोज को उनके द्वारा उजागर भी कर दिया गया. 

इन तकनीकबाजों ने सभी को अपने-अपने स्तर से सम्मानित करना शुरू कर दिया. सम्मान भी वैसा जैसे कि योद्धा थे. न योद्धा दिखाई दिए, न सम्मान करने वाले. लॉकडाउन में योद्धा अपना काम करते रहे, सम्मान देने वाले अपना काम करते रहे. उन्होंने हवा में कलाबाजियाँ दिखाईं तो इन्होंने भी कलाकारी दिखाई. इसी कलाकारी में कई कलाकार रह गए. अब जो रह गए उनके प्रति भी समाज का कुछ कर्तव्य बनता है. उनके लिए भी कुछ कलाकारी दिखाने की आवश्यकता तो है ही. यही विचार जैसे आया तो लगा कि ऐसे लोगों के हौसले को टूटने नहीं देना है. आखिर बिना किसी को भनक लगे, बिना किसी काम के योद्धा बन जाना सहज नहीं होता. तो ऐसी सहजता वालों को भी सामने लाने का दायित्व समाज का है.  


इस तरह की बात मन में आई और एक योजना बना दी गई. रह गए अदृश्य योद्धाओं को सम्मानित करने की पुनीत योजना का शुभारम्भ जल्द ही किया जाना है. इसमें योद्धाओं जैसे लोगों को प्रमाण-पत्रसम्मान-पत्रसम्मानोपधियाँ देने का अति-पुनीत कार्य किया जायेगा. अब समस्या यही कि ऐसे छिपे लोगों को खोजा कैसे जाए क्योंकि तकनीकबाजों जैसी तकनीक यहाँ उपलब्ध नहीं. इसके लिए एक उपाय खोजा गया. इस योजना को सोशल मीडिया पर डाला गया. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि सभी तरह के योद्धा सोशल मीडिया पर उपस्थित हैं. सुस्त रूप में भी, सक्रिय रूप में भी. ऐसे में जो स्वयंभू योद्धा किसी अन्य तकनीकबाज से सम्मानित न हो सके हैं, और यदि वे सम्मानित होने के इच्छुक हैं तो ऐसे सुसुप्त जागरूक लोग अपना नाममाता-पिता का नामजन्मतिथि (इसे वैकल्पिक व्यवस्था में रखा गया है)पता हमें भेजें. 

यहाँ विवरण भेजते समय विशेष रूप से ध्यान रखें कि अपनी कार्य सम्बन्धी जानकारी का कोई विवरण नहीं भेजना है. ऐसा करने पर आवेदन निरस्त माना जायेगा. कार्य विवरण की अपेक्षा इसलिए नहीं क्योंकि इसे किसी गुप्त तकनीक की सहायता से खोद कर निकाल कर सामने लाया जायेगा. अभी इच्छुक बस अपना सम्मान, प्रमाण, उपाधि प्राप्त करें. हाँकिसी को यदि कोई विशेष उपाधिसम्मान की मनोकामना है तो उसे अवश्य बताएँ.  सभी की मनोकामना पूर्ण की जाएगी. ऐसा किये जाने के पूर्व छीछालेदर रस में सराबोर सम्मान आपको ससम्मान प्रदान करने की शपथ ली जाती है. जिनको सम्मान, उपाधि प्रदान की जाएगी, उनसे भी अपेक्षा रहेगी कि वे इस कोरोना काल में लॉकडाउन समय जैसा छीछालेदर रस सदैव बहते रहेंगे.


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मंगलवार, 19 मई 2020

घूँट-घूँट ज़िन्दगी


खाना खाने के बाद वे दोनों टैरेस पर आकर खड़े हो गए. अपने-अपने एहसासों को अपने अन्दर महसूस करते हुए दोनों ही ख़ामोशी से बाहर चमकती लाइट्स को, काले आसमान को, उनमें टिमटिमाते तारों को देखे जा रहे थे. उनकी ख़ामोशी के साथ चलती प्यार भरी लहर में घड़ी ने अवरोध पैदा किया. उसने ग्यारह बजने का संकेत किया. घड़ी की पर्याप्त ध्वनि के बाद भी उसने अपनी घड़ी पर निगाह डालकर चलने की मंशा जताई.

रुक नहीं सकती? उसकी आवाज़ इन तीन शब्दों के साथ जैसे जम गई हो.

उसने कुछ कहा नहीं. आगे बढ़कर उसकी दोनों हथेलियों को अपनी हथेलियों में थामकर एक सवाल उसकी आँखों के रास्ते दिल की गहराइयों में उतार दिया, जब रोकना था तब तो रोका नहीं.

एक पल को आँखों में आँखें डालकर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे उसके पास कुछ भी कहने को नहीं. जैसे उसे किसी अपराध-बोध ने जकड़ लिया हो.

उस समय की याद न दिलाओ. मैं आज तक तुम्हारा दोषी हूँ. इसके बाद भी कहता हूँ, आज रुक जाओ, आगे तुम्हारी मर्जी. उसने जैसे खुद को किसी गहरे अंधकार में पाया. पिछले कुछ घंटों की चमक उसके चेहरे से एकदम गायब सी समझ आई.

एएएए.... इसलिए नहीं कहा था कि तुम एकदम से सेंटिया जाओ. सॉरी, तुमको परेशान करने की मंशा नहीं थी. कैसे निकल गई वो बात, पता नहीं. कहते हुए उसने अपनी चिर-परिचित हँसी से पूरे टैरेस को चहका दिया.
रुकने का सोच के नहीं आई थी. कपडे भी नहीं लाई चेंज करने के हिसाब से. कह कर वह वहीं पड़ी एक कुर्सी पर बैठ गई.

अरे, तो रात में रुकने के लिए कपड़ों की क्या जरूरत. उसने ठहाका लगाते हुए एक आँख झपका दी.

रुको, अभी बताती हूँ तुमको. फिर दोनों सबकुछ भूल कर पुराने दिनों की तरह एक-दूसरे से उलझ गए.

मन उसका भी रुकने का था. खूब सारी बातें करने का था बस वह जैसे उसे परेशान करने के लिए ये सब कर रही थी. कुछ देर बाद वह उसके कुरते और लुंगी को पहन कर टैरेस में आकर बैठ गई. यह उसकी उन दिनों भी आदत में शामिल था. कभी-कभी उसके कमरे में रात को रुकने पर उसी का कुरता और लुंगी पहनना पसंद करती थी. आज वह फिर उसी ड्रेस में खुद को उन्हीं पुराने दिनों में खोया-खोया सा महसूस कर रही थी.


इतनी देर में वह कॉफ़ी बना लाया. उसे अपने कुरते-लुंगी में देखकर चेहरे पर एक मुस्कान लाकर कॉफ़ी का मग उसकी तरफ बढ़ा दिया. कॉफ़ी पीते-पीते दोनों पुराने दिनों में खो गए. बातों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा था. रात भी जैसे उनकी कहानियाँ सुनने के लिए बैठी थी. समय गुजरता जा रहा था मगर रात गुजरती महसूस नहीं हो रही थी. एहसासों की कश्ती में बैठकर दोनों बहुत दूर निकल चुके थे. अब उनके सामने जगमगाता आसमान था, हिलोरें मारता सागर था और टिमटिमाते सितारों की रौशनी.

उनकी यादों के साए कभी उनको हँसाते, कभी भावनाओं का ज्वर उमड़ता तो आँखों को नम कर जाता. बात करते-करते वह उठी और दीवान पर आकर उसके बगल में बैठ गई. एक पल को ऐसा लगा जैसे शब्दों की ध्वनि के बीच कितनी गहरी ख़ामोशी लिए वह बैठी है. हँसती-बोलती आँखें जैसे एकदम से सुनसान हो गईं हैं. उसका बोलना, बात करना एकदम से रुक गया. इससे पहले वह कुछ कहता-पूछता वह उसकी गोद में सिर रखकर लेट गई. ख़ामोशी ने जैसे सबकुछ कह दिया. शब्दों की जगह साँसें आगे की कहानी कहने लगीं.

उसने अपनी हथेली में उसके दोनों हाथों को कैद कर लिया. एक हाथ से उसके खुले बालों को सहलाते हुए वह रात को और गहराने लगा. बंद आँखों से बहती आँसुओं की धार को वह अपने दिल पर, अपनी आत्मा पर महसूस कर रहा था. उसने बाल सहलाते हाथों की गति बनाये रखी और आँखें बंद करके सिर पीछे दीवार पर टिका लिया. खामोशियों के बीच एहसासों की बारिश करते-करते कब दोनों गुलाबी सुबह के द्वार पर पहुँच गए, इसका भान न रहा.

टैरेस पर आती धूप और चिड़ियों की चहक ने दोनों की भावनात्मकता को अपने स्वर दिए. मुस्कुराते हुए वह बैठ गई. उसकी हथेलियों और बालों को अपने हाथों से मुक्त करते हुए उसने दोनों हथेलियों के बीच उसके मुस्कुराते चेहरे को थाम लिया. उसकी आखों में जन्मों का इंतजार, होंठों में सागरों की प्यास बेकरारी से मचल रही थी. अपनी हथेलियों में सजे उसके चेहरे की तरफ उसने बढ़ते हुए उसके माथे पर अपने गुलाबी दस्तक दी. एक पल को सुनहली सुबह की आभा, इधर-उधर बिखरी शबनम उनके होठों पर बिखर कर एक-दूसरे के होंठों पर सँवर गई.  

यादों और एहसासों की कैद से मुक्त होकर वे दोनों वर्तमान के साथ अपना तारतम्य बिठाने लगे.

तैयार हो जाऊँ फिर चाय मैं बनाऊँगी. तुम भी फ्रेश हो जाओ. कहते हुए वह बाथरूम की तरफ मुड़ गई.

जब ज़िन्दगी भर के लिए रोकने का अवसर था, तब न रोक कर एक अधिकार खो दिया था. फिर भी यदि हो सके तो कांफ्रेंस समाप्त होने के बाद एक दिन के लिए रुक जाना. उसने इसके जवाब में बिना कुछ कहे उसके हाथों पर अपनी हथेलियों के मखमली एहसास का अनुभव करवा कर अपने कदम कांफ्रेंस हॉल की तरफ बढ़ा दिए. वह ख़ामोशी से, नम आँखों के साथ उसे एक बार फिर अपनी ज़िन्दगी से जाता हुआ देखता रहा.  


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(लिखी जा रही प्रेम कहानियों सम्बन्धी पुस्तक में से )
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गुरुवार, 14 मई 2020

मखमली एहसास की खुशबू

मोबाइल को मेज पर टिका कर वह कुर्सी पर पसर गया. ‘कभी अपने घर को देखते हैं’ की तर्ज़ पर उसने एक नजर ड्राइंग रूम कम स्टडी रूम पर दौड़ाई. अस्तव्यस्त तो नहीं कहा जायेगा मगर करीने से लगा भी नहीं कहा जा सकता. पढ़ने के अलावा भी तमाम शौक के उसी कमरे में अपना आकार लेने के कारण बहुत सी चीजों ने जगह-जगह कब्ज़ा कर रखा था. ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि अकेले प्राणी के लिए क्या ड्राइंग और क्या स्टडी.

चौंकने जैसी स्थिति में वह किताबें, कागज, कलर्स, कैनवास आदि को उनकी जगह देने के लिए उठा. उसके आने के पहले सभी चीजों को यथास्थान कर दिया जाये अन्यथा कमरे में घुसते ही इसी बात पर लेक्चर मिल जायेगा. याद आया उसे, जब पहली बार वह उसके कमरे पर आई थी तो ‘यही सब खाते-पीते हो क्या? इन्हीं पर सोते-बैठते हो?’ के साथ उसने इधर-उधर बिखरी किताबों, कागजों, पेन आदि को समेटना शुरू कर दिया था. वह दिन याद आते ही एक मुस्कान के साथ उसने हाथ में पकड़ी किताबों को ज्यों का त्यों छोड़ दिया. आज उसके हाथ से स्टडी रूम संवर जाएगा तो बहुत दिनों तक उसकी महक बनी रहेगी.



साढ़े पाँच बजे महकती पवन की तरह उसका आना हुआ. उसके आने की आहट मात्र ने उन दिनों में पहुँचा दिया जबकि वह उसे अपनी सारी ज़िन्दगी में खुशियाँ बिखेरने के सपने देखा करता था. समय का ही खेल है जिसे ज़िन्दगी भर के लिए उसके साथ होना था वह चंद पलों के लिए अपने एहसासों की बारिश करने आई है.

“आदत अभी तक न बदली तुम्हारी. अभी भी कागज, रंग ही खाते हो. इन्हीं को ओढ़ते-बिछाते हो.” स्टडी रूम में कदम रखते ही उसके वर्षों पुराने अंदाज ने उसे भावनाओं से सराबोर कर दिया.

“एक मिनट रुको” कहते हुए वह सोफे से किताबों को उठाने के लिए आगे बढ़ा.

“तुम रहने ही दो. इतने ही काम वाले होते तो कमरा ऐसा न रहता. रुको मैं सही कर देती हूँ.” पूरे अधिकार के साथ वह कमरे को सजाने में जुट गई.

पहले तो वह कमरे के दरवाजे से टिका उसे सामान लगाते और उस पर बड़बड़ाते देख मुस्कुराता रहा फिर उसकी मदद करने लगा. इस दौरान दोनों के बीच पुराने दिनों की तरह हँसी-मजाक, छेड़छाड़ चलती रही. कभी एक हलकी सी मुस्कान के साथ बात आगे बढ़ती तो कभी ठहाकों के साथ.

“अब लग रहा है जैसे कोई रहता हो यहाँ. आती रहा करो बीच-बीच में इसे भी ज़िन्दगी देने के लिए.” कह कर उसे छेड़ा.

“मैं तो ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी देने के लिए आने वाली थी....” आगे के शब्दों पर होंठों के कंपन ने अवरोध पैदा किया. ख़ामोशी ने चीखना शुरू किया ही था कि “कुछ करना सीख लो या अब भी मेरे भरोसे ही रहोगे?” कहते हुए उसने माहौल को खुशनुमा बनाया.

उसके कुछ कहने के पहले ही अन्दर से नौकर चाय लेकर आया.

“चलो जल्दी चाय पी लो फिर कहीं बाहर चलते हैं खाना खाने.....” उसने बात काटते हुए अपनी बात जोड़ी “नहीं, कहीं बाहर नहीं जायेंगे. दो दिन से बाहर का खा-खाकर बोर हो गई हूँ. यहीं कुछ बनाती हूँ मैं.”

उसे बिन माँगे बहुत कुछ मिल गया. काश यह पल यहीं रुक जाए हमेशा के लिए.

“ओ हैलो, इधर ध्यान दो. कुछ है भी तुम्हारी किचन में या ऐसे ही बना रखा है अपने स्टडी जैसा?” उसके चेहरे पर अप्रत्याशित ख़ुशी, चमक और उसे कहीं खोया सा देख उसने टोका.

थोड़ी देर बाद किचन में उसके प्यार, स्नेह की रेसिपी अपनी खुशबू बिखरने लगी. किचन के एक कोने से टिका मंत्रमुग्ध सा उसे निहारे जा रहा था. इस समय उसके विचारों पर, पूरे व्यक्तित्व पर वही छाई हुई थी. बातों का जवाब न मिलने पर उसने पलट कर देखा तो खुद को ऐसे निहारते देखने पर एक पल को वह भी असहज हो गई.

“ऐसे क्या घूरने में लगे हो? पहली बार देख रहे हो?”

“कुछ नहीं. बस.... ऐसे ही....”

“अच्छा चलो, ज्यादा नौटंकी नहीं. चलो, भागो यहाँ से. डायनिंग टेबल सही करो और हाँ सलाद काट लो.” कहते हुए उसने धक्का देकर उसकी नजरों को अपने चेहरे से हटाया.

अपनी बाँहों पर उसकी उँगलियों का एहसास लेकर वह हँसते हुए डायनिंग टेबल की तरफ चल दिया.


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(लिखी जा रही प्रेम कहानियों सम्बन्धी पुस्तक में से )
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सोमवार, 4 मई 2020

जलेबियाँ बनी लॉकडाउन काल की वायरस

आँख खुलते ही श्रीमती जी को चाय के लिए आवाज़ लगाई. सुबह से तीसरी बार आँख खुली है. लॉकडाउन के कारण न सुबह का समय रह गया और न रात का. रात को जल्दी सोने की कोशिश में देर रात तक बिस्तर पर जाना हो पाता है. जल्दी सोने की कोशिश इसलिए क्योंकि सुबह जल्दी उठकर फिर सोना होता है. लॉकडाउन कुछ और करवा ही नहीं रहा. बस सो जाओ, जाग जाओ, फिर सो जाओ, फिर जाग जाओ. इसी सोने-जागने के बीच में खाना-पीना भी हो जाता. समझने वाली बात है, पीना-खाना नहीं हो पा रहा था, बंदी के कारण. बस खाओ और पियो. कभी पानी, कभी चाय.


कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए लॉकडाउन में घरबंदी में दिन-रात आराम से गुजर रहे थे. लोगों को लग रहा था कि वे संक्रमण से बचे हुए हैं मगर ऐसा नहीं था. कोरोना से ज्यादा खतरनाक वायरस लॉकडाउन में भी घर के अन्दर घुस चुका था. यकीन नहीं आपको? देखिएगा अपने आसपास, कहीं आप भी तो उस वायरस की चपेट में तो नहीं आ गए? ये वायरस है जलेबियाँ बनाने का. चौंक गए न? आप भी संक्रमित हैं क्या इससे?


लॉकडाउन में घर के पलंग तोड़ते, सोफों का आकार बिगाड़ते, कुर्सियों को रुलाते हुए सोशल मीडिया का जमकर दोहन किया जा रहा है. इसी में जलेबी वायरस ने घुसकर सबको संक्रमित कर दिया. जिसे देखो वो जलेबियाँ बनाने में लगा हुआ है. अरे बनाने को और भी बहुत कुछ है. पूरी बना लो, रोटी बना लो, सब्जी बना लो, बहुत ज्यादा क्रिएटिव करने का मन है तो हलवा बना लो, खीर बना लो, रायता बना लो मगर नहीं, जनाब बनायेंगे तो जलेबी ही. समझ नहीं आया कि आखिर ऐसा कैसा जलेबी-प्रेम है इनका कि महीने, दो महीने रुका न जा रहा. ऐसा लग रहा जैसे रोज जलेबी ही खाते रहे हैं. ठीक है भाई, बनाना है खूब बनाओ, खाना है खूब खाओ पर क्या जरूरी है उसे सोशल मीडिया पर शेयर करने की. पर नहीं, खुद तो मौज ले नहीं रहे, दूसरों को मौज में जीने नहीं दे रहे.

समझ नहीं आ रहा था कि लोग संक्रमण से बचने के लिए अपने घरों में कैद हैं या दूसरों के घरों में कलह पैदा करने के लिए? लॉकडाउन में पकवान, व्यंजन बनाने का सिलसिला ऐसे ही चलता रहा तो ये लॉकडाउन वीर हलवाइयों का, रेस्टोरेंट वालों का, छोटे-मोटे खोमचे वालों का व्यापार बर्बाद करवा के ही मानेंगे. अरे करमजलो, ध्यान रखो, ये लॉकडाउन तुमको कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए लाया गया है हलवाइयों का व्यापार चौपट करने के लिए नहीं, लोगों की शांत ज़िन्दगी को तहस-नहस करने के लिए नहीं.

अभी तक तो ठीक था पर इस जलेबी वायरस ने आकर सब छिन्न-भिन्न कर दिया. घर में जलेबी वायरस ने अपनी घुसपैठ कर ली. कोरोना वायरस से बचाव का तरीका लॉकडाउन या फिर क्वारंटाइन तो है मगर इस जलेबी वायरस से बचने का कोई तरीका नहीं. इसका सोर्स भी हमने पता कर लिया. सोर्स भी अपने ख़ास हैं जो रोज पता नहीं किस तकनीक से जलेबी बनाकर अपनी भाभी जी को भेजकर हमारे जी का जंजाल बनाये देते हैं.

अब कोस रहे उस पल को जब हमने अपने दोस्तों को सपत्नीक एक ग्रुप से जोड़ते हुए सबके बीच प्रेम, समन्वय, स्नेह पैदा करने का विचार किया था. आज उसी ग्रुप में हमारे सबसे आलसी, नाकारा मित्र का वीडियो पड़ा था, जलेबी वायरस से संक्रमित होने का. जब तक ये वीडियो नहीं आया था तब तक तो इस जलेबी वायरस से किसी न किसी तरह खुद को बचा रखा था मगर आज इसने अपनी तीव्रता दिखा ही दी.

आँख खोलते ही जैसे चाय की माँग हुई वैसे ही धमाका हुआ पहले जलेबी बनाने का. पलंग से गिरते-गिरते बचे. ये कहो कि कुर्सी पर या सोफे पर नहीं थे वर्ना गिर ही जाते. सामान के न होने, खमीर न उठने की, तकनीक न जानने की तमाम दवाओं का सहारा लिया मगर जलेबी वायरस ने पूरी तरह से श्रीमती जी को अपनी गिरफ्त में ले रखा था. सब कुछ तैयार है, बस जलेबी बनाना भर है का फरमान सुनाया गया. इसके साथ ताना ये मारा गया कि जब आपके ये मित्र बना सकते हैं तो आप काहे सकुचा रहे?

हमें अपने मित्र की काबिलियत पर भरोसा था सो वीडियो को कई-कई बार देखा. याद आ गया कि पिछले साल उसके घर में किसी कार्यक्रम के दौरान जलेबी बनाते हलवाई को अलग कर उसने बनी-बनाई जलेबी के साथ अपना वीडियो बनवाया था. श्रीमती जी को हकीकत बताते हुए बहुत समझाया कि ये खाना बनाने आया हलवाई बना रहा है न कि हमारा दोस्त मगर जलेबी वायरस के संक्रमण ने उन्हें नहीं छोड़ा.

आज की चाय और भोजन जलेबी बनने के बाद ही के अल्टीमेटम के बाद तो हमें वेंटिलेटर पर चढ़ाने जैसे हालात बन गए. जलेबी वायरस से बचने के लिए, लॉकडाउन में एक और लॉकडाउन झेलने के तनाव से बचने के लिए हामी भर दी. किचन से श्रीमती जी के द्वारा चाय बनाने की खटर-पटर सुनाई देने लगी और हम गुस्से में मोबाइल के द्वारा उस नामाकूल मित्र को ग्रुप में कोडवर्ड के द्वारा और पर्सनल पर सीधे-सीधे भयंकर-भयंकर वाली गालियाँ टाइप करने लगे.


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मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

इंतजार भरे जीवन का एक और इंतजार

सुबह के इंतजार में रात जागते-सोते काटी. सुबह होने के बाद इंतजार उसकी खबर का. थोड़ी-थोड़ी देर में मोबाइल को देखता कहीं वह घंटी सुन न पाया हो. कहीं फोन के बजाय मैसेज ही न किया हो. कभी सोचता कि वह खुद ही फोन करके जानकारी कर ले फिर कुछ सोच कर अपने को रोक लेता. व्यग्रता के बीच समय भी बहुत धीमे से आगे बढ़ रहा था. उसका किसी काम में मन नहीं लग रहा था. बेचैनी में इधर-उधर टहलने के बीच मोबाइल की घंटी बजते ही उसने लपक कर फोन उठाया. 


“क्या फोन पर ही बैठे थे?” दूसरी तरफ से जानी-पहचानी आवाज़ और हँसी सुनाई दी.

“इतनी देर लगा दी. बताओ, क्या प्रोग्राम बना?”


“नहीं आ पाऊँगी.” उसने बड़े धीमे से कहा.
“क्यों? क्या हो गया? क्या समस्या है? हम आ जाएँ?” उसने एक साँस में कई सारे सवाल दूसरी तरफ उछाल दिए.

इतने सारे सवालों के उत्तर में उसे जोरदार हँसी सुनाई दी, जो देर तक मोबाइल के सहारे उसके दिल-दिमाग में, उसके आसपास घूमती रही.

“इतने परेशान न हो. शाम तक आती हूँ.”

उसकी साँस में साँस आई यह सुन कर. “शाम माने, कितने बजे?” उसने आने के बारे में पूरा इत्मिनान करना चाहा.

“देखती हूँ, जैसा समय निकलेगा शाम को. अभी कुछ कह नहीं सकती.” 

इधर उधर की कुछ बातों के बाद दोनों ने बातचीत को विराम दिया. शाम को उसके आने की खबर अपने आपमें खुश करने वाली थी. वह सोचने लगा कि उसके न आ पाने की बात पर वह इतना बेचैन क्यों हो गया था? उससे मिलने की इतनी बेताबी क्यों है? दो-चार पल की मुलाकात में क्या वर्षों की बातचीत समाप्त हो पायेगी? कितनी-कितनी बातें हैं जो उसके साथ करनी हैं. कितना कुछ है जो बताना है. कितना कुछ है जो उससे सुनना-जानना है.

अब फिर इंतजार शुरू. शाम का इंतजार. शाम को किस समय आएगी? कितनी देर रुकेगी? दोपहर के बाद उसने अपने हिसाब से शाम का निर्धारण करना शुरू कर दिया. शाम चार बजे के बाद तो वह बार-बार घड़ी देखता, दरवाजे की तरफ देखता. घड़ी की सुई लगातार आगे बढ़ती हुई उसी धड़कन बढ़ा रही थी. कभी मन में उसके न आने की शंका उठती. कभी समय न निकाल पाने की मजबूरी दिखाई देती. कभी उसे लगता कि अपने घर पर क्या बताएगी कि कहाँ जा रही है, इसलिए न आये. कभी सोचता कि कहीं उसने मन रखने के लिए ही आने की हामी तो नहीं भर दी?

इसी ऊहापोह में उसने कई बार मैसेज छोड़ दिए. वह मैसेज देख लेती मगर जवाब नहीं दे रही थी. समय के गुजरने के साथ उसे एहसास होने लगा कि वह आएगी नहीं. उसके आने की ख़ुशी पर उसके न आने की आशंका भारी पड़ने लगी. इस भारीपन का आभास उसे होने लगा. 

तभी मोबाइल की मैसेजटोन ने उसका ध्यान खींचा. उसी का मैसेज था, एक स्माइली के साथ, ‘आती हूँ थोड़ा सा धीरज धरो.’

मैसेज पढ़ते ही उसके चेहरे पर मुस्कान तैर गई. पहले सोचा कि ‘लगा दूंगी मैं प्रेम की फिर झड़ी’ लिख कर रिप्लाई कर दिया जाए. फिर कुछ सोच कर उसने अपना विचार बदल दिया.

इस तरह के हँसी-मजाक, छेड़छाड़ उनके बीच अक्सर होती रहती थी. कई बार वह नाराज हो जाती थी. उसका नाराज होना अपने आपमें एक आश्चर्यजनक स्थिति रही है. कब किस बात पर नाराज हो जाये, कब किस बात को खुद मजाक बना दे, कहा नहीं जा सकता था. आज वर्षों बाद उसकी मुलाकात होनी थी और वह नहीं चाहता था कि उसकी किसी भी बात से वह नाराज होकर मिलने का प्लान बदल दे.

‘धीरज ही धरे हैं.’ लिख कर उसने रिप्लाई दिया और उसका इंतजार करने लगा.

इंतजार भरे उसके जीवन का एक और इंतजार.





(लिखी जा रही प्रेम कहानियों सम्बन्धी पुस्तक में से )
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