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मंगलवार, 8 फ़रवरी 2022

जिक्र उनका सब करें मेरी चाह में

हाथ लेकर जो चले थे हाथ में,

रुक गए वो हाथ छुड़ाकर राह में।

 

टूट कर हमने जिन्हें चाहा बहुत,

टूट कर बिखरे उन्हीं की राह में।

 

नफरतें उनकी सहेजीं प्यार से,

आखिर उनसे ही मिली थीं प्यार में।

 

बेवफा उनको ना माने दिल मेरा,

कम रही होगी वफा मेरे प्यार में।

 

वो नहीं आएँगे हमको है यकीं,

वो यकीं फिर भी भुलाया चाह में।

 

चाहतें उनसे जुड़ी हैं इस कदर,

जिक्र उनका सब करें मेरी चाह में।


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बुधवार, 2 फ़रवरी 2022

धरती है कदमों तले, अब आसमां की बारी है



धरती है कदमों तले, अब आसमां की बारी है,

ऐ ज़िन्दगी तू क्या जाने, तेरी किससे यारी है.


रास्ते कठिन हों भले मगर, मंजिल तक तो जाते हैं,

आँखें हैं बस मंज़िल पर, और हौसलों की सवारी है.


जितने भी हों रंग तेरे, तू जी भर-भर के दिखला ले,

पर भूल न जाना इतना कि, आनी मेरी भी बारी है.


शबनम की दो बूँदों से, है प्यास नहीं बुझने वाली,

तपिश मिटाने सदियों की, समंदर की चाह हमारी है.


ख़ामोशी को तुम हार न समझो, ये अंदाज हमारा है,

हम पर हमारे जलवों की, अब तक छाई खुमारी है.  


उठना होगा जब नजरों का, पल वो क़यामत का होगा,

तब तक जितनी तय कर लो, वो उतनी हद तुम्हारी है.


निकल जाएँगे हार मान के, इस धोखे में मत रहना,

जीत जाएंगे जंग सभी, अपनी ऐसी तैयारी है.


जो पला बढ़ा संघर्षों से, वो ना ऐसे टूटेगा,

जीवट है उसका आत्मबल, तेरे वारों पर भारी है.




गुरुवार, 14 सितंबर 2017

प्यार का एहसास - ग़ज़ल

तेरे खुशबू में भरे ख़त मैं जलाता कैसे,
प्यार में भीगे हुए ख़त मैं जलाता कैसे,
तेरे उन खतों को गंगा में बहा सकता नहीं,
आग बहते हुए पानी में लगा सकता नहीं,

वो ख़त आज भी मेरे दिल की दौलत हैं,
तूने जो छोड़ी है मेरे पास वो अमानत है.

जब कभी भी खुद को तन्हा पाता हूँ,
खतों के साथ तेरे पास पहुँच जाता हूँ.

नहीं होगा यकीन तुझको मगर कर ले,
दिल के कोने में ये एहसास जरा भर ले.

मेरे होने में तेरा अक्श नजर आता है,
मेरी आँखों में तेरा रूप उभर आता है.

अपनी मुहब्बत को झूठ बताएं कितना,
जो सच है वाकई में उसे छिपाएं कितना.

तेरी खातिर इक चुप सी लगा लेता हूँ,
तेरे खतों को कहीं अपने में छिपा लेता हूँ.

वो धड़कन हैं, साँसें हैं मेरी कोई क्या जाने,
तू ही न समझी तो कोई और भला क्या जाने.

++
कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र
12-09-2017

शनिवार, 2 सितंबर 2017

जिंदगी को कभी तो ज़िन्दगी बनाओ

जिंदगी को कभी तो ज़िन्दगी बनाओ,
रोना बहुत हुआ अब तो मुस्कुराओ.

चाँद को रोटी बता बहुत बहलाया,
भूखे को अब असली रोटी दिखाओ.

बेबसी से उसका जन्म से नाता है,
एक बार उसे ख़ुशी से मिलवाओ.

ज़िन्दगी लाख बेवफ़ा हो बनी रहे,
इस बेवफ़ा से परिचय तो करवाओ.

मौत के साथ जो रोज खेलता है,
उसको मौत के नाम से न डराओ.

समझना चाहते हो गर दर्द को,
खुद को खुद से ऊपर उठाओ.


बुधवार, 6 मार्च 2013

देखते होंगे खुद को आईने में और शरमाते भी होंगे - ग़ज़ल



देखते होंगे खुद को आईने में और शरमाते भी होंगे,
सजाते होंगे मन में हमारे सपने और लजाते भी होंगे.

एक लम्हा मिलन का वो सजाये हैं अपने दिल में,
गुदगुदाते होंगे कभी उन्हें और कभी रुलाते भी होंगे.

ख्वाब में मिलने की कोशिश और नींद आँखों में नहीं,
याद करके हमें रात सारी करवटों में बिताते भी होंगे.

बिना कहे ही बहुत कुछ कहती है उनके गालों की सुर्खी,
पूछने पर सबब चेहरे को हथेलियों से छिपाते भी होंगे.

निहारते हैं घंटों मेरी तस्वीर किताबों में छिपा कर,
और उसे कभी-कभी अपने लबों से लगाते भी होंगे.

मिलते हैं लोगों से वो लबों पर एक चुप सी लगाकर,
बेपर्दा न हो जाये प्यार कहीं सोचकर घबराते भी होंगे.

खुद नहीं करते कभी भूले से मेरी बातों का चर्चा,
ज़िक्र मेरा होने पर ख़ुशी से वो चहक जाते भी होंगे.

उनके हर कदम से उठती है नफासत की खुशबू,
कांधों से ढलकता आँचल पल-पल सँभालते भी होंगे.
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शुक्रवार, 1 मार्च 2013

वो समझते हैं इतराना उन्हें ही आता है - ग़ज़ल



है उन्हें प्यार मगर जताना नहीं आता है,
दिल के ज़ज्बात को छिपाना नहीं आता है.

वो क़त्ल करते हैं आँखों-आँखों में मगर,
कातिल कहा जाए उन्हें नहीं सुहाता है.

जिस हुस्न के गुरूर में मगरूर हैं वो,
दो-चार दिन में वो भी ढल जाता है.

बिन परवाने के शमा की अहमियत क्या,
इश्क भी उसके दिवाने से निखार पाता है.

वादा आने का झूठा हर बार की तरह,
फिर भी राह उनकी फूलों से सजाता है.

उनको हमारी सनक का अंदाज़ा नहीं,
वो समझते हैं इतराना उन्हें ही आता है.

बुधवार, 15 अगस्त 2012

हमारे साये ही अब हमारे साथ नहीं चलते

अपनों के बीच हो गये हैं कुछ यूं बेगाने से,

हमारे साये ही अब हमारे साथ नहीं चलते।

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हमें रुला सकें नहीं थी ताकत इतनी गमों में,

वो खुशी ही इतनी मिली कि आंसू छलक उठे।

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था पता होगा बहुत ही मुश्किल जिसको पाना,

दिल के अरमान उसी की खातिर मचल गये।

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खो गया अपना वजूद ही अपने लोगों के बीच,

ढूंड़ने अपने आपको गैरों के बीच चल पड़े।

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बिना हमें देखे जो बेचैन हुआ करते थे कभी,

वो ही आज सामने से मुंह फेर कर निकले।

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कल तक बहार थी जिनसे महफिलों की,

देखकर उनको अब सन्नाटे से छाने लगे।

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फकत कांच का टुकड़ा थे हम किसी के लिए,

खुद को उनके दिल का नगीना समझते रहे।

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जिन हाथों ने खुदा बनाया पत्थर तराश कर,

वही हाथ आज पूजा के लायक नहीं रहे।

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रविवार, 12 अगस्त 2012

चाह है जिये जाने की पर मौत का बसेरा है -- ग़ज़ल

चारों ओर इंसान के ज़िन्दगी का अजब घेरा है,

चाह है जिये जाने की पर मौत का बसेरा है।

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लगा था जो ज़िन्दगी आसान बनाने में,

अब उसी को पल-पल मौत मांगते देखा है।

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ज़िन्दगी उसको आज करीब से छूकर निकली,

मौत के साथ खेलना तो उसका पेशा है।

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क्या पता था राह मंजिल की इतनी कठिन होगी,

है घना अंधियारा और दूर बहुत सबेरा है।

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किसी आवाज या दस्तक पर नहीं कोई भी हलचल,

लगता है जैसे सभी को अनहोनी का अंदेशा है।

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मुस्कुराहट के पीछे का दर्द बयां कर रही थी आंखें,

सूनी सी आंखों में दर्द का इक दरिया छिपा है।

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नदारद रात की चांदनी, सुबह की रोशनी है,

ज़र्रे-ज़र्रे पर एक खौफनाक मुलम्मा चढ़ा है।

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अमन-चैन, प्रेम-स्नेह अब बातें हैं कल की,

सारा माहौल ही इस माहौल से दहशतज़दा है।

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रिसते ज़ख्म और सिसकते अश्क बनेंगे शोले एक दिन,

हर एक घूंट के साथ लोगों ने कोई अंगारा पिया है।

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