गुरुवार, 13 मई 2021

आएगी फिर वही सुहानी सुबह - कविता

आएगी फिर वही सुहानी सुबह

जब

सुनाई देगा

सूरज की रौशनी के साथ

कलरव पंछियों का,

सुनाई देगा

शोर स्कूल के लिए

दौड़ते-भागते बच्चों का.

 

आएगी फिर वही सुहानी सुबह

जब

गलियों में

जमी होगी महफ़िल

सुबह की सैर करने वालों की,

नुक्कड़ की गुमटी पर

सज रही होंगी होंठों पर

चुस्कियाँ चाय की.

 

आएगी फिर वही सुहानी सुबह

जब

सड़कों, गलियों में

वीरानियों के साए

डरा नहीं रहे होंगे,

दोस्त-यार-परिजन

गलबहियाँ करते हुए

त्यौहार मना रहे होंगे.

 

आएगी फिर वही सुहानी सुबह

जब

नहीं सुनाई देगा

किसी घर, गली से

कोई करुण क्रंदन,

नहीं सुनाई देंगे

अनचाहे से

एम्बुलेंस के सायरन.

 

आएगी फिर वही सुहानी सुबह

जब

हम सभी

कड़वी यादों को

कहीं दफ़न कर आयेंगे,

फिर एक बार

हँसेंगे, खिलखिलाएँगे

ज़िन्दगी को जीना सिखायेंगे.

 

जल्दी ही

आएगी फिर वही सुहानी सुबह.




रविवार, 7 फ़रवरी 2021

तुम्हारे साथ जो गुजरी वो छोटी जिंदगानी है



तुम्हारे साथ जो गुजरी वो छोटी जिंदगानी है, 
वही बाकी निशानी है वही बाकी कहानी है। 
तुम्हारे दूर जाने से न जीवन सा लगे जीवन,
रुकी-रुकी सी है धड़कन न साँसों में रवानी है।

तुम्हारी याद के साए में अब जीवन गुजरना है,
लबों पर दास्तां तेरी इन आँखों को बरसना है।
नहीं तुम सामने मेरे मगर मुझको यकीं है ये,
मेरी आँखों में बसना है मेरे दिल में धड़कना है।

भुलाया जाएगा न जो तू ऐसा दर्द लाया है,
तुम्हारे संग हँसे-खेले तुम्हीं ने अब रुलाया है।
हुई होगी कोई गलती हमसे ही निश्चित ही,
तभी तो रूठ कर तुमने अपने को छिपाया है।




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वंदेमातरम्

सोमवार, 30 नवंबर 2020

हकीकत है कोई ख्वाब नहीं

साँसें खर्च हो रही हैं

बीती उम्र का हिसाब नहीं,

फिर भी जिए जा रहे हैं तुझे

ऐ ज़िन्दगी तेरा जवाब नहीं.

 

देख तेरी बेरुखी इस कदर 

मन करता है छोड़ने का तुझे,

रोक लेतीं हैं नादानियाँ तेरी  

कि तू इतनी भी खराब नहीं.

 

फूल, कली, सितारे, चंदा

सबमें खोजा तुम सा कोई,

हर शै में मिले हँसीं मगर

किसी में तुझ सा शबाब नहीं.

 

ख्वाब देखा था कभी

तुझे ज़िन्दगी में बसाने का,

ज़िन्दगी बन गए तुम मेरी

ये हकीकत है कोई ख्वाब नहीं.


शनिवार, 6 जून 2020

दो दिलों की राहें

कितने बजे पहुँचोगी स्टेशन? रुद्रांश ने सीधा सा सवाल पूछा.


क्यों, मिलने की बहुत जल्दी है? ट्रेन के समय पर ही पहुंचेंगे. उधर से अनामिका ने खिलखिलाते हुए उसकी बात का जवाब दिया. दोनों तरफ से फिर हलकी-फुलकी नोंक-झोंक होते हुए बात समाप्त हुई.

ट्रेन अपनी स्पीड से दौड़ी जा रही थी. दोनों का दिल भी उसी तेजी से धड़क रहा था. उनका दिल कर रहा था कि ये सफ़र कभी ख़तम न हो, बस ऐसे ही चलता रहे और वे दोनों भी साथ चलते रहें. उनके चाहने से क्या होना था क्योंकि न तो समय को उन दोनों के लिए रुकना था और न ही ट्रेन को. समय ने तो जैसे उनका साथ ही नहीं दिया. किसी न किसी रूप में उनको बंधन में बाँधे रखा था, जिसके चलते वे दोनों कभी एकदूसरे से अपने दिल की बात न कह सके. आज दोनों के पास उतना ही समय था, जितना कि उस यात्रा ने दे रखा था. इसको वे दोनों पूरी आज़ादी से बिताना चाह रहे थे, बिता भी रहे थे.

अनामिका रुद्रांश के साथ अकेले यात्रा कर रही थी. अकेले क्या, अनामिका पहली बार रुद्रांश के साथ किसी यात्रा पर थी. उस छोटे से शहर में जहाँ लोग क्या कहेंगेका संकोच होने के कारण अनामिका कभी भी रुद्रांश के साथ न पैदल घूमने निकली न कभी उसकी बाइक पर. ऐसा नहीं कि रुद्रांश ने कभी अनामिका से नहीं कहा साथ चलने को या ऐसा भी नहीं कि अनामिका का मन न हुआ उसके साथ घूमने को मगर अपनी सीमाओं के कारण वे दोनों कभी एकसाथ अपने ही शहर की गलियों में, सड़कों पर न टहल सके.


चाय पियोगी या कोल्ड ड्रिंक? कोच में आये वेंडर को देखकर रुद्रांश ने उससे पूछा.

कुछ भी, जो तुम्हारा मन हो वही पी लेंगे. अनामिका ने अपनी पसंद भी रुद्रांश की पसंद से जोड़ दी.

हमारा मन तो कुछ और पीने का रहता है और वो यहाँ मिलेगा नहीं. तुम भी पियोगी? कहते हुए रुद्रांश हँस दिया.

अनामिका ने मुँह बिचकाते हुए उसके चेहरे पर पंच मारने का भाव दिखाया, फिर पी लो, जो पीना हो. हमसे क्यों पूछ रहे. हमें न पीना कुछ, न तुम्हारी चाय न कोल्ड ड्रिंक.

अरे, गुस्सा न हो. चाय ही पीते हैं. कहते हुए रुद्रांश ने दो चाय का आर्डर दिया.

हमें न पीनी. तुम ही पी लो दोनों कप. अनामिका मुँह फेर कर बैठी गई.

रुद्रांश ने मुस्कुराते हुए एक कप अनामिका की तरफ बढ़ा दिया. उसने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए रुद्रांश के हाथ से कप लेकर होंठों से लगा लिया.

वैसे चाय जैसा स्वाद तो नहीं होता है बीयर में. रुद्रांश ने कहते हुए जीभ अपने होंठों पर फिराई.

अनामिका ने आँखें तरेरते हुए उसे देखा. फिर शुरू हो गए.

रुद्रांश ठहाका लगाते हुए चुपचाप चाय पीने लगा.

क्या राक्षसों जैसे हो-हो-हो करने लगते हो? अनामिका ने भी उसके हँसने की नक़ल उतारी.

ऐसा ही हल्का-फुल्का हँसी-मजाक दोनों के बीच ऑफिस में भी चलता रहता था. वे दोनों एकदूसरे को पसंद करने के बाद भी अपनी भावनाओं का इजहार नहीं कर पाये थे या ऐसा करने से बचते रहे थे. दोनों तरफ किसी न किसी तरह के बंधन स्पष्ट रूप से उनको रोकने का काम करते.

पूरे सफ़र के दौरान कई बार रुद्रांश के मन में आया कि अनामिका से अपने दिल की बात कह दे मगर वह समझता था कि अब इसका कोई अर्थ नहीं. अब तो सामाजिक परम्पराओं, रीति-रिवाजों ने भी उन दोनों के पैरों में बंधन बाँध दिए थे. उसके साथ यात्रा कर रही, हँसती अनामिका उसके साथ होकर भी उसकी न थी. उसके पास होकर भी उससे बहुत दूर थी. आँखें बंद कर उसने अपना सिर सीट पर पीछे की ओर टिका लिया.

क्या हुआ? क्या सोचने लगे?

रुद्रांश ने अनामिका के सवालों का जवाब देने के बजाय आँखें खोले बिना ख़ामोशी से अपनी हथेलियों के बीच अनामिका की हथेली को थाम लिया. अनामिका ने महसूस किया जैसे वह अपने आगोश में उसे छिपाने की कोशिश कर रहा हो. ट्रेन की रफ़्तार भरे शोर के बीच भी दोनों एकदूसरे के दिल की धड़कन को सुन पा रहे थे. ऐसा लग रहा था जैसे पूरे कोच में नितांत ख़ामोशी के बीच सिर्फ वही दोनों हैं. अनामिका ने अपनी दूसरी हथेली रुद्रांश के हाथ पर रखते हुए अपना सिर उसके कंधे पर टिका आँखें बंद कर लीं.

एकदूसरे के जज्बातों को वे दोनों ही समझ रहे थे. उनके बीच का मौन वार्तालाप ही सबकुछ कह रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे दोनों के दिल आपस में अपने दिल की बात कर रहे हों. इससे पहले की दोनों की मौन भावनाएँ आँखों के रास्ते से बाहर आ जाएँ रुद्रांश ने शरारत से अनामिका को छेड़ते हुए उसके कान में धीरे से कहा वो महिला सोच रही होगी कि ये कैसी लड़की इसके साथ बैठी है. जरा भी मैच नहीं कर रही.

अनामिका ने आँखें खोलकर देखा तो सामने बैठी एक महिला को अपनी ओर ताकते पाया. उसने कोहनी मारते हुए बनावटी गुस्सा दिखाया, तो उसी के बगल में बैठ जाओ. खुद को ज्यादा स्मार्ट न समझो.

दोनों एकदूसरे की तरफ देख मुस्कुरा दिए. रास्ते भर कभी संवेदित होते, कभी भावनाओं में बहते हुए, कभी हास-परिहास करते, कभी दिल की बात कहते-कहते रुकते, कभी एकदूसरे को छेड़ते कब वे अपने शहर के प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े थे, उन्हें पता ही न चला. शाम गहराकर रात में बदलने वाली थी. सडकों को अँधेरे ने घेरना शुरू कर दिया था.

हमारे साथ चलो रिक्शे से. पहले तुमको घर छोड़ देते हैं. रुद्रांश ने कहा.

, , मैं चली जाऊँगी. लोग देखेंगे एकसाथ तो न जाने क्या कहें. अब तो और भी कहेंगे. संकोच अनामिका के शब्दों में स्पष्ट झलक रहा था.

दोनों ख़ामोशी के साथ अपरिचितों की तरह बाहर निकले. रुद्रांश का रिक्शा कुछ दूरी बनाकर अनामिका के रिक्शे के पीछे तब तक चलता रहा जब तक कि वह सुरक्षित अपने घर न उतर गई.

छोटे से शहर के बड़े से अनजाने भय में दो दिल अलग-अलग चलते रहे. अलग-अलग चलते चले गए.

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शुक्रवार, 22 मई 2020

हम ही जीतेंगे कह दो ये सबसे मगर - कविता

फूल खिलने लगे गुलशन के मगर,
फूल गुमसुम हैं कितने घर के मगर.
कौन आया जहाँ में ये हलचल हुई.
आज डरने लगे लोग खुद से मगर.


दौड़ती-भागती ज़िन्दगी है थमी,
न आये समझ क्या गलत क्या सही.
सबकी आँखों में कितने सवालात हैं,
उनके उत्तर नहीं हैं मिलते मगर. 



लोग हैरान हैं और परेशान हैं,
खोजते मिलके कोई समाधान हैं.
एक पल में अँधेरा ये छंट जाएगा,
दीप विश्वास के रहें जलते मगर.

जिनकी कोशिश कोई साँस टूटे नहीं,
हम सब संग हैं वे अकेले नहीं.
है लड़ाई अनजान अदृश्य से,
हम ही जीतेंगे कह दो ये सबसे मगर.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

गुरुवार, 21 मई 2020

वेबिनार के रूप में बन्दर को मिला उस्तरा-आईना : व्यंग्य

लॉकडाउन में कहीं आना-जाना तो हो नहीं रहा है सो दिन-रात मोबाइल, लैपटॉप की आफत बनी हुई है. शुरू के कुछ दिन तो बड़े मजे से कटे उसके बाद इन यंत्रों के सहारे दूसरे लोग हमारी आफत करने पर उतारू हो गए. सुबह से लेकर देर रात तक मोबाइल की टुन्न-टुन्न होती ही रहती है मैसेज के आने की सूचना देने के लिए. समस्या इस मैसेज की टुन्न-टुन्न से नहीं बल्कि आने वाले मैसेज से है. मैसेज भी ऐसे कि बस अभी के अभी विद्वान बना देंगे. सोशल मीडिया के किसी भी मंच पर जाओ, इसी तरह का ट्रैफिक देखने को मिल रहा है. अरे लॉकडाउन में अपने घर बैठे हो तो काहे जबरिया ट्रैफिक बढ़ाने में लगे हो?


अभी भी नहीं समझे क्या? कहाँ से समझेंगे आप क्योंकि अभी बताया ही नहीं हमने कि मैसेज काहे के आते हैं. असल में दिन भर में करीब पंद्रह-बीस मैसेज आते हैं वेबिनार के. एक फॉर्म भरकर आप तैयार होकर अपने घर पर ही बैठे रहें. कहीं जाना नहीं, किसी जगह जाने की, रुकने की चिंता नहीं. समस्या तो अब पूरी तरह से तैयार होने की भी नहीं. ऊपर शर्ट अकेले डाल लो और बैठ जाओ कैमरे के सामने जाकर. शुरू में इसके बारे में जानकारी हुई तो लगा कि चलो कुछ लोगों को बैठे-बैठे समय बिताने का अवसर मिल जायेगा. इसके बाद तो जैसे-जैसे दिन गुजरने शुरू हुए तो लगा जैसे बन्दर के हाथ अकेले उस्तरा नहीं पकड़ाया गया है बल्कि उसके साथ में आईना भी थमा दिया गया है. अब आईना देख-देख कर उस्तरा घुमाया जा रहा है. ज़िन्दगी में पहली बार इस तकनीक से सामना, परिचय होने के कारण वे इसे पूरी तरह निचोड़ लेना चाहते हैं. इनका वश चले तो इसी तरह कोरोना को निचोड़ डालें. 



आज इसी वेबिनार (बेबी-नार नहीं) के मारे एक बेचारे मिले. वे पहले से ही अपनी नार के मारे तो थे ही अध्यापन के दौरान सेमी-नार से भी परेशान होने लगे. सेमी-नार में आनंद आने लगा और बजाय पढ़ाने के वे उसी के विशेषज्ञ बन गए. कालांतर में जब उनके बाल सफ़ेद होने लगे, घुटने कांपने लगे, चश्मे का नंबर लगातार बढ़ने लगा तो उन्हें अपने विषय का विशेषज्ञ भी मान लिया गया. अब वे सेमीनार करवाने के बजाय उसमें कुर्सी चपेट की भूमिका में आने लगे. उद्घाटन सत्र से लेकर समापन सत्र तक किसी न किसी रूप में वे मंच पर ही दिखते.

आज मिलते ही बातों-बातों में वेबिनार की चर्चा निकल आई. बस वे अपने लड़खड़ाते हत्थे से उखड़ गए. हाँफते-थूक निकालते उन्होंने वेबिनार संस्कृति को समूची सभ्यता के लिए, मान-मर्यादा के लिए, सम्मान के लिए खतरा बता दिया. उन्हें इसमें अपने जैसे बड़े-बूढ़े विशेषज्ञों की कुर्सी पर खतरा मंडराता दिखा. कुर्सी के साथ-साथ जेब में आती सम्पदा पर भी संकट आते दिखा. समाचार-पत्रों में छपने, लोकल चैनल पर चेहरे के चमकने का टोटा दिखाई दिया. उन्होंने इसे सीधे-सीधे युवाओं के द्वारा बुजुर्गों के खिलाफ साजिश बता दिया. इस कदम को बुजुर्गों के अपमान से जोड़कर प्रचारित कर दिया. उनके अन्दर का सारा गुबार थूक, लार के रूप में उनके साथ-साथ आसपास वालों को भी अपने चक्रवाती तूफ़ान में लेने की कोशिश करने लगा.

उनकी हाँफी-खाँसी-थूक-लार से खुद को बचाते हुए कथित कोरोना को भी दूर किया. उनके हाँफने से प्रभावित अपने हाँफने को नियंत्रित करके हमने उनकी बातों पर विचार किया तो लगा कितनी व्यापक चिंता कर गए वे तो. अब ऊपर से मिलने वाली ग्रांट पर भी रोक लग सकती है. स्थानीय स्तर पर हनक की दम पर वसूले जाने वाले विज्ञापनों से होने वाली आय भी समाप्त हो सकती है. अनावश्यक छपाई कार्यक्रम से होने वाले अपव्यय को रोका जा सकता है. अंधा बांटे रेवड़ी, चीन-चीन के दे के आधार पर परिचितों की जेब में जाने वाले धन का रास्ता भी अवरुद्ध हो सकता है. फिर सिर झटका कि ये सब ठीक है मगर ये रोज-रोज के दर्जन भर लिंक से कौन जूझेगा? गली-गली विद्वता प्रदर्शित करने वालों से कौन, कैसे निपटेगा?

इसी निपटने में याद आयी एक और समस्या. वेबिनार के साथ-साथ उस्तरा थामे महानुभाव आपसे एक लिंक के द्वारा बस एक फॉर्म भरने का निवेदन करेंगे. इसके भरते ही और उसमें दिए गए कुछ विशेष, रटे-रटाये सवालों के जवाब देकर आप विशेषज्ञ हो जायेंगे कोविड-19 के, कोरोना के. इसके लिए आप अपने को कोरोना योद्धा भी कह सकते हैं. जिन खबरों से बचने के लिए टीवी बंद करवा दिया, समाचार-पत्र बंद करवा दिया, इंटरनेट पर भी समाचार चैनलों को, लिंक को खोलना-देखना बंद कर दिया वही विषय सिर खाने के लिए मोबाइल से झाँकने लगा है.

समझ नहीं आ रहा कि सरकार ने लॉकडाउन कोरोना संक्रमण से बचने के लिए किया है या कोरोना विशेषज्ञ बनाये जाने वालों की पैदाइश के लिए? सरकार को इस अनावश्यक टॉर्चर किये जाने को भी लॉकडाउन का उल्लंघन माना जाना चाहिए. वैसे भी उच्चीकृत मास्टर इस समय या तो मूल्यांकन कार्य में छपाई कर रहा होता या फिर घूमने में गँवाई. ऐसे में उन नवोन्मेषी वेबिनार वालों पर संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए जो न केवल लिंक भेजने का कार्य करते हैं बल्कि असमय फोन करके लॉकडाउन की शांति भंग करने का प्रयास भी करते हैं.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

बुधवार, 20 मई 2020

छीछालेदर रस से सराबोर सम्मान और उपाधि ले लो रे

चीनी उत्पादों के जैसे इसकी तासीर न निकली. जैसे सारे चीनी उत्पाद सुबह से लेकर शाम तक वाली स्थिति में रहते हैं ठीक उसी तरह से इस कोरोना वायरस को समझा गया था. हर बार की तरह इस बार भी चीन को समझने में ग़लती हुई और कोरोना हम सबके गले पड़ गया. कोरोना का इधर गले पड़ना हुआ उधर सरकार ने लॉकडाउन लगा दिया. कहा जा रहा था कि इस आपदा में भी अवसर तलाशने चाहिए. आपदा को अवसर में बदलने की कोशिश करनी चाहिए. बस, इसे गाँठ बांधते हुए बहुत से अति-उत्साही अवसर बनाने निकल आये. कुछ खाना बनाने में जुट गए तो कुछ ने जलेबी बनाने में विशेषज्ञता हासिल कर ली.


इसके साथ ही बहुतेरे लोग ऐसे थे जो स्वयंभू रूप में कोरोना योद्धा बने युद्ध करने में लगे थे. इनका युद्ध किसी को नहीं दिख रहा था. जैसे युद्धनीति में एक कौशल छद्म युद्ध की मानी जाती है, गुरिल्ला युद्ध तकनीक मानी जाती है, कुछ ऐसा ही ये योद्धा कर रहे थे. बिना किसी की नजर में आये, बिना किसी को हवा लगने के ये युद्ध किये जा रहे थे. अब चाहे जितना छद्म युद्ध लड़ लो, चाहे जितना गुरिल्ला युद्ध लड़ लो, चाहे जितना छिपकर काम करो मगर तकनीक के आगे किसी की नहीं चलती. तकनीक से सारी गोपनीयता उजागर हो जाती है. तो इसी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए बहुत से तकनीकबाजों ने पता लगा ही लिया कि कौन-कौन कथित योद्धा है. बस, इस खोज को उनके द्वारा उजागर भी कर दिया गया. 

इन तकनीकबाजों ने सभी को अपने-अपने स्तर से सम्मानित करना शुरू कर दिया. सम्मान भी वैसा जैसे कि योद्धा थे. न योद्धा दिखाई दिए, न सम्मान करने वाले. लॉकडाउन में योद्धा अपना काम करते रहे, सम्मान देने वाले अपना काम करते रहे. उन्होंने हवा में कलाबाजियाँ दिखाईं तो इन्होंने भी कलाकारी दिखाई. इसी कलाकारी में कई कलाकार रह गए. अब जो रह गए उनके प्रति भी समाज का कुछ कर्तव्य बनता है. उनके लिए भी कुछ कलाकारी दिखाने की आवश्यकता तो है ही. यही विचार जैसे आया तो लगा कि ऐसे लोगों के हौसले को टूटने नहीं देना है. आखिर बिना किसी को भनक लगे, बिना किसी काम के योद्धा बन जाना सहज नहीं होता. तो ऐसी सहजता वालों को भी सामने लाने का दायित्व समाज का है.  


इस तरह की बात मन में आई और एक योजना बना दी गई. रह गए अदृश्य योद्धाओं को सम्मानित करने की पुनीत योजना का शुभारम्भ जल्द ही किया जाना है. इसमें योद्धाओं जैसे लोगों को प्रमाण-पत्रसम्मान-पत्रसम्मानोपधियाँ देने का अति-पुनीत कार्य किया जायेगा. अब समस्या यही कि ऐसे छिपे लोगों को खोजा कैसे जाए क्योंकि तकनीकबाजों जैसी तकनीक यहाँ उपलब्ध नहीं. इसके लिए एक उपाय खोजा गया. इस योजना को सोशल मीडिया पर डाला गया. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि सभी तरह के योद्धा सोशल मीडिया पर उपस्थित हैं. सुस्त रूप में भी, सक्रिय रूप में भी. ऐसे में जो स्वयंभू योद्धा किसी अन्य तकनीकबाज से सम्मानित न हो सके हैं, और यदि वे सम्मानित होने के इच्छुक हैं तो ऐसे सुसुप्त जागरूक लोग अपना नाममाता-पिता का नामजन्मतिथि (इसे वैकल्पिक व्यवस्था में रखा गया है)पता हमें भेजें. 

यहाँ विवरण भेजते समय विशेष रूप से ध्यान रखें कि अपनी कार्य सम्बन्धी जानकारी का कोई विवरण नहीं भेजना है. ऐसा करने पर आवेदन निरस्त माना जायेगा. कार्य विवरण की अपेक्षा इसलिए नहीं क्योंकि इसे किसी गुप्त तकनीक की सहायता से खोद कर निकाल कर सामने लाया जायेगा. अभी इच्छुक बस अपना सम्मान, प्रमाण, उपाधि प्राप्त करें. हाँकिसी को यदि कोई विशेष उपाधिसम्मान की मनोकामना है तो उसे अवश्य बताएँ.  सभी की मनोकामना पूर्ण की जाएगी. ऐसा किये जाने के पूर्व छीछालेदर रस में सराबोर सम्मान आपको ससम्मान प्रदान करने की शपथ ली जाती है. जिनको सम्मान, उपाधि प्रदान की जाएगी, उनसे भी अपेक्षा रहेगी कि वे इस कोरोना काल में लॉकडाउन समय जैसा छीछालेदर रस सदैव बहते रहेंगे.


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