शुक्रवार, 17 दिसंबर 2021

घर, इंसान का लुप्त होना : कविता

कभी हुआ करता था

इक मकान में

इक घर कोई,

उस घर में रहते थे

इंसान कई.

 

घर कहीं लुप्त हो गया है,

अब एक मकान में

बन गए हैं मकान कई.

 

इंसान कहीं गुम हो गए हैं,

अब एक इंसान में

बन गए हैं मकान कई.


अब कहीं घर नहीं है,

अब कहीं इंसान नहीं है,

अब सिर्फ मकान हैं

क्योंकि इंसान ही मकान है.

 

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कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र

17.12.2021

 

रविवार, 19 सितंबर 2021

अँधेरी रात का सूरज

आज एक साल आठ महीने से कुछ अधिक समय बाद रुद्रांश ने बैडमिंटन हॉल की देहरी को छुआ. समय ने उसे उस कालखंड में खड़ा कर दिया जबकि वह मात्र छह साल का था. वही बैडमिंटन हॉल, लगभग वही समय और उसकी स्थिति भी इतने सालों बाद भी लगभग वही. उस शाम वह अपने पिता के साथ यहाँ आया था. उस शाम भी उसके पिता उसके हाथों को अपनी हथेली में थामे हुए थे. वह रुकते-रुकते से, असहजता भरे कदमों के सहारे आगे बढ़ रहा था. दाहिने हाथ में एक रैकेट उसके शौक को दर्शा रहा था.


आज भी स्थिति बहुत अलग सी नहीं थी. उस शाम और आज की शाम में वह एक साम्य देख रहा था. आज उस शाम की तरह उसके साथ उसके पिता नहीं बल्कि उसका अभिन्न मित्र अमन था. मित्र होने के बाद भी वह किसी अभिभावक की मुद्रा में रुद्रांश की हथेली को अपनी हथेली में मजबूती से थामे हुए था. आज भी रुद्रांश के कदम उसी शाम की तरह रुक-रुक कर, असहजता से आगे बढ़ रहे थे. दाहिने हाथ में आज बैडमिंटन के रैकेट की जगह छड़ी थी, जिसके सहारे से वह खुद को खड़ा करने में, चलाने में सहज होने का प्रयास कर रहा था.


बैडमिंटन हॉल में प्रवेश से पहले उसे पिता का स्वर कानों में गूँजने का आभास हुआ. बेटा, यह तुम्हारी कर्मस्थली है. तुम्हारे लिए यह पवित्र जगह जैसी होनी चाहिए. इसका आशीर्वाद लेकर ही अपने काम को आगे बढ़ाना. अपने पिता के ऐसे शब्द सुनकर उसका माथा स्वतः ही आदर, सम्मान के साथ हॉल की देहरी पर झुक गया. उस शाम से लेकर अंतिम बार हॉल में आने तक यह क्रम बराबर बना रहा. ऐसा रुद्रांश सिर्फ इसी हॉल की देहरी पर नहीं करता था बल्कि वह जहाँ-जहाँ भी प्रतियोगितों में सहभागिता करने के लिए जाता मुख्य द्वार की वंदना करने के बाद, उसके समक्ष मस्तक झुकाने के बाद ही अन्दर प्रवेश करता था. ऐसा ही वह कोर्ट में जाने के पहले भी करता था. उसके इस कार्य को देखने के बाद उसके साथ के बहुत से खिलाड़ी उसका मजाक उड़ाते थे. उसे पोंगापंथी, दकियानूसी, पुराने ख्यालों का बताया करते. रुद्रांश खुद को इन सब बातों, कटाक्षों से बेखबर रखते हुए बस अपने खेल पर ही ध्यान लगाये रहता. उसकी तन्मयता, अनुशासन, नियमितता, खेल के प्रति समर्पण का ही सुखद परिणाम रहा कि वह जल्द ही विभिन्न प्रतियोगिताओं का विजेता बनने लगा.




अमन का हाथ थामे रुद्रांश धीरे-धीरे चलता हुआ किनारे पड़ी कुर्सियों में से एक पर बैठ गया. उसे देखकर हॉल के अन्दर अपना अभ्यास कर रहे कुछ खिलाड़ियों के चेहरे पर ख़ुशी की चमक दिखाई दी, कुछ ने उसे देखकर नजरअंदाज किया तो कुछ शांत भाव से अपने काम में लगे रहे. पिछले कई महीनों में कुछ नए-नए चेहरे अभ्यास के लिए आ चुके थे इस कारण उनका परिचय रुद्रांश से नहीं था. कुछ देर के इंतजार के बाद रुद्रांश के कोच का आना हुआ.


“सर, मैं अपनी प्रैक्टिस फिर से शुरू करना चाहता हूँ.” रुद्रांश के इस वाक्य को सुनकर उसके कोच का चेहरा आश्चर्य से भर गया.


“क्या वाकई तुम अब ऐसा कर पाओगे?” कोच ने रुद्रांश के कंधे पर अपना हाथ रखते हुए कहा.


“जी सर.” रुद्रांश के जवाब में वही आत्मविश्वास झलक रहा था जैसा कि उस शाम था जबकि उसने पहली बार इस हॉल में कदम रखा था. रुद्रांश ने अपनी पूरी स्थिति, अपनी तैयारी के बारे में अपने कोच को बताया.


“ठीक है. यह बड़ी सुखद स्थिति होगी यदि तुम अपना खेल वहीं से फिर शुरू कर सको, जहाँ से रोक दिया था. मैं बराबर तुम्हारे साथ हूँ.” कोच ने उसका हौसला बढ़ाते हुए कहा. रुद्रांश बिना कुछ कहे बस अपने कोच के हाथ को अपनी मुठ्ठी में थामे हुए था, जैसे इन्हीं हाथों की ताकत लेकर वह फिर विजेता बनकर उभरेगा.


“कब से आओगे प्रैक्टिस के लिए?” अगले सवाल पर रुद्रांश जैसे नींद से जागा.


“सर, कल सुबह से. आज तो आपसे मिलने, आपको अपनी इच्छा बताने, आपका  आशीर्वाद लेने आया था.” रुद्रांश के इतना कहते ही उसके कोच ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और सुबह से प्रैक्टिस करने की सहमति देते हुए कोर्ट पर पसीना बहाते खिलाड़ियों की तरफ चल दिए.


रुद्रांश अपने कोच को ख़ामोशी से जाते देखता रहा. दिल-दिमाग में तमाम सारे सवाल उठने लगे. खिलाड़ियों से भरे हॉल में भी उसे अपने चारों तरफ एक ख़ामोशी सी नजर आने लगी.


उस शाम ऐसी ख़ामोशी नहीं थी. पूरा कोर्ट दर्शकों के, उसके प्रशंसकों के शोर से भरा हुआ था. फाइनल का रोमांचक मैच अपने चरम पर चल रहा था. काँटे की टक्कर के बीच अंततः रुद्रांश ने अपने चाहने वालों को निराश न किया और उस प्रतियोगिता को जीत लिया. गले में मैडल, हाथों में चमकती ट्राफी लिए रुद्रांश लोगों से घिरा हुआ था. सभी उसके साथ फोटो खिंचवाना चाहते थे.


रुद्रांश प्रतियोगिता का विजेता बनने के कारण तो प्रसन्न था ही, साथ ही इसके लिए भी बहुत खुश था कि उसका चयन राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता के लिए हो गया था. पिछले दो बार से वह राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में भी विजेता बन रहा है. इस बार उसे अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में चयनित किये जाने की सम्भावना नजर आ रही थी.


प्रतियोगिता के बाद की तमाम सारी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद रुद्रांश अपनी टीम, दोस्तों के साथ अपने शहर के लिए निकल चला. जीतने की ख़ुशी को जैसे किसी की नजर लग गई थी या कहें कि रुद्रांश के सपने पर कोई ग्रहण लगने वाला था. अपने शहर के करीब पहुँचते ही अचानक से उसकी कार के आगे का टायर फट गया. कार असंतुलित होकर बिजली के खम्बे से टकरा गई.


रुद्रांश जैसे चौंक उठा तो अमन ने उसकी तरफ देख मौन प्रश्न उछाल दिया.


“कुछ नहीं. बस बीते दिन याद आ गए.” रुद्रांश इतना कह कर मुस्कुरा दिया.


अमन ने उसके हाथों को थपथपाते हुए कहा कि “क्यों परेशान होते हो, सबकुछ फिर पहले जैसा होगा. पहले जैसे दिन फिर लौटेंगे.”


“यार, सवाल उन दिनों को याद करने का या भुलाने का नहीं है. सवाल अब खुद से यह है कि सर से कह तो दिया कल से प्रैक्टिस पर आने के लिए पर क्या ये मुझसे हो पायेगा?”


“सब होगा, सब होगा बस तुम धैर्य न खोना.” अमन ने दिलासा देते हुए कहा.


रुद्रांश उसके विश्वास को देख पनीली आँखें लिए वापस कोर्ट में खेलते खिलाड़ियों को देखने लगा. वो काली रात क़यामत बनकर उसके सामने आ खड़ी हो गई थी. उसके हाथ, पैरों में बहुत ज्यादा चोट आई थी. अपने शहर के नजदीक होने के कारण मेडिकल सुविधा भी तत्काल मिल गई थी. डॉक्टर्स की तीन दिनों की जद्दोजहद, अनथक मेहनत के बाद भी उसके बाएँ पैर में किसी तरह का सुधार नहीं हो रहा था. घावों की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही थी. तमाम सारे निष्कर्षों और जाँचों के बाद उसके पैर को जाँघ से काटने का कठोर निर्णय लेना पड़ा.


रुद्रांश की गतिविधियों से, उसकी प्रतिभा से सभी परिचित थे. ऐसे में पैर का काटा जाना उसके स्वर्णिम भविष्य को, खेल जीवन को रोकने जैसा था. इसके बाद भी उसके जीवन को बचाना महत्त्वपूर्ण था. जान है तो जहान है के सिद्धांत का पालन करते हुए, उसके शरीर को धीरे-धीरे फैलते जहर से बचाने के लिए पैर को अलग कर दिया गया. उस दिन न केवल रुद्रांश, उसके परिजनों, मित्रों की आँखों में आँसू थे बल्कि उसका शहर भी आँसुओं के सागर में डूबा हुआ था.


“चलें?” अमन ने रुद्रांश की विचार-यात्रा पर रोक लगाई.


सिर हिलाकर अपनी सहमति देकर रुद्रांश छड़ी के सहारे उठ कर अमन के कदम से कदम मिलाता हुआ कोर्ट से बाहर जाने को चल दिया.




दुर्घटना के बाद उसकी जान बचाने के लिए पैर को जाँघ से अलग कर दिया गया. धीरे-धीरे उसके स्वास्थ्य में सुधार भी होने लगा. खिलाड़ी होने के कारण रुद्रांश ने हारना, जीतना उसने बहुत नजदीक से देखा था मगर पैर काटे जाने के बाद उसे अपने चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ हार ही नजर आती. अपने विश्वास को मजबूत करके वह किसी भी तरह से खुद को जीतते हुए देखना चाहता था.


समय गुजरता रहा. कृत्रिम पैर लगने के साथ उसका सामान्य जीवन में वापस लौटने के उपक्रम भी होने लगा. पैर में दिक्कत ज्यादा होने के कारण उसे छड़ी का सहारा भी लेना पड़ता था. उसके परिजन, मित्र आदि कृत्रिम पैर के सहारे उसका चलना देख कर, अपने काम करते देख कर प्रसन्न होते मगर रुद्रांश कहीं न कहीं खुद में अकेलापन महसूस करता. वह जानता था कि उसका उद्देश्य महज सामान्य रूप से जीते जाने का नहीं है बल्कि बैडमिंटन में अपना सर्वश्रेष्ठ देना चाहता था, खुद को सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के रूप में स्थापित करना चाहता था.


उसने अपने मन की बात कई बार अपने घर में कही. घरवालों ने उसकी भावनाओं का सम्मान किया मगर वे समझ नहीं पा रहे थे कि वह अब कृत्रिम पैर के सहारे बैडमिंटन कैसे खेल सकेगा. उसे खुद भी समझ नहीं आ रहा था कि जहाँ उसका सामान्य रूप से चलना, कदमों को आगे-पीछे करना आसान नहीं है, पैर की स्थिति के कारण कई बार वह चलते हुए लड़खड़ा जाता था ऐसे में वह खुद को कोर्ट में कैसे खड़ा रख सकेगा. कई बार उसे अपना ही विश्वास खोता दिखाई देता फिर वह खुद को समझाते हुए अपने को अगले पल के लिए तैयार करता. वह खुद को समझाता कि वह किसी न किसी दिन कोर्ट में हाथ आजमाएगा.


“सुबह कितने बजे चलने का विचार है?” रुद्रांश के घर के सामने बाइक रोकते हुए अमन ने पूछा.


“अपने ही पुराने समय पर चलते हैं.”


“ठीक है, मैं सुबह छह बजे प्रकट होता हूँ. तुम तैयार रहना.”  रुद्रांश के जवाब पर अमन ने मुस्कान बिखेरते हुए कहा.


आज की रात रुद्रांश की आँखों में नींद नहीं थी. वह सुबह की प्रतीक्षा में न सो पा रहा था और न ही जाग पा रहा था. ऐसी जाने कितनी रातें उसने अपने कमरे में बेचैनी से कभी टहलते, कभी बिस्तर पर करवट बदलते गुजारी थी. संशय, परेशानी, दर्द, असमंजस भरी ऐसी ही अनेक रातों के बीच एक रात जब नींद उससे कोसों दूर थी तो दिमाग में उपजे एक विचार ने जैसे उसे आश्वस्त किया.


कवर से बैडमिंटन रैकेट निकाल कर वह अपने बंद कमरे में आभासी अभ्यास की कोशिश करने लगा. कभी उसका पैर आगे बढ़ जाता, कभी इसमें भी मुश्किल होती. कभी सहजता से वह कदमों को आगे-पीछे कर लेता और कभी लड़खड़ा जाता. इस आभासी अभ्यास में वह दो-तीन बार गिर भी पड़ा. कुछ मिनट के इस प्रयास में वह थकान महसूस करने लगा मगर वह खुद में अब कुछ सहज सा, कुछ अच्छा सा महसूस कर रहा था.


अब यह आभासी अभ्यास उसकी दिनचर्या में शामिल हो गया था. घरवालों की जानकारी के बिना वह अपने बंद कमरे में दिन में, रात में जैसे ही समय मिलता अभ्यास करने में जुट जाता. रुद्रांश के घरवालों को अब उसके चलने की, स्वास्थ्य की, पैर की बहुत अधिक चिंता रहती थी, इसी कारण वह डरता था कि घरवालों को जानकारी हो जाने पर उसका अभ्यास रुकवाया जा सकता है. उसके इस आभासी अभ्यास की जानकारी सिर्फ उसके अभिन्न मित्र अमन को थी. कभी-कभी वह उसके इस अभ्यास का साथी बनता, ठीक उसी तरह जैसे कि खेलते समय कोर्ट में बनता था.


कुछ महीनों के अभ्यास के बाद रुद्रांश ने मजबूती के साथ अपने कदमों का संतुलन बना लिया था. लगातार अभ्यास के कारण दर्द में, पैर की स्थिति पर भी उसका नियंत्रण बन गया था. भले ही उसमें पहले की तरह फुर्ती न दिखाई देती थी मगर वह खुद को पहले की तरह ही फुर्तीला बनाए रखने की कोशिश में सफल हो रहा था. इस कोशिश को वह अब वास्तविक बैडमिंटन कोर्ट के ऊपर निखारना चाहता था. इसे वह अच्छी तरह जानता था कि बंद कमरे में आभासी अभ्यास में और कोर्ट के ऊपर वास्तविक खेल में जमीन आसमान का अंतर है.


एक दिन उसने बैडमिंटन कोर्ट जाने की अपनी इच्छा घरवालों के सामने व्यक्त किया तो सबके आश्चर्य की सीमा न रही. किसी को विश्वास ही न हो रहा था कि इस स्थिति में भी रुद्रांश बैडमिंटन खेल सकता है. अपने घर की छत पर बने ओपन कोर्ट में जब उसने अमन के साथ अपने अभ्यास की नियमितता को दिखाया तो उसे अमन के साथ ही, उसकी देखरेख में कोर्ट जाने की अनुमति मिली.


पलंग पर लेटे हुए सोने की कोशिश में आज की रात उसे फिर उसी काली रात के ठीक पहले के सुनहले पल में ले गई जबकि उसके एक बेहतरीन खेल ने उसे विजेता बना दिया था. तालियों की गूँज, उसके प्रशंसकों का शोर अब उसे फिर से सुनाई दे रहा था. अब वह पहले की तरह बैडमिंटन कोर्ट में एक विजेता की तरह फिर से पदार्पण कर रहा था. नया सूरज खिलने की राह निर्मित हो रही थी और काली रात पलकों पर नींद के सहारे गुजरती जा रही थी.

 

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गुरुवार, 13 मई 2021

आएगी फिर वही सुहानी सुबह - कविता

आएगी फिर वही सुहानी सुबह

जब

सुनाई देगा

सूरज की रौशनी के साथ

कलरव पंछियों का,

सुनाई देगा

शोर स्कूल के लिए

दौड़ते-भागते बच्चों का.

 

आएगी फिर वही सुहानी सुबह

जब

गलियों में

जमी होगी महफ़िल

सुबह की सैर करने वालों की,

नुक्कड़ की गुमटी पर

सज रही होंगी होंठों पर

चुस्कियाँ चाय की.

 

आएगी फिर वही सुहानी सुबह

जब

सड़कों, गलियों में

वीरानियों के साए

डरा नहीं रहे होंगे,

दोस्त-यार-परिजन

गलबहियाँ करते हुए

त्यौहार मना रहे होंगे.

 

आएगी फिर वही सुहानी सुबह

जब

नहीं सुनाई देगा

किसी घर, गली से

कोई करुण क्रंदन,

नहीं सुनाई देंगे

अनचाहे से

एम्बुलेंस के सायरन.

 

आएगी फिर वही सुहानी सुबह

जब

हम सभी

कड़वी यादों को

कहीं दफ़न कर आयेंगे,

फिर एक बार

हँसेंगे, खिलखिलाएँगे

ज़िन्दगी को जीना सिखायेंगे.

 

जल्दी ही

आएगी फिर वही सुहानी सुबह.




रविवार, 7 फ़रवरी 2021

तुम्हारे साथ जो गुजरी वो छोटी जिंदगानी है



तुम्हारे साथ जो गुजरी वो छोटी जिंदगानी है, 
वही बाकी निशानी है वही बाकी कहानी है। 
तुम्हारे दूर जाने से न जीवन सा लगे जीवन,
रुकी-रुकी सी है धड़कन न साँसों में रवानी है।

तुम्हारी याद के साए में अब जीवन गुजरना है,
लबों पर दास्तां तेरी इन आँखों को बरसना है।
नहीं तुम सामने मेरे मगर मुझको यकीं है ये,
मेरी आँखों में बसना है मेरे दिल में धड़कना है।

भुलाया जाएगा न जो तू ऐसा दर्द लाया है,
तुम्हारे संग हँसे-खेले तुम्हीं ने अब रुलाया है।
हुई होगी कोई गलती हमसे ही निश्चित ही,
तभी तो रूठ कर तुमने अपने को छिपाया है।




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वंदेमातरम्

सोमवार, 30 नवंबर 2020

हकीकत है कोई ख्वाब नहीं

साँसें खर्च हो रही हैं

बीती उम्र का हिसाब नहीं,

फिर भी जिए जा रहे हैं तुझे

ऐ ज़िन्दगी तेरा जवाब नहीं.

 

देख तेरी बेरुखी इस कदर 

मन करता है छोड़ने का तुझे,

रोक लेतीं हैं नादानियाँ तेरी  

कि तू इतनी भी खराब नहीं.

 

फूल, कली, सितारे, चंदा

सबमें खोजा तुम सा कोई,

हर शै में मिले हँसीं मगर

किसी में तुझ सा शबाब नहीं.

 

ख्वाब देखा था कभी

तुझे ज़िन्दगी में बसाने का,

ज़िन्दगी बन गए तुम मेरी

ये हकीकत है कोई ख्वाब नहीं.


शनिवार, 6 जून 2020

दो दिलों की राहें

कितने बजे पहुँचोगी स्टेशन? रुद्रांश ने सीधा सा सवाल पूछा.


क्यों, मिलने की बहुत जल्दी है? ट्रेन के समय पर ही पहुंचेंगे. उधर से अनामिका ने खिलखिलाते हुए उसकी बात का जवाब दिया. दोनों तरफ से फिर हलकी-फुलकी नोंक-झोंक होते हुए बात समाप्त हुई.

ट्रेन अपनी स्पीड से दौड़ी जा रही थी. दोनों का दिल भी उसी तेजी से धड़क रहा था. उनका दिल कर रहा था कि ये सफ़र कभी ख़तम न हो, बस ऐसे ही चलता रहे और वे दोनों भी साथ चलते रहें. उनके चाहने से क्या होना था क्योंकि न तो समय को उन दोनों के लिए रुकना था और न ही ट्रेन को. समय ने तो जैसे उनका साथ ही नहीं दिया. किसी न किसी रूप में उनको बंधन में बाँधे रखा था, जिसके चलते वे दोनों कभी एकदूसरे से अपने दिल की बात न कह सके. आज दोनों के पास उतना ही समय था, जितना कि उस यात्रा ने दे रखा था. इसको वे दोनों पूरी आज़ादी से बिताना चाह रहे थे, बिता भी रहे थे.

अनामिका रुद्रांश के साथ अकेले यात्रा कर रही थी. अकेले क्या, अनामिका पहली बार रुद्रांश के साथ किसी यात्रा पर थी. उस छोटे से शहर में जहाँ लोग क्या कहेंगेका संकोच होने के कारण अनामिका कभी भी रुद्रांश के साथ न पैदल घूमने निकली न कभी उसकी बाइक पर. ऐसा नहीं कि रुद्रांश ने कभी अनामिका से नहीं कहा साथ चलने को या ऐसा भी नहीं कि अनामिका का मन न हुआ उसके साथ घूमने को मगर अपनी सीमाओं के कारण वे दोनों कभी एकसाथ अपने ही शहर की गलियों में, सड़कों पर न टहल सके.


चाय पियोगी या कोल्ड ड्रिंक? कोच में आये वेंडर को देखकर रुद्रांश ने उससे पूछा.

कुछ भी, जो तुम्हारा मन हो वही पी लेंगे. अनामिका ने अपनी पसंद भी रुद्रांश की पसंद से जोड़ दी.

हमारा मन तो कुछ और पीने का रहता है और वो यहाँ मिलेगा नहीं. तुम भी पियोगी? कहते हुए रुद्रांश हँस दिया.

अनामिका ने मुँह बिचकाते हुए उसके चेहरे पर पंच मारने का भाव दिखाया, फिर पी लो, जो पीना हो. हमसे क्यों पूछ रहे. हमें न पीना कुछ, न तुम्हारी चाय न कोल्ड ड्रिंक.

अरे, गुस्सा न हो. चाय ही पीते हैं. कहते हुए रुद्रांश ने दो चाय का आर्डर दिया.

हमें न पीनी. तुम ही पी लो दोनों कप. अनामिका मुँह फेर कर बैठी गई.

रुद्रांश ने मुस्कुराते हुए एक कप अनामिका की तरफ बढ़ा दिया. उसने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए रुद्रांश के हाथ से कप लेकर होंठों से लगा लिया.

वैसे चाय जैसा स्वाद तो नहीं होता है बीयर में. रुद्रांश ने कहते हुए जीभ अपने होंठों पर फिराई.

अनामिका ने आँखें तरेरते हुए उसे देखा. फिर शुरू हो गए.

रुद्रांश ठहाका लगाते हुए चुपचाप चाय पीने लगा.

क्या राक्षसों जैसे हो-हो-हो करने लगते हो? अनामिका ने भी उसके हँसने की नक़ल उतारी.

ऐसा ही हल्का-फुल्का हँसी-मजाक दोनों के बीच ऑफिस में भी चलता रहता था. वे दोनों एकदूसरे को पसंद करने के बाद भी अपनी भावनाओं का इजहार नहीं कर पाये थे या ऐसा करने से बचते रहे थे. दोनों तरफ किसी न किसी तरह के बंधन स्पष्ट रूप से उनको रोकने का काम करते.

पूरे सफ़र के दौरान कई बार रुद्रांश के मन में आया कि अनामिका से अपने दिल की बात कह दे मगर वह समझता था कि अब इसका कोई अर्थ नहीं. अब तो सामाजिक परम्पराओं, रीति-रिवाजों ने भी उन दोनों के पैरों में बंधन बाँध दिए थे. उसके साथ यात्रा कर रही, हँसती अनामिका उसके साथ होकर भी उसकी न थी. उसके पास होकर भी उससे बहुत दूर थी. आँखें बंद कर उसने अपना सिर सीट पर पीछे की ओर टिका लिया.

क्या हुआ? क्या सोचने लगे?

रुद्रांश ने अनामिका के सवालों का जवाब देने के बजाय आँखें खोले बिना ख़ामोशी से अपनी हथेलियों के बीच अनामिका की हथेली को थाम लिया. अनामिका ने महसूस किया जैसे वह अपने आगोश में उसे छिपाने की कोशिश कर रहा हो. ट्रेन की रफ़्तार भरे शोर के बीच भी दोनों एकदूसरे के दिल की धड़कन को सुन पा रहे थे. ऐसा लग रहा था जैसे पूरे कोच में नितांत ख़ामोशी के बीच सिर्फ वही दोनों हैं. अनामिका ने अपनी दूसरी हथेली रुद्रांश के हाथ पर रखते हुए अपना सिर उसके कंधे पर टिका आँखें बंद कर लीं.

एकदूसरे के जज्बातों को वे दोनों ही समझ रहे थे. उनके बीच का मौन वार्तालाप ही सबकुछ कह रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे दोनों के दिल आपस में अपने दिल की बात कर रहे हों. इससे पहले की दोनों की मौन भावनाएँ आँखों के रास्ते से बाहर आ जाएँ रुद्रांश ने शरारत से अनामिका को छेड़ते हुए उसके कान में धीरे से कहा वो महिला सोच रही होगी कि ये कैसी लड़की इसके साथ बैठी है. जरा भी मैच नहीं कर रही.

अनामिका ने आँखें खोलकर देखा तो सामने बैठी एक महिला को अपनी ओर ताकते पाया. उसने कोहनी मारते हुए बनावटी गुस्सा दिखाया, तो उसी के बगल में बैठ जाओ. खुद को ज्यादा स्मार्ट न समझो.

दोनों एकदूसरे की तरफ देख मुस्कुरा दिए. रास्ते भर कभी संवेदित होते, कभी भावनाओं में बहते हुए, कभी हास-परिहास करते, कभी दिल की बात कहते-कहते रुकते, कभी एकदूसरे को छेड़ते कब वे अपने शहर के प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े थे, उन्हें पता ही न चला. शाम गहराकर रात में बदलने वाली थी. सडकों को अँधेरे ने घेरना शुरू कर दिया था.

हमारे साथ चलो रिक्शे से. पहले तुमको घर छोड़ देते हैं. रुद्रांश ने कहा.

, , मैं चली जाऊँगी. लोग देखेंगे एकसाथ तो न जाने क्या कहें. अब तो और भी कहेंगे. संकोच अनामिका के शब्दों में स्पष्ट झलक रहा था.

दोनों ख़ामोशी के साथ अपरिचितों की तरह बाहर निकले. रुद्रांश का रिक्शा कुछ दूरी बनाकर अनामिका के रिक्शे के पीछे तब तक चलता रहा जब तक कि वह सुरक्षित अपने घर न उतर गई.

छोटे से शहर के बड़े से अनजाने भय में दो दिल अलग-अलग चलते रहे. अलग-अलग चलते चले गए.

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शुक्रवार, 22 मई 2020

हम ही जीतेंगे कह दो ये सबसे मगर - कविता

फूल खिलने लगे गुलशन के मगर,
फूल गुमसुम हैं कितने घर के मगर.
कौन आया जहाँ में ये हलचल हुई.
आज डरने लगे लोग खुद से मगर.


दौड़ती-भागती ज़िन्दगी है थमी,
न आये समझ क्या गलत क्या सही.
सबकी आँखों में कितने सवालात हैं,
उनके उत्तर नहीं हैं मिलते मगर. 



लोग हैरान हैं और परेशान हैं,
खोजते मिलके कोई समाधान हैं.
एक पल में अँधेरा ये छंट जाएगा,
दीप विश्वास के रहें जलते मगर.

जिनकी कोशिश कोई साँस टूटे नहीं,
हम सब संग हैं वे अकेले नहीं.
है लड़ाई अनजान अदृश्य से,
हम ही जीतेंगे कह दो ये सबसे मगर.


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