शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

चोरी का कुत्ता या बौद्धिकता

कृत्रिम दुनिया की अपनी-अपनी कलाकारियों को दिखाने हेतु, उनको और अद्भुत रूप में प्रदर्शित करने के लिए मेला लगा हुआ था. चकाचौंध भरे वातावरण में सभी मदारी अपने-अपने जमूरों के साथ खेल दिखाते नजर आ रहे थे. सबकुछ हँसते-खेलते चल रहा था कि अचानक एक कुत्ता रंग में भंग करने को आ गया. आश्चर्य देखिये कि आरोप लगाया जा रहा कि कुत्ता चोरी का है. कृत्रिम कुत्ते पर भी कोई दूसरा दावा कर रहा कि वो कुत्ता उसका है. देखते-देखते कृत्रिम कुत्ते की चर्चा चारों तरफ छा गई.

 

अपने आपको चर्चाओं से अलग करने का विचार बना ही रहे थे कि एक मित्रवर ने घर पर धमकते हुए ‘चाय पिलवाओ’ के नारे को उछाल कर मेले के कुत्ते को, मतलब कुत्ते की चर्चा को सामने उगल दिया. बोले यार, दिमाग लाख चाहने के बाद भी कुत्ते से अलग नहीं हो पा रहा है. कृत्रिम दुनिया के इस एक कुत्ते ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है. हमने भी बात को टालने की गरज से कहा कि कुत्ता चोरी करने वाले का खेला मेले से अलग कर दिया गया है, अब छोड़ो ये मगजमारी. 

 



मित्रवर ठहाका मारकर हँसे और बोले कैसे छोड़ दें इस मगजमारी को? एक कुत्ता चोरी सबके सामने आ गई तो चर्चा बन गई मगर कभी सोचा है कि ऐसा हुआ क्यों? हमारी प्रश्नवाचक आँखें देखकर वे आगे बोले, जब तक शिक्षा संस्थानों को, प्राध्यापकों को आँकड़ेबाजी में लगाये रखा जायेगा, तब तक यही चुरकटपना देखने को मिलता रहेगा. आँकड़े इधर-उधर करने के खेल में चौबीस घंटे व्यस्त रहने वाले मौलिकता, वास्तविकता की तरफ कैसे और कब ध्यान दे पाएँगे? चाय के अंतिम घूँट तक आते-आते मित्रवर ने कमजोर नब्ज पर चोट करते हुए बाँयी आँख दबाते हुए हमें आइना दिखाया कि खुद अपने उच्च शिक्षा क्षेत्र को देखो. दो-चार किताबों से चोरी करके कुछ बनाया तो उसे कह दिया रिसर्च पेपर और चालीस-पचास किताबों से चुराकर जो बनाया वो बता दी थीसिस. क्या कहेंगे इसे, एपीआई का जुगाड़, पोर्टल की आँकड़ेबाज़ी या फिर मौलिक काम?

 

मित्र के जाने के बाद अपने गिरेबान में झाँकने की कोशिश की तो नीतिगत झोल, चौर्य बौद्धिकता जैसा बहुत कुछ नजर आने लगा. एक बनाया गया था विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, जिसे लोग प्यार से यूजीसी कहते हैं. हाल-फिलहाल तो ये भी चर्चा के केन्द्र में बना हुआ है मगर जब इसे बनाया गया था तो उसका उद्देश्य उच्च शिक्षा क्षेत्र में कुछ क्रांतिकारी कदमों का उठाया जाना था. प्यारे-प्यारे से यूजीसी को बनाने वालों को लगा कि देश भर में उसके खेल के मुकाबले बहुत बड़ी संख्या हो गई है तो खेला करने को कुछ और नया चाहिए. समय बदलता रहा, व्यक्तियों का मूल्यांकन होता रहा तो विचार किया गया कि अब संस्थानों का भी मूल्यांकन किया जाए. विचार का आना भर था कि उसी के साथ आ गए ‘नैक’ वाले. इनके द्वारा अनेकानेक तरह से संस्थानों को मथा जाने लगा पर किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि ये चकरघिन्नी का खेल किसके लिए खेला जा रहा है. सबकुछ ‘मैनेज करने के चक्कर में ‘इधर की ईंट, उधर का रोड़ा’ वाला हाल बना हुआ है.

 

परेशान लोग और अधिक परेशान होते रहे मगर खेला बंद न हुआ. मौलिक और नवीन के चक्कर में सबकुछ घालमेल किया जाने लगा, ‘चोरी का कुत्ता’ आजमाया जाने लगा. ऐसा होता देखने के बाद भी नीतियों से खेलने वालों का मन न भरा तो धीरे-धीरे ‘अबेकस’, ‘मानव सम्पदा पोर्टल’ नजर आने लगे. इनको कुछ-कुछ समझना शुरू किया ही था कि ‘समर्थ पोर्टल’ के अवतरण ने असमर्थ सा करना शुरू कर दिया. ‘नेकी कर दरिया में डाल’ की तर्ज़ पर ‘कुछ भी कर, समर्थ में भर’ के आदेश आने लगे. फ़ाइलों पर चल रही प्रोन्नति प्रक्रिया हो नहीं पा रही, अब ‘समर्थ’ को प्रमोशन करने की जिम्मेदारी दे दी. दो हाथों और एक दिमाग से काम करने वाले शिक्षक की समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने कागजों को सही करे या फिर पोर्टल पर बने पेज को?

 

इससे पहले कि पोर्टल में, आँकड़ों में फँसा उच्च शिक्षा संस्थान, प्राध्यापक अंतिम साँस ले पाता कि उसकी साँस अटकाने को ‘प्रमाण पोर्टल’ आ गया. पहले लगा कि ये हम सबको प्रणाम करने आया है पर नहीं, ये तो चालीस से अधिक बिन्दुओं पर प्रमाण माँगने लगा, वो भी प्रतिमाह. इससे भी मौलिकता का विकास होने के स्थान पर जोड़-तोड़ की विकास-दर बढ़ गई. फ़िलहाल तो साँस हलक में अटकी है, आँखें फिर गई हैं, धड़कन बेतरतीब है, बीपी का उच्चावचन समझ से परे है. ये सब इसलिए नहीं कि नदारद विद्यार्थियों के बीच, नकलची शोध-प्रक्रिया के साथ, एपीआई के खेल के लिए आँकड़ों को जबरन पैदा करना है या अपने मित्र के शब्दों में चुरकटपना फैलाना है वरन् इसलिए कि कल सुबह आँख खुलते किसी नए पोर्टल की आहट डरा न दे. समझ नहीं आ रहा कि शिक्षा क्षेत्र में कितना छीछालेदर रस पिलाया और फैलाया जाएगा? मौलिकता के बजाय कृत्रिमता के लिए कितना उकसाया जायेगा?


कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र

गुरुवार, 22 मई 2025

लालबुझक्कड़ की राजनैतिक हार

सुबह-सुबह अपने घर की बगिया में हरे-भरे पेड़ के नीचे पड़ी पत्थर की बेंच पर बैठे चाय की चुस्कियों का स्वाद लिया जा रहा था, उसी समय मोबाइल की घंटी ने ध्यान अपनी तरफ खींचा. कॉल रिसीव करते ही कॉलोनी के एक परिचित की हास्य भरा स्वर सुनाई दिया, “अरे भाईसाहब, जल्दी से सोशल मीडिया पर ऑनलाइन आइये. आपके लालबुझक्कड़ ने लाइव नाटक फैला रखा है.” इससे पहले कि हम कुछ पूछताछ कर पाते, सूचना देने वाले ने फोन काट दिया. चाय के प्याले में बचे शेष स्वाद को एक घूँट में गटकते हुए मोबाइल की स्क्रीन पर उँगलियों को दौड़ लगवाई. पता नहीं इस लालबुझक्कड़ ने क्या गुल खिला दिया? लालबुझक्कड़ और कोई नहीं बल्कि हमारी छोटी सी कॉलोनी के एक सदस्य हैं. न..न... ये इनका असली नाम नहीं, इनका असली नाम तो है लालता बाबू कक्कड़. दरअसल ये अपने आपको सर्वज्ञ समझते हैं, सोचते हैं कि प्रत्येक काम को पूरा करने में इनको महारथ हासिल है. खुद को ज्ञानी तो इस कदर समझते हैं कि कठिन से कठिन शब्दावली का प्रयोग करते हुए इधर-उधर दौड़ते रहते हैं. प्रत्येक समस्या का समाधान निकालने की कथित स्व-विशेषज्ञता रखने के कारण इनकी कार्य-प्रणाली और इनके नाम को लेकर हम कुछ मित्रों ने अपना ही कोड-वर्ड बना रखा है. ‘वेल ट्राई बट काम न आई की कार्य-प्रणाली कोडिंग के साथ ‘लालता बाबू कक्कड़’ को कर दिया ‘लालबुझक्कड़.’

 



“यह कतई स्वीकार नहीं है. कार्य-संस्कृति का, कार्यालयीन संस्कृति का तो ध्यान ही नहीं रखा जा रहा है. समिति अपना काम सही ढंग से नहीं कर रही है. यदि सबकुछ ऐसे ही चरमोत्कर्ष पर चलता रहा तो उच्चाधिकारियों को शिकायत प्रेषित कर दी जाएगी.” मोबाइल के उठते-गिरते नेटवर्क के द्वारा जब सोशल मीडिया के यथोचित प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचे तो देखा कि हमारे लालबुझक्कड़ इधर-उधर हाथ-पैर फेंकते-फटकारते हुए भाषण वाले अंदाज में बकबकाने में लगे हुए हैं. कॉलोनी के कई सदस्यों सहित वहाँ के गार्ड द्वारा हँसते-मुस्कुराते लालबुझक्कड़ की नौटंकी की रिकॉर्डिंग, लाइव प्रसारण किया जा रहा था. कुछ सदस्य रुक कर नजारा देखने में गए थे तो कुछ चलते-फिरते अनपेक्षित भाषण का आनंद उठाने में लगे थे. “आखिर जब कॉलोनी के पार्क को व्यवस्थित करने सम्बन्धी जानकारी दूसरी कॉलोनी के ठेकेदार को, उनकी समिति को क्यों दी गई? इसके लिए हमारी कॉलोनी की समिति आरोपी है, इसे जासूसी भरा कृत्य कहा जायेगा. यह अपराध है. इससे होने वाले नुकसान की भरपाई कौन करेगा? कौन बताएगा कि हमारे कितने पौधे चोरी हो गए? कितने पेड़ गिरा दिए गए?

 

लालबुझक्कड़ की स्क्रिप्ट अब पूरी तरह से समझ आ गई. देश की राजनीति में सक्रिय योगदान करने की लालबुझक्कड़ की आकांक्षा कभी पूरी नहीं हो पाई. बाद में उनके द्वारा अपनी इस इच्छा को कॉलोनी की राजनीति के द्वारा पूरा किया जाने लगा. समिति के खासमखास बनकर उनके द्वारा कुछ न कुछ जुगाड़ लगा ली जाती और उनके अपने आर्थिक हित सध जाते. कभी पार्क के सुन्दरीकरण के नाम पर, कभी घास को व्यवस्थित करने के नाम पर, कभी कॉलोनी की सुरक्षा के नाम पर सीसी कैमरों को लगवाने के नाम पर, कभी ड्रोन के द्वारा औचक निरीक्षण करवाने के नाम पर लालबुझक्कड़ अपना पेट भरते रहते. देश की राजनीति की तरह ही कॉलोनी की राजनीति ने करवट बदली और समिति की सत्ता लालबुझक्कड़ के विरोधी गुट के पास चली गई. इससे हताश-निराश लालबुझक्कड़ किसी न किसी बहाने समिति को आरोपित करते रहते हैं.

 

लालबुझक्कड़ की आवाज़ सभी सुरों पर गुजरती-ठहरती बार-बार पानी के घूँट के सहारे वापस लय पकड़ती. देश की राजनीति में और कॉलोनी की राजनीति में इतना साम्य एकदम से समझ आ गया. देश में भी आरोप लगाया जा रहा है, हिसाब-किताब माँगा जा रहा है, गिराए गए विमानों की संख्या पूछी जा रही है. कॉलोनी की राजनीति में भी आरोप लगाया जा रहा है, गिराए गए पेड़ों की संख्या पूछी जा रही है. लालबुझक्कड़ की उसी चिर-परिचित ऊबन भरी शैली को मोबाइल ऑफ करके अपने से दूर करके एक कप चाय के लिए आवाज़ लगाकर इस हंगामी लाइव प्रसारण के पीछे की वास्तविक स्थिति का देश की राजनीति से साम्य बिठाने लगे. लालबुझक्कड़ का असली मुद्दा समिति द्वारा पार्क की व्यवस्था अथवा अन्य कार्यों का हस्तांतरण किसी और को किया जाना नहीं है. असल मुद्दा तो ये है कि कॉलोनी के उच्चस्तरीय मामलों के क्रियान्वयन हेतु बने प्रतिनिधिमंडल में लालबुझक्कड़ द्वारा सुझाये गए लगुआ-भगुआ नहीं लिए गए. इसे लालबुझक्कड़ ने अपनी प्रतिभा की, अपने ज्ञान की, अपनी राजनीति की हार समझी. और सच भी है, आखिर ऐसा हो कैसे सकता है? जिस व्यक्ति ने राजनीति करने की आकांक्षा के साथ आँखें खोली हों, राजनीति के तमाम पड़ावों पर अस्वीकार किये जाने के बाद भी खुद को राजनीति से दूर नहीं रखा वो व्यक्ति एक झटके में कॉलोनी की राजनीति में कैसे हार मान ले?

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कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र

मंगलवार, 22 अप्रैल 2025

ओ मौत! तुझे बिन बुलाये आना न था

ओ मौत! तुझे बिन बुलाये  

आना न था,

गर आना था तो इतना शोर

मचाना न था.

 

माना कि गिर गया था सम्बल का

स्तम्भ एक,

आधार विश्वास का कुछ-कुछ

गया था दरक,

बिछाई थी बिसात क्रूर काल ने

अपने हाथों से,

कोशिश थी मात देने की उसकी

अपनी चालों से,

वक्त से बिना लड़े इस तरह हार

जाना न था,

ओ मौत! तुझे बिन बुलाये

आना न था.

 

क्षितिज पर छाई थी निस्तब्धता

और ख़ामोशी,

सिसकियाँ भयावह सन्नाटों में

धड़कनों-साँसों की,

जीवन-डोर का छूटना और

पकड़ना बार-बार,

अंधकार में डूबती आँखें खोजती

रौशनी का द्वार,

ज़िन्दगी को चमकने के पहले

बुझाना न था,

ओ मौत! तुझे बिन बुलाये

आना न था,


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कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र
22.04.2025

सोमवार, 22 जनवरी 2024

रामलला का करते वंदन

कौशल्या दशरथ के नंदन

आये अपने घर आँगन,

हर्षित है मन

पुलकित है तन

रामलला का करते वंदन.

 

सौगंध राम की खाई थी

उसको पूरा होना था,

बच्चा बच्चा था संकल्पित

मंदिर वहीं पर बनना था,

जन्मभूमि को देख प्रतिष्ठित

आनन्दित हो बैठे जन-जन.

हर्षित है मन

पुलकित है तन

रामलला का करते वंदन.

 

ध्वंस किया बर्बर शत्रु ने 

रामलला के मंदिर को,

धूमिल न कर पाया लेकिन

जन्मभूमि के वैभव को,

बरसों अपमानित रही अयोध्या

अब फिर से पाया अपनापन.

हर्षित है मन

पुलकित है तन

रामलला का करते वंदन.

 

राम अस्तित्व पर प्रश्न उठाया

बर्बर आक्रांता औलादों ने,

माँ सरयू भी सिसक उठी थी

भक्तों के बलिदानों से,

अर्पण, तर्पण, मोक्ष मिला जब

आचमन को पहुँचा जल पावन.

हर्षित है मन

पुलकित है तन

रामलला का करते वंदन.

 

प्राण-प्रतिष्ठा हुई राम संग

धर्म, आस्था, गौरव की,

है गर्व हमें हिन्दू होने पर

सकल विश्व ने ये बात कही,

हिन्दू तन है, हिन्दू मन है

अपना रग-रग हिन्दू जीवन.

हर्षित है मन

पुलकित है तन

रामलला का करते वंदन.

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कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र

22-01-2024


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22 जनवरी 2024 को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के पावन अवसर पर.


रविवार, 31 दिसंबर 2023

राम लौटे हैं फिर से वनवास से

आज चेहरे खिले हैं विश्वास से

राम लौटे हैं फिर से वनवास से.

 

आया कितना विषम ये वक़्त था,

दांव पर तो लगा अब अस्तित्व था.

 

थे मनुज रूप में अबकी रावण बहुत,

एक पल को लगा जीत मुश्किल बहुत.

 

सारी धरती थी जिसके अधिकार में,

निष्कासित सा रहा अपने संसार में.

 

जिस अयोध्या में जन्मे थे राम लला,

वहाँ सिर पर एक तिरपाल था तना.

 

जन्मभूमि की रक्षा में एक यज्ञ हुआ,

था प्राण पण की आहुतियों से सजा.

 

छँट गया कुहासा है अब सूर्य खिला,

सूर्यवंश को अपना अस्तित्व मिला.

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कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र

रविवार, 18 जून 2023

आसान नहीं होता पिता बनना

समन्दर सा खारापन ऊपर लिए
भीतर नदी सा मीठा बने रहना,

सूरज से गर्म तेवर लेकर भी
वटवृक्ष की शीतल छाँव बनना, 

ख्वाहिशों का आसमान छिपा
खुशियों की सौगात बिखेरना, 

दर्द अपने दिल से साझा कर
सबके साथ मुस्कुराते रहना, 

अनुशासन की लक्ष्मण रेखा में
जिम्मेवारी का संतुलन रखना, 

स्नेह-सूत्र में पिरो कर मोती
एक परिवार की माला बुनना, 

देखने में भले ही लगे सहज पर
आसान नहीं होता पिता बनना।
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कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र

गुरुवार, 10 नवंबर 2022

मँहगाई को भी पचा लेंगे

आजकल सुबह आँख खुलने से लेकर देर आँख बंद होने तक चारों तरफ हाय-हाय सुनाई देती है. आपको भी सुनाई देती होगी ये हाय-हाय? अब आपको लगेगा कि आखिर ये हाय-हाय है क्या, किसकी? ये जो है हाय! ये एक तरह की आह है, जो एकमात्र हमारी नहीं है बल्कि हर उस व्यक्ति की है जो बाजार के कुअवसरों से दो-चार हो रहा है. बाजार के कुअवसर ऐसे हैं कि न कहते बनता है और न ही सुनते. बताने का तो कोई अर्थ ही नहीं. इधर कोरोना के कारण ध्वस्त जैसी हो चुकी अर्थव्यवस्था का नाम ले-लेकर आये दिन बाजार का नजारा ही बदल दिया जाता है. आपको नहीं लगता कि बाजार का नजारा बदलता रहता है.

 

बाजार का नजारा अलग है और इस नजारे के बीच सामानों के दामों का आसमान पर चढ़े होना सबको दिखाई दे रहा है. सबको दिखाई देने वाला ये नजारा बस उनको नहीं दिखाई दे रहा, जिनको असल में दिखना चाहिए था. इधर सामानों के मूल्य दो-चार दिन ही स्थिर जैसे दिखाई देते हैं, वैसे ही कोई न कोई टैक्स उसके ऊपर लादकर उसके मूल्य में गति भर दी जाती है. यदि कोई टैक्स दिखाई नहीं पड़ता है तो जीएसटी है न. अब तो इसे एक-एक सामान पर छाँट-छाँट कर लगाया जा रहा है. ऐसा करने के पीछे मंशा मँहगाई लाना नहीं बल्कि वस्तुओं के मूल्यों को गति प्रदान करनी है. अरे! जब मूल्य में गति होगी तो अर्थव्यवस्था को स्वतः ही गति मिल सकेगी.

 



ऐसा नहीं है कि ऊपरी स्तर से मँहगाई कम करने के प्रयास नहीं किये गए. प्रयास किये गए मगर कहाँ और कैसे किये गए ये दिखाई नहीं दिए. आपने फिर वही बात कर दी. अरे आपको जीएसटी दिखती है, नहीं ना? बस ऐसे ही प्रयास हैं जो दिख नहीं रहे हैं. और हाँ, कोरोना के कारण देश भर में बाँटी जा रही रेवड़ियों की व्यवस्था भी उन्हीं के द्वारा की जानी है जो इन रेवड़ियों का स्वाद नहीं चख रहे हैं. अब तो आपको गर्व होना चाहिए मँहगे होते जा रहे सामानों को, वस्तुओं को खरीदने का. आखिर आप ही तो हैं जिन्होंने लॉकडाउन के बाद बहती धार से अर्थव्यवस्था को धार दी थी, अब आसमान की तरफ उड़ान भरती कीमतों के सहयोगी बनकर अर्थव्यवस्था को तो गति दे ही रहे हैं, रेवड़ियों को भी स्वाद-युक्त बना रहे हैं.

 

बढ़ते जा रहे दामों के कारण स्थिति ये बनी है कि बेचारे सामान दुकान में ग्राहकों के इंतजार में सजे-सजे सूख रहे हैं. वस्तुओं ने जीएसटी का आभूषण पहन कर खुद की कीमत बढ़ा ली है, अब वे अपनी बढ़ी कीमत से कोई समझौता करने को तैयार नहीं. इस मंहगाई के दौर में सामानों से पटे बाजार और दामों के ऊपर आसमान में जा बसने पर ऐसा लग रहा है जैसे किसी गठबन्धन सरकार के घटक तत्वों में कहा-सुनी हो गई हो. सामान बेचारे अपने आपको बिकवाना चाहते हैं पर कीमत है कि उनका साथ न देकर उन्हें अनबिका कर दे रही है. उस पर भी उन कीमतों ने विपक्षी जीएसटी से हाथ मिला लिया है. अब ऐसी हालत में सबसे ज्यादा मुश्किल में बेचारा उपभोक्ता है, ग्राहक है. इसमें भी वो ग्राहक ज्यादा कष्ट का अनुभव कर रहा है जो मँहगी, लक्जरी ज़िन्दगी को बस फिल्मों में देखता आया है.

 

ऐसे ही लक्जरी उपभोक्ताओं की तरह के हमारे सरकारी महानुभाव हैं. अब वे बाजार तो घूमते नहीं हैं कि उनको कीमतों का अंदाजा हो. अब चूँकि वे बाजार घूमने-टहलने से रूबरू तो होते नहीं हैं, इस कारण उनके पास किसी तरह की तथ्यात्मक जानकारी तो होती नहीं है. अब बताइये आप, जब जानकारी नहीं तो बेचारे कीमतों को कम करने का कैसे सोच पाते? इस महानुभावों का तो हाल ये है कि एक आदेश दिया तो इनको भोजन उपलब्ध. गाड़ी में तेल डलवाने का पैसा तो देना नहीं है, रसोई के लिए गैस का इंतजाम भी नहीं करना है और न ही लाइन में खड़े होकर किसी वस्तु के लिए मारा-मारी करनी है. अब इतने कुअवसर खोने के बाद वे बेचारे कैसे जान सकते हैं कि कीमतों में वृद्धि हो रही है.


ये दोष तो उस बेचारे आम आदमी का है जो दिन-रात खटते हुए बाजार को निहारा करता है. वही बाजार के कुअवसरों से दो-चार होता है. वही लगातार मँहगाई की मार खा-खाकर पिलपिला हो जाता है. इस पिलपिलेपन का कोई इलाज भी नहीं है. यह किसी जमाने में चुटकुले की तरह प्रयोग होता था किन्तु आज सत्य है कि अब आदमी झोले में रुपये लेकर जाता है और जेब में सामान लेकर लौटता है.


ऊपर बैठे महानुभाव भी भली-भांति समझते हैं कि आम आदमी की ऐसी ग्राह्य क्षमता है कि वह मँहगाई को भी आसानी से ग्राह्य कर जायेगा. ऐसे में परेशानी कैसी? देश की जनता तो पिसती ही रही है, चाहे वह नेताओं के आपसी गठबन्धन को लेकर पिसे अथवा सामानों और दामों के आपसी समन्वय को लेकर. सत्ता के लिए किसी का किसी से भी गठबन्धन हो सकता है, टूट सकता है ठीक उसी तरह मंहगाई का किसी से भी गठबन्धन हो सकता है, दामों और सामानों का गठबन्धन टूट भी सकता है. इस छोटी सी और भारतीय राजनीति की सार्वभौम सत्यता को ध्यान में रखते हुए सरकार की नादान कोशिशों को क्षमा किया जा सकता है. 



कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र