गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

पहचान के साथ ही... [कविता--कुमारेन्द्र]

कविता --- पहचान के साथ ही...


अपराध करने के बाद भी
अपराध-बोध का
तनिक भी भान नहीं,
नहीं एहसास कि
वह अपने हाथों से
मिटा चुका है एक सृष्टि को,
वो हाथ जो
झुला सकते थे झूला,
दे सकते थे थपकी,
सिखा सकते थे चलना,
जमाने के साथ बढ़ना,
उन्हीं हाथों ने
सुला दिया मौत की नींद,
मिटा दिये सपने,
अवरुद्ध कर दिया विकास,
बिना उसकी आंखें खुले,
बिना उसके संसार देखे,
बिना अपना परिवार जाने,
समाप्त हो गया उसका अस्तित्व,
समाप्त हो गया एक जीवन,
मिट गई एक मुस्कान
क्योंकि
समाज में आने के पूर्व ही
समाज के कथित ठेकेदार
कर चुके थे उसकी पहचान।

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चित्र गूगल छवियों से साभार

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

कहाँ से चले थे, कहाँ आ गए हैं --- [कविता -- कुमारेन्द्र]

पड़े थे खण्डहर में
पत्थर की मानिन्द
उठाकर हमने सजाया है,
हाथ छलनी किये अपने मगर
देवता उनको बनाया है।
पत्थर के ये तराशे बुत
हम को ही आँखें दिखा रहे हैं,
कहाँ से चले थे कहाँ आ गये हैं।

बदन पर लिपटी है कालिख
सफेदी तो बस दिखावा है,
भूखे को रोटी,
हर हाथ को काम
इनका ये प्रिय नारा है।
भरने को पेट अपना ये
मुँह से रोटी छिना रहे हैं,
कहाँ से चले थे कहाँ आ गये हैं।

सियासत का बाजार
रहे गर्म
कोशिश में लगे रहते हैं,
राम-रहीम के नाम पर
उजाड़े हैं जो
उन घरों को गिनते रहते हैं।
नौनिहालों की लाशों पर गुजर कर
ये अपनी कुर्सी बचा रहे हैं,
कहाँ से चले थे कहाँ आ गये हैं।




चित्र गूगल छवियों से साभार

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

जीत के रहेंगे -- कविता -- कुमारेन्द्र


इन आंखों ने सीखा है सपने सजाना,
सपने हकीकत में बदल कर रहेंगे।
हो दूर कितना भी आसमान हमसे,
सितारों को जमीं पर सजाकर रहेंगे।

राही सफर में तो मिलते बहुत हैं,
कोई साथ देगा कब तक हमारा।
अलग अपनी मंजिल जुदा अपनी राहें,
हमें खुद बनना है अपना सहारा।
हमीं से है रोशन ये गुलशन सारा,
नहीं खुद को तन्हा हम समझा करेंगे।

नहीं हैं बुजदिल कि डर करके बैठें,
तूफान से लड़ने की ठान के निकले।
लेकर उमंग और चाहत इस दिल में,
झुकाने हम सिर पर्वत का निकले।
कितना भी हो जाये वक्त दुश्मन हमारा,
नहीं हम हालात से डर कर रहेंगे।

नहीं तुम हमारे कदमों को रोको,
अभी हमको है बहुत दूर जाना।
कदम डगमगाये तो होगी मुश्किल,
अभी है बहुत दूर हमसे ठिकाना।
बदल जाये मौसम बदल जायें राहें,
ये कदम फिर भी मंजिल को छूकर रहेंगे।


चित्र गूगल छवियों से साभार



सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

सन्देश का प्रभाव -- व्यंग्य कविता -- कुमारेन्द्र

व्यंग्य कविता --- सन्देश का प्रभाव
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सड़क पर पड़े

घायल को देख कर
कतरा कर, आँखें बचाकर
निकलते लोग।
याद आता है
मानवता का संदेश
पर....
सहायता के लिए
बढ़े कदमों को,
विचारों को
रोक देते हैं
नगर के किसी
‘विशेष इमारत’ के सामने लगे
‘बोर्ड़ों’ के ‘संदेश’
‘पुलिस आपकी मित्र है’
सदैव
‘आपकी सेवा’
को तत्पर।

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

जमाने का चलन -- ग़ज़ल -- कुमारेन्द्र

जमाने का चलन -- ग़ज़ल



अपने दर्द को हँस कर छिपा रहे हैं।

आँखों से फिर भी आँसू आ रहे हैं।।

जिनसे निभाया न गया दोस्ती को।
वही अब हमसे दुश्मनी निभा रहे हैं।।

हाथ छलनी किये तराशने में जिन्हें।
वो पत्थर के खुदा आँखें दिखा रहे हैं।।

जोश दिल में है जमाना बदलने का।
तभी आँधियों में चिराग जला रहे हैं।।

मिला नहीं सकते जो नजरें हकीकत में।
अपने ख्वाबों में वो हमें मिटा रहे हैं।।

नहीं सुकून उन्हें हमारी खुशियों से।
प्यार के नाम पर जहर पिला रहे हैं।।

आए जो भी दिल के करीब हमारे।
जख्म पर जख्म ही दिये जा रहे हैं।।

छोड़ कर मुश्किलों में चले गये मगर।
अपने को हमारा हमसफर बता रहे हैं।।

क्या कहें जमाने के इस चलन को।
मौत से डरने वाले जीना सिखा रहे हैं।।


चित्र गूगल छवियों से साभार

ग़ज़ल -- दुनिया तो सजाओ यारो -- कुमारेन्द्र

ग़ज़ल -- दुनिया तो सजाओ यारो




ऊपर वाले की दुनिया को यूं न मिटाओ यारो।
रिश्ता इससे है कुछ तुम्हारा भी वो निभाओ यारो।।

हम न होंगे कल को मगर ये दुनिया तो होगी।
आने वालों के लिए ही ये दुनिया तो सजाओ यारो।।

कोई मन्दिर है बनाता, मस्जिद बना रहा है कोई।
पर दिलों के बीच तुम दीवार तो न बनाओ यारो।।

नफरत बढ़ा रहे हैं सभी स्वार्थ में अंधे होकर।
तुम तो इस धरती से मुहब्बत न मिटाओ यारो।।

अपने लिए तो इस जहां में सभी जी लेते हैं।
कभी औरों के लिए भी मर के दिखाओ यारो।।

दोस्ती करना आसान है पर है निभाना मुश्किल।
छोड़ कर यार को मझधार में तो न जाओ यारो।।

जिन्दगी का साथ सदा के लिए मुमकिन ही नहीं।
काम कुछ ऐसे करो कि कल को याद तो आओ यारो।।

क्या पता एक तुम ही जमाने को बदल डालो।
अपने को भलाई की राह में आगे तो लाओ यारो।।

करने को रोशन ये जहां एक चिराग ही काफी है।
उसी की खातिर तुम तूफान से तो टकराओ यारो।।

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चित्र गूगल छवियों से साभार

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

खुशियों का इंतज़ार -- (कविता) -- कुमारेन्द्र

खुशियों का इंतज़ार -- कविता




सुबह-सुबह चिड़िया ने
चहक कर उठाया हमें,
रोज की तरह
आकर खिड़की पर
मधुर गीत सुनाया हमें।
सूरज में भी कुछ
नई सी रोशनी दिखी,
हवाओं में भी
एक अजब सी
सोंधी खुशबू मिली।
फूलों ने झूम-झूम कर
एकदूजे को गले लगाया,
गुनगुनाते हुए
पंक्षियों ने नया राग सुनाया।
हर कोना लगा
नया-नया सा,
हर मंजर दिखा
कुछ सजा-सजा सा।
इसके बाद भी
एक वीरानी सी दिखी,
अपने आपमें कुछ
तन्हाई सी लगी।
अचानक
चौंक कर उठा तो
सपने में
खुद को खड़ा पाया,
खुशनुमा हर मंजर को
अपने से जुदा पाया।
आंख मल कर
दोबारा कोशिश
उसी मंजर को पाने की,
ख्वाब में ही सही
फिर वही खुशियां
देख पाने की।


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चित्र गूगल छवियों से साभार