प्रसिद्धि से फिर रहे वंचित
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पिछले कुछ दिनों से
कोई काम पूरी तन्मयता से करो फिर भी कोई चर्चा नहीं. इधर दूसरों को देख रहे हैं कि
कुछ न भी करें तो भी प्रसिद्धि पाए जा रहे हैं. ऐसा लगता है जैसे प्रसिद्धि इन
अकेले के लिए ही फुर्सत में बैठी रहती है. वे नहीं बोलते थे तो भी चर्चा में, ये
बोले ही जा रहे हैं तो भी चर्चा में हैं. कभी उनकी पगड़ी चर्चा का केंद्र बनती है
तो कभी इनकी टोपी के चर्चे उछल पड़ते हैं. यहाँ जिंदगी निकल गई उपहार लेते-देते मगर
किसी ने एक बार मोहल्ले स्तर पर भी बहस कराने-करने की नहीं सोची और एक ये हैं एक
नामधारी वस्त्र क्या धारण किया, समझ में ही नहीं आ रहा कि ये उपहार था या खरीदा
हुआ था? अभी इससे निपट नहीं पाए थे इनकी नीलामी ने बमचक काट दी. हजारों से लाखों
बना और अब लाखों से करोड़ों की दिशा में कूच करने लगा.
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बहरहाल, हमारी
परेशानी न तो नामधारी वस्त्र का खरीदा जाना है, न उसका उपहार में दिया जाना है, न
उसकी कीमत है, न उसकी नीलामी है, हमारी सबसे विकराल समस्या ये है कि आखिर हमारे
किसी कदम की कोई चर्चा क्यों नहीं होती? आखिर हमारे पास भी बेहतरीन वस्त्र रहे
हैं, आखिर हमारे पास भी बेहतरीन उपहार रहे हैं पर सब बेकार ही साबित हुए. इस हताश
करने वाली बेकारी के मध्य एकाएक हमारे दिमाग ने घंटी बजाई कि नीलामी के द्वारा हम
भी थोड़ी-बहुत प्रसिद्धि पा ही सकते हैं. अपने देश का तो फिर भी कुछ सही राग है कि
यहाँ किसी के बल्ले नीलाम होते हैं, किसी के हस्ताक्षर वाले सामान नीलाम होते हैं,
कोई अपने गीतों की नीलामी करवाता है, कोई अपने संग्रहों की नीलामी में जुट जाता
है, कोई पुस्तकों की नीलामी करके प्रसिद्धि पाने की जुगाड़ करता है तो कोई अपनी
कलाकृतियाँ नीलाम करता दिखता है. वैसे नीलामी का अपना ही भारतीय इतिहास रहा है.
बहुतों की तो जमीन-जायदाद तक नीलाम हो गए, उनके कुछ राजशाही शौक में. नीलामी का
चलन देश में इतना है कि यहाँ लोग खरीदे हुए समान के साथ-साथ उपहार में, सम्मान में
मिली हुईं वस्तुएं भी नीलाम करने में लग जाते हैं. इसके बाद भी यहाँ सभ्य, शिष्ट,
संस्कारित रूप में वस्तुओं की नीलामी होती है जबकि विदेशों में आप नजर डालो तो पता
चले कि वहाँ सामानों के साथ-साथ नामचीनों के बाल, शेव किये ब्लेड, अन्तःवस्त्र,
भोजन किये गए सामान आदि तक ख़ुशी-ख़ुशी नीलामी में हाथों-हाथ लिए जाते हैं. और तो और
वहाँ लोग अपना कौमार्य, अपनी देह तक नीलाम करने निकल पड़ते हैं.
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अपने देश की सभ्यता
और विदेशों की स्वतंत्रता का फ्यूजन तैयार करते हुए हमने भी अपनी प्रसिद्धि के लिए
नीलामी का रास्ता चुना पर समझ नहीं आया कि क्या नीलाम किया जाए? घर अपना है नहीं,
जमीन-जायदाद बना नहीं पाए, देह में झुर्रियाँ इतनी हैं कि वो फ्री में कोई न ले,
पढ़ने-लिखने वाले इतने विशाल ह्रदय नहीं कि हम अपनी पांडुलिपियाँ नीलाम कर सकें,
बर्तन-भांड़े भी इस रूप-रंग के हैं कि उनको कोई कबाड़ी भी न ले फिर, फिर क्या नीलाम
किया जाए? पूरा घर छान मारा, सब रिश्तेदारों से, दोस्तों से पूछ मारा, नेट पर
खंगाल मारा पर एक भी ऐसा सामान समझ नहीं आया जिसे नीलाम करके हम पैसा न सही, अपनी
प्रसिद्धि पा लेते. थकहार कर टूटी कुर्सी पर निढाल लुड़क पुनः हताश बेकारी के आगोश
में चले गए. हाय रे! हम इस बार भी नीलामी लायक कुछ न जुटा पाने के कारण फिर
प्रसिद्धि पाने से वंचित रह गए.
. ये व्यंग्य दैनिक जनसंदेश टाइम्स के २१ फरवरी २०१५ के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ.
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