शुक्रवार, 1 मार्च 2013
वो समझते हैं इतराना उन्हें ही आता है - ग़ज़ल
गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013
सागर जैसा दिल, आसमां सा मन है मेरा - कविता
सोमवार, 14 जनवरी 2013
बार-बार बहाए जाने के बीच - (लघुकथा)
गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012
मानसिकता >> लघुकथा
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एक व्यक्ति था, जो रामनवमी के दिन पैदा हुआ था. उसके जन्म पर सभी ने उसके माता-पिता को बधाई देते हुए कहा था कि राम आया है...शुभ-शुभ ही होगा....
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बुधवार, 15 अगस्त 2012
हमारे साये ही अब हमारे साथ नहीं चलते
अपनों के बीच हो गये हैं कुछ यूं बेगाने से,
हमारे साये ही अब हमारे साथ नहीं चलते।
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हमें रुला सकें नहीं थी ताकत इतनी गमों में,
वो खुशी ही इतनी मिली कि आंसू छलक उठे।
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था पता होगा बहुत ही मुश्किल जिसको पाना,
दिल के अरमान उसी की खातिर मचल गये।
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खो गया अपना वजूद ही अपने लोगों के बीच,
ढूंड़ने अपने आपको गैरों के बीच चल पड़े।
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बिना हमें देखे जो बेचैन हुआ करते थे कभी,
वो ही आज सामने से मुंह फेर कर निकले।
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कल तक बहार थी जिनसे महफिलों की,
देखकर उनको अब सन्नाटे से छाने लगे।
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फकत कांच का टुकड़ा थे हम किसी के लिए,
खुद को उनके दिल का नगीना समझते रहे।
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जिन हाथों ने खुदा बनाया पत्थर तराश कर,
वही हाथ आज पूजा के लायक नहीं रहे।
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रविवार, 12 अगस्त 2012
चाह है जिये जाने की पर मौत का बसेरा है -- ग़ज़ल
चारों ओर इंसान के ज़िन्दगी का अजब घेरा है,
चाह है जिये जाने की पर मौत का बसेरा है।
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लगा था जो ज़िन्दगी आसान बनाने में,
अब उसी को पल-पल मौत मांगते देखा है।
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ज़िन्दगी उसको आज करीब से छूकर निकली,
मौत के साथ खेलना तो उसका पेशा है।
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क्या पता था राह मंजिल की इतनी कठिन होगी,
है घना अंधियारा और दूर बहुत सबेरा है।
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किसी आवाज या दस्तक पर नहीं कोई भी हलचल,
लगता है जैसे सभी को अनहोनी का अंदेशा है।
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मुस्कुराहट के पीछे का दर्द बयां कर रही थी आंखें,
सूनी सी आंखों में दर्द का इक दरिया छिपा है।
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नदारद रात की चांदनी, सुबह की रोशनी है,
ज़र्रे-ज़र्रे पर एक खौफनाक मुलम्मा चढ़ा है।
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अमन-चैन, प्रेम-स्नेह अब बातें हैं कल की,
सारा माहौल ही इस माहौल से दहशतज़दा है।
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रिसते ज़ख्म और सिसकते अश्क बनेंगे शोले एक दिन,
हर एक घूंट के साथ लोगों ने कोई अंगारा पिया है।
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