शुक्रवार, 1 मार्च 2013

वो समझते हैं इतराना उन्हें ही आता है - ग़ज़ल



है उन्हें प्यार मगर जताना नहीं आता है,
दिल के ज़ज्बात को छिपाना नहीं आता है.

वो क़त्ल करते हैं आँखों-आँखों में मगर,
कातिल कहा जाए उन्हें नहीं सुहाता है.

जिस हुस्न के गुरूर में मगरूर हैं वो,
दो-चार दिन में वो भी ढल जाता है.

बिन परवाने के शमा की अहमियत क्या,
इश्क भी उसके दिवाने से निखार पाता है.

वादा आने का झूठा हर बार की तरह,
फिर भी राह उनकी फूलों से सजाता है.

उनको हमारी सनक का अंदाज़ा नहीं,
वो समझते हैं इतराना उन्हें ही आता है.

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

सागर जैसा दिल, आसमां सा मन है मेरा - कविता



सागर जैसा दिल, आसमां सा मन है मेरा,
प्यार की रुनझुन से सजा, जीवन है मेरा.

कौन कहता है क्या, नहीं कोई इसकी फिकर,
करता हूँ वही जो कह देता, मन है मेरा.

दो कदम चल कर, तुम आओ तो सही,
दोस्तों के लिए ही सजा, गुलशन है मेरा.

माँगा जिसने जो भी, उसे हँस के दिया,
कोई रुसबा न हो इतना, जतन है मेरा.

चाहे कांटे मिलें, पर फूल बन जाते हैं,
न मानो मगर ऐसा, अपनापन है मेरा.

रूठा कल से नहीं, चिंता कल की नहीं,
आज को आज में जीना, दर्शन है मेरा.

सोमवार, 14 जनवरी 2013

बार-बार बहाए जाने के बीच - (लघुकथा)


  मात्र दस वर्ष की उम्र में मछली की तरह तैरते हुए उसने जैसे ही अंतिम बिन्दु को छुआ वैसे ही वह तैराकी का रिकॉर्ड बना चुकी थी। स्वीमिंग पूल से बाहर आते ही उसको साथियों ने, परिचितों ने, मीडियाकर्मियों ने घेर लिया। सभी उसे बधाई देने में लगे थे। उसके चेहरे पर अपार प्रसन्नता दिख रही थी। इस भीड़भाड़, गहमागहमी के बीच पत्रकारों ने तैराकी, प्रशिक्षक, सफलता का श्रेय किसे जैसे सवालों को दागना शुरू कर दिया। 
 
  कैमरों के चमकते फ्लैश के बीच दमकते चेहरे के साथ पूरे आत्मविश्वास से उसने कहा-‘‘पिछले कई दशकों से पैदा होते ही कभी नदी, कभी नाले, कभी तालाब, कभी फ्लश में बहाये जाने ने तैरना बखूबी सिखाया है। उनके बार-बार बहाये जाने के अहंकार और मेरे बार-बार पैदा होने की जिद ने इसे दृढ़ता प्रदान की है।’’

  उसका जवाब सुनकर भीड़ खामोश थी, गहमागहमी थम गई थी, कैमरे के फ्लैश चमकना भूल गये थे। लोगों को पानी से भीगे उसके चेहरे पर आंसुओं की धार अब स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी।

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

मानसिकता >> लघुकथा

लघुकथा >>> मानसिकता
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एक व्यक्ति था, जो रामनवमी के दिन पैदा हुआ था. उसके जन्म पर सभी ने उसके माता-पिता को बधाई देते हुए कहा था कि राम आया है...शुभ-शुभ ही होगा....
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उसके बाद समाज की भीड़ में वो बालक खो गया...गुमनाम जिंदगी व्यतीत करता रहा..किसी को पता नहीं चला कि वो बालक बड़ा होकर क्या बना? क्या-क्या शुभ-अशुभ काम उसने किये....
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फिर एक दिन वही बालक अपनी जिंदगी जीकर चल बसा....अबकी दिन था विजयादशमी का...अबकी समाज के शुभचिंतक आपस में बतिया रहे थे...भला हो गया देश का, रावण मर गया.

बुधवार, 15 अगस्त 2012

हमारे साये ही अब हमारे साथ नहीं चलते

अपनों के बीच हो गये हैं कुछ यूं बेगाने से,

हमारे साये ही अब हमारे साथ नहीं चलते।

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हमें रुला सकें नहीं थी ताकत इतनी गमों में,

वो खुशी ही इतनी मिली कि आंसू छलक उठे।

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था पता होगा बहुत ही मुश्किल जिसको पाना,

दिल के अरमान उसी की खातिर मचल गये।

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खो गया अपना वजूद ही अपने लोगों के बीच,

ढूंड़ने अपने आपको गैरों के बीच चल पड़े।

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बिना हमें देखे जो बेचैन हुआ करते थे कभी,

वो ही आज सामने से मुंह फेर कर निकले।

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कल तक बहार थी जिनसे महफिलों की,

देखकर उनको अब सन्नाटे से छाने लगे।

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फकत कांच का टुकड़ा थे हम किसी के लिए,

खुद को उनके दिल का नगीना समझते रहे।

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जिन हाथों ने खुदा बनाया पत्थर तराश कर,

वही हाथ आज पूजा के लायक नहीं रहे।

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रविवार, 12 अगस्त 2012

चाह है जिये जाने की पर मौत का बसेरा है -- ग़ज़ल

चारों ओर इंसान के ज़िन्दगी का अजब घेरा है,

चाह है जिये जाने की पर मौत का बसेरा है।

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लगा था जो ज़िन्दगी आसान बनाने में,

अब उसी को पल-पल मौत मांगते देखा है।

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ज़िन्दगी उसको आज करीब से छूकर निकली,

मौत के साथ खेलना तो उसका पेशा है।

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क्या पता था राह मंजिल की इतनी कठिन होगी,

है घना अंधियारा और दूर बहुत सबेरा है।

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किसी आवाज या दस्तक पर नहीं कोई भी हलचल,

लगता है जैसे सभी को अनहोनी का अंदेशा है।

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मुस्कुराहट के पीछे का दर्द बयां कर रही थी आंखें,

सूनी सी आंखों में दर्द का इक दरिया छिपा है।

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नदारद रात की चांदनी, सुबह की रोशनी है,

ज़र्रे-ज़र्रे पर एक खौफनाक मुलम्मा चढ़ा है।

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अमन-चैन, प्रेम-स्नेह अब बातें हैं कल की,

सारा माहौल ही इस माहौल से दहशतज़दा है।

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रिसते ज़ख्म और सिसकते अश्क बनेंगे शोले एक दिन,

हर एक घूंट के साथ लोगों ने कोई अंगारा पिया है।

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