बुधवार, 20 मई 2020

छीछालेदर रस से सराबोर सम्मान और उपाधि ले लो रे

चीनी उत्पादों के जैसे इसकी तासीर न निकली. जैसे सारे चीनी उत्पाद सुबह से लेकर शाम तक वाली स्थिति में रहते हैं ठीक उसी तरह से इस कोरोना वायरस को समझा गया था. हर बार की तरह इस बार भी चीन को समझने में ग़लती हुई और कोरोना हम सबके गले पड़ गया. कोरोना का इधर गले पड़ना हुआ उधर सरकार ने लॉकडाउन लगा दिया. कहा जा रहा था कि इस आपदा में भी अवसर तलाशने चाहिए. आपदा को अवसर में बदलने की कोशिश करनी चाहिए. बस, इसे गाँठ बांधते हुए बहुत से अति-उत्साही अवसर बनाने निकल आये. कुछ खाना बनाने में जुट गए तो कुछ ने जलेबी बनाने में विशेषज्ञता हासिल कर ली.


इसके साथ ही बहुतेरे लोग ऐसे थे जो स्वयंभू रूप में कोरोना योद्धा बने युद्ध करने में लगे थे. इनका युद्ध किसी को नहीं दिख रहा था. जैसे युद्धनीति में एक कौशल छद्म युद्ध की मानी जाती है, गुरिल्ला युद्ध तकनीक मानी जाती है, कुछ ऐसा ही ये योद्धा कर रहे थे. बिना किसी की नजर में आये, बिना किसी को हवा लगने के ये युद्ध किये जा रहे थे. अब चाहे जितना छद्म युद्ध लड़ लो, चाहे जितना गुरिल्ला युद्ध लड़ लो, चाहे जितना छिपकर काम करो मगर तकनीक के आगे किसी की नहीं चलती. तकनीक से सारी गोपनीयता उजागर हो जाती है. तो इसी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए बहुत से तकनीकबाजों ने पता लगा ही लिया कि कौन-कौन कथित योद्धा है. बस, इस खोज को उनके द्वारा उजागर भी कर दिया गया. 

इन तकनीकबाजों ने सभी को अपने-अपने स्तर से सम्मानित करना शुरू कर दिया. सम्मान भी वैसा जैसे कि योद्धा थे. न योद्धा दिखाई दिए, न सम्मान करने वाले. लॉकडाउन में योद्धा अपना काम करते रहे, सम्मान देने वाले अपना काम करते रहे. उन्होंने हवा में कलाबाजियाँ दिखाईं तो इन्होंने भी कलाकारी दिखाई. इसी कलाकारी में कई कलाकार रह गए. अब जो रह गए उनके प्रति भी समाज का कुछ कर्तव्य बनता है. उनके लिए भी कुछ कलाकारी दिखाने की आवश्यकता तो है ही. यही विचार जैसे आया तो लगा कि ऐसे लोगों के हौसले को टूटने नहीं देना है. आखिर बिना किसी को भनक लगे, बिना किसी काम के योद्धा बन जाना सहज नहीं होता. तो ऐसी सहजता वालों को भी सामने लाने का दायित्व समाज का है.  


इस तरह की बात मन में आई और एक योजना बना दी गई. रह गए अदृश्य योद्धाओं को सम्मानित करने की पुनीत योजना का शुभारम्भ जल्द ही किया जाना है. इसमें योद्धाओं जैसे लोगों को प्रमाण-पत्रसम्मान-पत्रसम्मानोपधियाँ देने का अति-पुनीत कार्य किया जायेगा. अब समस्या यही कि ऐसे छिपे लोगों को खोजा कैसे जाए क्योंकि तकनीकबाजों जैसी तकनीक यहाँ उपलब्ध नहीं. इसके लिए एक उपाय खोजा गया. इस योजना को सोशल मीडिया पर डाला गया. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि सभी तरह के योद्धा सोशल मीडिया पर उपस्थित हैं. सुस्त रूप में भी, सक्रिय रूप में भी. ऐसे में जो स्वयंभू योद्धा किसी अन्य तकनीकबाज से सम्मानित न हो सके हैं, और यदि वे सम्मानित होने के इच्छुक हैं तो ऐसे सुसुप्त जागरूक लोग अपना नाममाता-पिता का नामजन्मतिथि (इसे वैकल्पिक व्यवस्था में रखा गया है)पता हमें भेजें. 

यहाँ विवरण भेजते समय विशेष रूप से ध्यान रखें कि अपनी कार्य सम्बन्धी जानकारी का कोई विवरण नहीं भेजना है. ऐसा करने पर आवेदन निरस्त माना जायेगा. कार्य विवरण की अपेक्षा इसलिए नहीं क्योंकि इसे किसी गुप्त तकनीक की सहायता से खोद कर निकाल कर सामने लाया जायेगा. अभी इच्छुक बस अपना सम्मान, प्रमाण, उपाधि प्राप्त करें. हाँकिसी को यदि कोई विशेष उपाधिसम्मान की मनोकामना है तो उसे अवश्य बताएँ.  सभी की मनोकामना पूर्ण की जाएगी. ऐसा किये जाने के पूर्व छीछालेदर रस में सराबोर सम्मान आपको ससम्मान प्रदान करने की शपथ ली जाती है. जिनको सम्मान, उपाधि प्रदान की जाएगी, उनसे भी अपेक्षा रहेगी कि वे इस कोरोना काल में लॉकडाउन समय जैसा छीछालेदर रस सदैव बहते रहेंगे.


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मंगलवार, 19 मई 2020

घूँट-घूँट ज़िन्दगी


खाना खाने के बाद वे दोनों टैरेस पर आकर खड़े हो गए. अपने-अपने एहसासों को अपने अन्दर महसूस करते हुए दोनों ही ख़ामोशी से बाहर चमकती लाइट्स को, काले आसमान को, उनमें टिमटिमाते तारों को देखे जा रहे थे. उनकी ख़ामोशी के साथ चलती प्यार भरी लहर में घड़ी ने अवरोध पैदा किया. उसने ग्यारह बजने का संकेत किया. घड़ी की पर्याप्त ध्वनि के बाद भी उसने अपनी घड़ी पर निगाह डालकर चलने की मंशा जताई.

रुक नहीं सकती? उसकी आवाज़ इन तीन शब्दों के साथ जैसे जम गई हो.

उसने कुछ कहा नहीं. आगे बढ़कर उसकी दोनों हथेलियों को अपनी हथेलियों में थामकर एक सवाल उसकी आँखों के रास्ते दिल की गहराइयों में उतार दिया, जब रोकना था तब तो रोका नहीं.

एक पल को आँखों में आँखें डालकर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे उसके पास कुछ भी कहने को नहीं. जैसे उसे किसी अपराध-बोध ने जकड़ लिया हो.

उस समय की याद न दिलाओ. मैं आज तक तुम्हारा दोषी हूँ. इसके बाद भी कहता हूँ, आज रुक जाओ, आगे तुम्हारी मर्जी. उसने जैसे खुद को किसी गहरे अंधकार में पाया. पिछले कुछ घंटों की चमक उसके चेहरे से एकदम गायब सी समझ आई.

एएएए.... इसलिए नहीं कहा था कि तुम एकदम से सेंटिया जाओ. सॉरी, तुमको परेशान करने की मंशा नहीं थी. कैसे निकल गई वो बात, पता नहीं. कहते हुए उसने अपनी चिर-परिचित हँसी से पूरे टैरेस को चहका दिया.
रुकने का सोच के नहीं आई थी. कपडे भी नहीं लाई चेंज करने के हिसाब से. कह कर वह वहीं पड़ी एक कुर्सी पर बैठ गई.

अरे, तो रात में रुकने के लिए कपड़ों की क्या जरूरत. उसने ठहाका लगाते हुए एक आँख झपका दी.

रुको, अभी बताती हूँ तुमको. फिर दोनों सबकुछ भूल कर पुराने दिनों की तरह एक-दूसरे से उलझ गए.

मन उसका भी रुकने का था. खूब सारी बातें करने का था बस वह जैसे उसे परेशान करने के लिए ये सब कर रही थी. कुछ देर बाद वह उसके कुरते और लुंगी को पहन कर टैरेस में आकर बैठ गई. यह उसकी उन दिनों भी आदत में शामिल था. कभी-कभी उसके कमरे में रात को रुकने पर उसी का कुरता और लुंगी पहनना पसंद करती थी. आज वह फिर उसी ड्रेस में खुद को उन्हीं पुराने दिनों में खोया-खोया सा महसूस कर रही थी.


इतनी देर में वह कॉफ़ी बना लाया. उसे अपने कुरते-लुंगी में देखकर चेहरे पर एक मुस्कान लाकर कॉफ़ी का मग उसकी तरफ बढ़ा दिया. कॉफ़ी पीते-पीते दोनों पुराने दिनों में खो गए. बातों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा था. रात भी जैसे उनकी कहानियाँ सुनने के लिए बैठी थी. समय गुजरता जा रहा था मगर रात गुजरती महसूस नहीं हो रही थी. एहसासों की कश्ती में बैठकर दोनों बहुत दूर निकल चुके थे. अब उनके सामने जगमगाता आसमान था, हिलोरें मारता सागर था और टिमटिमाते सितारों की रौशनी.

उनकी यादों के साए कभी उनको हँसाते, कभी भावनाओं का ज्वर उमड़ता तो आँखों को नम कर जाता. बात करते-करते वह उठी और दीवान पर आकर उसके बगल में बैठ गई. एक पल को ऐसा लगा जैसे शब्दों की ध्वनि के बीच कितनी गहरी ख़ामोशी लिए वह बैठी है. हँसती-बोलती आँखें जैसे एकदम से सुनसान हो गईं हैं. उसका बोलना, बात करना एकदम से रुक गया. इससे पहले वह कुछ कहता-पूछता वह उसकी गोद में सिर रखकर लेट गई. ख़ामोशी ने जैसे सबकुछ कह दिया. शब्दों की जगह साँसें आगे की कहानी कहने लगीं.

उसने अपनी हथेली में उसके दोनों हाथों को कैद कर लिया. एक हाथ से उसके खुले बालों को सहलाते हुए वह रात को और गहराने लगा. बंद आँखों से बहती आँसुओं की धार को वह अपने दिल पर, अपनी आत्मा पर महसूस कर रहा था. उसने बाल सहलाते हाथों की गति बनाये रखी और आँखें बंद करके सिर पीछे दीवार पर टिका लिया. खामोशियों के बीच एहसासों की बारिश करते-करते कब दोनों गुलाबी सुबह के द्वार पर पहुँच गए, इसका भान न रहा.

टैरेस पर आती धूप और चिड़ियों की चहक ने दोनों की भावनात्मकता को अपने स्वर दिए. मुस्कुराते हुए वह बैठ गई. उसकी हथेलियों और बालों को अपने हाथों से मुक्त करते हुए उसने दोनों हथेलियों के बीच उसके मुस्कुराते चेहरे को थाम लिया. उसकी आखों में जन्मों का इंतजार, होंठों में सागरों की प्यास बेकरारी से मचल रही थी. अपनी हथेलियों में सजे उसके चेहरे की तरफ उसने बढ़ते हुए उसके माथे पर अपने गुलाबी दस्तक दी. एक पल को सुनहली सुबह की आभा, इधर-उधर बिखरी शबनम उनके होठों पर बिखर कर एक-दूसरे के होंठों पर सँवर गई.  

यादों और एहसासों की कैद से मुक्त होकर वे दोनों वर्तमान के साथ अपना तारतम्य बिठाने लगे.

तैयार हो जाऊँ फिर चाय मैं बनाऊँगी. तुम भी फ्रेश हो जाओ. कहते हुए वह बाथरूम की तरफ मुड़ गई.

जब ज़िन्दगी भर के लिए रोकने का अवसर था, तब न रोक कर एक अधिकार खो दिया था. फिर भी यदि हो सके तो कांफ्रेंस समाप्त होने के बाद एक दिन के लिए रुक जाना. उसने इसके जवाब में बिना कुछ कहे उसके हाथों पर अपनी हथेलियों के मखमली एहसास का अनुभव करवा कर अपने कदम कांफ्रेंस हॉल की तरफ बढ़ा दिए. वह ख़ामोशी से, नम आँखों के साथ उसे एक बार फिर अपनी ज़िन्दगी से जाता हुआ देखता रहा.  


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(लिखी जा रही प्रेम कहानियों सम्बन्धी पुस्तक में से )
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गुरुवार, 14 मई 2020

मखमली एहसास की खुशबू

मोबाइल को मेज पर टिका कर वह कुर्सी पर पसर गया. ‘कभी अपने घर को देखते हैं’ की तर्ज़ पर उसने एक नजर ड्राइंग रूम कम स्टडी रूम पर दौड़ाई. अस्तव्यस्त तो नहीं कहा जायेगा मगर करीने से लगा भी नहीं कहा जा सकता. पढ़ने के अलावा भी तमाम शौक के उसी कमरे में अपना आकार लेने के कारण बहुत सी चीजों ने जगह-जगह कब्ज़ा कर रखा था. ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि अकेले प्राणी के लिए क्या ड्राइंग और क्या स्टडी.

चौंकने जैसी स्थिति में वह किताबें, कागज, कलर्स, कैनवास आदि को उनकी जगह देने के लिए उठा. उसके आने के पहले सभी चीजों को यथास्थान कर दिया जाये अन्यथा कमरे में घुसते ही इसी बात पर लेक्चर मिल जायेगा. याद आया उसे, जब पहली बार वह उसके कमरे पर आई थी तो ‘यही सब खाते-पीते हो क्या? इन्हीं पर सोते-बैठते हो?’ के साथ उसने इधर-उधर बिखरी किताबों, कागजों, पेन आदि को समेटना शुरू कर दिया था. वह दिन याद आते ही एक मुस्कान के साथ उसने हाथ में पकड़ी किताबों को ज्यों का त्यों छोड़ दिया. आज उसके हाथ से स्टडी रूम संवर जाएगा तो बहुत दिनों तक उसकी महक बनी रहेगी.



साढ़े पाँच बजे महकती पवन की तरह उसका आना हुआ. उसके आने की आहट मात्र ने उन दिनों में पहुँचा दिया जबकि वह उसे अपनी सारी ज़िन्दगी में खुशियाँ बिखेरने के सपने देखा करता था. समय का ही खेल है जिसे ज़िन्दगी भर के लिए उसके साथ होना था वह चंद पलों के लिए अपने एहसासों की बारिश करने आई है.

“आदत अभी तक न बदली तुम्हारी. अभी भी कागज, रंग ही खाते हो. इन्हीं को ओढ़ते-बिछाते हो.” स्टडी रूम में कदम रखते ही उसके वर्षों पुराने अंदाज ने उसे भावनाओं से सराबोर कर दिया.

“एक मिनट रुको” कहते हुए वह सोफे से किताबों को उठाने के लिए आगे बढ़ा.

“तुम रहने ही दो. इतने ही काम वाले होते तो कमरा ऐसा न रहता. रुको मैं सही कर देती हूँ.” पूरे अधिकार के साथ वह कमरे को सजाने में जुट गई.

पहले तो वह कमरे के दरवाजे से टिका उसे सामान लगाते और उस पर बड़बड़ाते देख मुस्कुराता रहा फिर उसकी मदद करने लगा. इस दौरान दोनों के बीच पुराने दिनों की तरह हँसी-मजाक, छेड़छाड़ चलती रही. कभी एक हलकी सी मुस्कान के साथ बात आगे बढ़ती तो कभी ठहाकों के साथ.

“अब लग रहा है जैसे कोई रहता हो यहाँ. आती रहा करो बीच-बीच में इसे भी ज़िन्दगी देने के लिए.” कह कर उसे छेड़ा.

“मैं तो ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी देने के लिए आने वाली थी....” आगे के शब्दों पर होंठों के कंपन ने अवरोध पैदा किया. ख़ामोशी ने चीखना शुरू किया ही था कि “कुछ करना सीख लो या अब भी मेरे भरोसे ही रहोगे?” कहते हुए उसने माहौल को खुशनुमा बनाया.

उसके कुछ कहने के पहले ही अन्दर से नौकर चाय लेकर आया.

“चलो जल्दी चाय पी लो फिर कहीं बाहर चलते हैं खाना खाने.....” उसने बात काटते हुए अपनी बात जोड़ी “नहीं, कहीं बाहर नहीं जायेंगे. दो दिन से बाहर का खा-खाकर बोर हो गई हूँ. यहीं कुछ बनाती हूँ मैं.”

उसे बिन माँगे बहुत कुछ मिल गया. काश यह पल यहीं रुक जाए हमेशा के लिए.

“ओ हैलो, इधर ध्यान दो. कुछ है भी तुम्हारी किचन में या ऐसे ही बना रखा है अपने स्टडी जैसा?” उसके चेहरे पर अप्रत्याशित ख़ुशी, चमक और उसे कहीं खोया सा देख उसने टोका.

थोड़ी देर बाद किचन में उसके प्यार, स्नेह की रेसिपी अपनी खुशबू बिखरने लगी. किचन के एक कोने से टिका मंत्रमुग्ध सा उसे निहारे जा रहा था. इस समय उसके विचारों पर, पूरे व्यक्तित्व पर वही छाई हुई थी. बातों का जवाब न मिलने पर उसने पलट कर देखा तो खुद को ऐसे निहारते देखने पर एक पल को वह भी असहज हो गई.

“ऐसे क्या घूरने में लगे हो? पहली बार देख रहे हो?”

“कुछ नहीं. बस.... ऐसे ही....”

“अच्छा चलो, ज्यादा नौटंकी नहीं. चलो, भागो यहाँ से. डायनिंग टेबल सही करो और हाँ सलाद काट लो.” कहते हुए उसने धक्का देकर उसकी नजरों को अपने चेहरे से हटाया.

अपनी बाँहों पर उसकी उँगलियों का एहसास लेकर वह हँसते हुए डायनिंग टेबल की तरफ चल दिया.


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(लिखी जा रही प्रेम कहानियों सम्बन्धी पुस्तक में से )
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सोमवार, 4 मई 2020

जलेबियाँ बनी लॉकडाउन काल की वायरस

आँख खुलते ही श्रीमती जी को चाय के लिए आवाज़ लगाई. सुबह से तीसरी बार आँख खुली है. लॉकडाउन के कारण न सुबह का समय रह गया और न रात का. रात को जल्दी सोने की कोशिश में देर रात तक बिस्तर पर जाना हो पाता है. जल्दी सोने की कोशिश इसलिए क्योंकि सुबह जल्दी उठकर फिर सोना होता है. लॉकडाउन कुछ और करवा ही नहीं रहा. बस सो जाओ, जाग जाओ, फिर सो जाओ, फिर जाग जाओ. इसी सोने-जागने के बीच में खाना-पीना भी हो जाता. समझने वाली बात है, पीना-खाना नहीं हो पा रहा था, बंदी के कारण. बस खाओ और पियो. कभी पानी, कभी चाय.


कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए लॉकडाउन में घरबंदी में दिन-रात आराम से गुजर रहे थे. लोगों को लग रहा था कि वे संक्रमण से बचे हुए हैं मगर ऐसा नहीं था. कोरोना से ज्यादा खतरनाक वायरस लॉकडाउन में भी घर के अन्दर घुस चुका था. यकीन नहीं आपको? देखिएगा अपने आसपास, कहीं आप भी तो उस वायरस की चपेट में तो नहीं आ गए? ये वायरस है जलेबियाँ बनाने का. चौंक गए न? आप भी संक्रमित हैं क्या इससे?


लॉकडाउन में घर के पलंग तोड़ते, सोफों का आकार बिगाड़ते, कुर्सियों को रुलाते हुए सोशल मीडिया का जमकर दोहन किया जा रहा है. इसी में जलेबी वायरस ने घुसकर सबको संक्रमित कर दिया. जिसे देखो वो जलेबियाँ बनाने में लगा हुआ है. अरे बनाने को और भी बहुत कुछ है. पूरी बना लो, रोटी बना लो, सब्जी बना लो, बहुत ज्यादा क्रिएटिव करने का मन है तो हलवा बना लो, खीर बना लो, रायता बना लो मगर नहीं, जनाब बनायेंगे तो जलेबी ही. समझ नहीं आया कि आखिर ऐसा कैसा जलेबी-प्रेम है इनका कि महीने, दो महीने रुका न जा रहा. ऐसा लग रहा जैसे रोज जलेबी ही खाते रहे हैं. ठीक है भाई, बनाना है खूब बनाओ, खाना है खूब खाओ पर क्या जरूरी है उसे सोशल मीडिया पर शेयर करने की. पर नहीं, खुद तो मौज ले नहीं रहे, दूसरों को मौज में जीने नहीं दे रहे.

समझ नहीं आ रहा था कि लोग संक्रमण से बचने के लिए अपने घरों में कैद हैं या दूसरों के घरों में कलह पैदा करने के लिए? लॉकडाउन में पकवान, व्यंजन बनाने का सिलसिला ऐसे ही चलता रहा तो ये लॉकडाउन वीर हलवाइयों का, रेस्टोरेंट वालों का, छोटे-मोटे खोमचे वालों का व्यापार बर्बाद करवा के ही मानेंगे. अरे करमजलो, ध्यान रखो, ये लॉकडाउन तुमको कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए लाया गया है हलवाइयों का व्यापार चौपट करने के लिए नहीं, लोगों की शांत ज़िन्दगी को तहस-नहस करने के लिए नहीं.

अभी तक तो ठीक था पर इस जलेबी वायरस ने आकर सब छिन्न-भिन्न कर दिया. घर में जलेबी वायरस ने अपनी घुसपैठ कर ली. कोरोना वायरस से बचाव का तरीका लॉकडाउन या फिर क्वारंटाइन तो है मगर इस जलेबी वायरस से बचने का कोई तरीका नहीं. इसका सोर्स भी हमने पता कर लिया. सोर्स भी अपने ख़ास हैं जो रोज पता नहीं किस तकनीक से जलेबी बनाकर अपनी भाभी जी को भेजकर हमारे जी का जंजाल बनाये देते हैं.

अब कोस रहे उस पल को जब हमने अपने दोस्तों को सपत्नीक एक ग्रुप से जोड़ते हुए सबके बीच प्रेम, समन्वय, स्नेह पैदा करने का विचार किया था. आज उसी ग्रुप में हमारे सबसे आलसी, नाकारा मित्र का वीडियो पड़ा था, जलेबी वायरस से संक्रमित होने का. जब तक ये वीडियो नहीं आया था तब तक तो इस जलेबी वायरस से किसी न किसी तरह खुद को बचा रखा था मगर आज इसने अपनी तीव्रता दिखा ही दी.

आँख खोलते ही जैसे चाय की माँग हुई वैसे ही धमाका हुआ पहले जलेबी बनाने का. पलंग से गिरते-गिरते बचे. ये कहो कि कुर्सी पर या सोफे पर नहीं थे वर्ना गिर ही जाते. सामान के न होने, खमीर न उठने की, तकनीक न जानने की तमाम दवाओं का सहारा लिया मगर जलेबी वायरस ने पूरी तरह से श्रीमती जी को अपनी गिरफ्त में ले रखा था. सब कुछ तैयार है, बस जलेबी बनाना भर है का फरमान सुनाया गया. इसके साथ ताना ये मारा गया कि जब आपके ये मित्र बना सकते हैं तो आप काहे सकुचा रहे?

हमें अपने मित्र की काबिलियत पर भरोसा था सो वीडियो को कई-कई बार देखा. याद आ गया कि पिछले साल उसके घर में किसी कार्यक्रम के दौरान जलेबी बनाते हलवाई को अलग कर उसने बनी-बनाई जलेबी के साथ अपना वीडियो बनवाया था. श्रीमती जी को हकीकत बताते हुए बहुत समझाया कि ये खाना बनाने आया हलवाई बना रहा है न कि हमारा दोस्त मगर जलेबी वायरस के संक्रमण ने उन्हें नहीं छोड़ा.

आज की चाय और भोजन जलेबी बनने के बाद ही के अल्टीमेटम के बाद तो हमें वेंटिलेटर पर चढ़ाने जैसे हालात बन गए. जलेबी वायरस से बचने के लिए, लॉकडाउन में एक और लॉकडाउन झेलने के तनाव से बचने के लिए हामी भर दी. किचन से श्रीमती जी के द्वारा चाय बनाने की खटर-पटर सुनाई देने लगी और हम गुस्से में मोबाइल के द्वारा उस नामाकूल मित्र को ग्रुप में कोडवर्ड के द्वारा और पर्सनल पर सीधे-सीधे भयंकर-भयंकर वाली गालियाँ टाइप करने लगे.


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मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

इंतजार भरे जीवन का एक और इंतजार

सुबह के इंतजार में रात जागते-सोते काटी. सुबह होने के बाद इंतजार उसकी खबर का. थोड़ी-थोड़ी देर में मोबाइल को देखता कहीं वह घंटी सुन न पाया हो. कहीं फोन के बजाय मैसेज ही न किया हो. कभी सोचता कि वह खुद ही फोन करके जानकारी कर ले फिर कुछ सोच कर अपने को रोक लेता. व्यग्रता के बीच समय भी बहुत धीमे से आगे बढ़ रहा था. उसका किसी काम में मन नहीं लग रहा था. बेचैनी में इधर-उधर टहलने के बीच मोबाइल की घंटी बजते ही उसने लपक कर फोन उठाया. 


“क्या फोन पर ही बैठे थे?” दूसरी तरफ से जानी-पहचानी आवाज़ और हँसी सुनाई दी.

“इतनी देर लगा दी. बताओ, क्या प्रोग्राम बना?”


“नहीं आ पाऊँगी.” उसने बड़े धीमे से कहा.
“क्यों? क्या हो गया? क्या समस्या है? हम आ जाएँ?” उसने एक साँस में कई सारे सवाल दूसरी तरफ उछाल दिए.

इतने सारे सवालों के उत्तर में उसे जोरदार हँसी सुनाई दी, जो देर तक मोबाइल के सहारे उसके दिल-दिमाग में, उसके आसपास घूमती रही.

“इतने परेशान न हो. शाम तक आती हूँ.”

उसकी साँस में साँस आई यह सुन कर. “शाम माने, कितने बजे?” उसने आने के बारे में पूरा इत्मिनान करना चाहा.

“देखती हूँ, जैसा समय निकलेगा शाम को. अभी कुछ कह नहीं सकती.” 

इधर उधर की कुछ बातों के बाद दोनों ने बातचीत को विराम दिया. शाम को उसके आने की खबर अपने आपमें खुश करने वाली थी. वह सोचने लगा कि उसके न आ पाने की बात पर वह इतना बेचैन क्यों हो गया था? उससे मिलने की इतनी बेताबी क्यों है? दो-चार पल की मुलाकात में क्या वर्षों की बातचीत समाप्त हो पायेगी? कितनी-कितनी बातें हैं जो उसके साथ करनी हैं. कितना कुछ है जो बताना है. कितना कुछ है जो उससे सुनना-जानना है.

अब फिर इंतजार शुरू. शाम का इंतजार. शाम को किस समय आएगी? कितनी देर रुकेगी? दोपहर के बाद उसने अपने हिसाब से शाम का निर्धारण करना शुरू कर दिया. शाम चार बजे के बाद तो वह बार-बार घड़ी देखता, दरवाजे की तरफ देखता. घड़ी की सुई लगातार आगे बढ़ती हुई उसी धड़कन बढ़ा रही थी. कभी मन में उसके न आने की शंका उठती. कभी समय न निकाल पाने की मजबूरी दिखाई देती. कभी उसे लगता कि अपने घर पर क्या बताएगी कि कहाँ जा रही है, इसलिए न आये. कभी सोचता कि कहीं उसने मन रखने के लिए ही आने की हामी तो नहीं भर दी?

इसी ऊहापोह में उसने कई बार मैसेज छोड़ दिए. वह मैसेज देख लेती मगर जवाब नहीं दे रही थी. समय के गुजरने के साथ उसे एहसास होने लगा कि वह आएगी नहीं. उसके आने की ख़ुशी पर उसके न आने की आशंका भारी पड़ने लगी. इस भारीपन का आभास उसे होने लगा. 

तभी मोबाइल की मैसेजटोन ने उसका ध्यान खींचा. उसी का मैसेज था, एक स्माइली के साथ, ‘आती हूँ थोड़ा सा धीरज धरो.’

मैसेज पढ़ते ही उसके चेहरे पर मुस्कान तैर गई. पहले सोचा कि ‘लगा दूंगी मैं प्रेम की फिर झड़ी’ लिख कर रिप्लाई कर दिया जाए. फिर कुछ सोच कर उसने अपना विचार बदल दिया.

इस तरह के हँसी-मजाक, छेड़छाड़ उनके बीच अक्सर होती रहती थी. कई बार वह नाराज हो जाती थी. उसका नाराज होना अपने आपमें एक आश्चर्यजनक स्थिति रही है. कब किस बात पर नाराज हो जाये, कब किस बात को खुद मजाक बना दे, कहा नहीं जा सकता था. आज वर्षों बाद उसकी मुलाकात होनी थी और वह नहीं चाहता था कि उसकी किसी भी बात से वह नाराज होकर मिलने का प्लान बदल दे.

‘धीरज ही धरे हैं.’ लिख कर उसने रिप्लाई दिया और उसका इंतजार करने लगा.

इंतजार भरे उसके जीवन का एक और इंतजार.





(लिखी जा रही प्रेम कहानियों सम्बन्धी पुस्तक में से )
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सोमवार, 2 मार्च 2020

फिर वही ख़ामोशी


गले में कैमरा लटकाए वह बाजार में टहल रहा था. फोटोग्राफी के शौक में अक्सर वह यूँ ही टहलता रहता. कभी शहर में, कभी गाँव में, कभी बाजार में, कभी खेतों में, कभी दिन में, कभी रात में. टारगेट को फोकस करते ही एक पल को उसकी आँखें चमक उठीं. जो वहाँ उसकी कल्पना में नहीं था उसको ज़ूम करके उसकी वास्तविकता से परिचित होते ही वह उसी दिशा में लगभग दौड़ पड़ा.

“क्यों, तुम यहाँ कैसे, अचानक?” उसे अपने सामने देखकर वह भी चौंक उठी.

“तुम?” उसने भी सवाल पर जवाब के बजाय सवाल फेंका.

“हाँ, हम. तुम्हारा अचानक कैसे आना हुआ? कब आई? बताया भी नहीं?” उसने एकसाथ कई सारे सवाल उसी तरफ उछाल दिए.

“आराम से, आराम से.” उसने अपनी चिरपरिचित हँसी बिखेरते हुए उसे रोका और आगे बताया. “बस, ऐसे ही अचानक आना पड़ गया. हो गए दो-तीन दिन.”

“और हमें खबर भी नहीं?”

वह बिना कुछ बोले खामोश उसकी तरफ देखती रही. इतने वर्षों के बाद मिलने के बाद की ख़ामोशी को उसने ही चुहलबाजी करते हुए तोड़ा.

“मोटी हो गई हो.”

“और क्या, खाते-पीते घर की हूँ.” कहते हुए वही हँसी फिर आसपास थिरकने लगी, जिसका वह आज तक दीवाना है.

“चलो, घर चलते हैं.”

“आज नहीं, दो-चार लोग साथ हैं. कल कोशिश करती हूँ, आने की.”

“कोशिश नहीं, आना ही आना है.”

“बताती हूँ कल सुबह. अभी चलने दो. ठीक.” हाथ हिलाते हुए वह उसी दिशा में चल दी, जहाँ उसके साथ के लोग खरीददारी कर रहे थे.

चाहते हुए भी वह हाथ बढ़ाकर उसे रोक न सका. आज फिर वह उसे जाते हुए देखता रहा, वैसी ही ख़ामोशी से.



गुरुवार, 16 जनवरी 2020

शबनमी ख्वाब का एहसास


मोबाइल के तेज अलार्म को खामोश करके हम आराम से चादर तानकर लेटे रहे। कुछ देर बाद दरवाजे पर आहट हुई। लगा कि दोस्त घूम-टहल कर वापस आ गया है, सो लेटे-लेटे ही सवाल दागा। उधर से कोई जवाब नहीं मिला मगर पलंग पर किसी के बैठने का एहसास हुआ। चादर के कोने से उस तरफ मुँह घुमाते ही हमारी चीख निकल गई। पलंग पर वही रहस्यमयी स्वभाव वाली लड़की बैठी मुस्कुरा रही थी, जो ट्रेन यात्रा में लगातार साथ रही। नींद, आलस, पैर का दर्द एकदम गायब। इन सबके स्थान पर कई सारे सवाल उग आये जो उस लड़की की तरफ उछाल दिए।
आप परेशान न होइए। मैं ऊपर वाले रूम में रुकी हूँ। अभी नीचे उतरते समय आपका दरवाजा खुला देखा तो सोचा कि आप लोगों से मुलाकात कर लूँ।उसने बिना किसी लागलपेट के सीधे-सपाट शब्दों में बताया। मैं मुँह खोले उसे निहार रहा था। ट्रेन की तरह अब उसके चेहरे पर ख़ामोशी नहीं थी। आँखों में काजलयुक्त चंचलता, होंठों पर सुर्ख रहस्यमयी मुस्कान, गालों पर स्वर्गिक लालिमा स्पष्ट दिख रही थी।
चलिए सनराइज देखने चलते हैं।उसकी आवाज़ में खनक थी, हावभाव में प्रफुल्लता। हमने बिना कुछ कहे अपना सूजन भरा पैर उसके सामने कर दिया। मुझे मालूम है, कल शाम आप व्यू टावर के पास फिसल गए थे, पत्थरों पर।आँखें आश्चर्य से फ़ैल गईं। वही डर जो ट्रेन में उपजा था, उस लड़की के आपराधिक चरित्र के होने को लेकर। कहीं ऐसा न हो कि इसके साथी आसपास छिपे हों और मौका पाकर हमला कर दें? सनराइज देखने के बहाने लूटपाट करने का इरादा तो नहीं इसका? अपने आपको संयमित कर, पैर की चोट का हवाला देते हुए उसके साथ जाने से मना किया।
तभी उस लड़की ने पर्स से एक शीशी निकाल कर अपनी हथेली में दो-चार बूँदें डाली और बिना कुछ कहे चोट की जगह मालिश करनी शुरू कर दी। बर्फ जैसी ठंडक से चौंकना लाजिमी था। किसी लड़की के द्वारा पैर छूना खुद की सामाजिकता में न होने के कारण झटके से पैर हटा लिया।
घबराइए नहीं, परेशानी में सारे रीति-रिवाज, संस्कृति, सामाजिकता को नजरअंदाज कर देना चाहिए।कहते हुए उस लड़की ने मालिश करनी शुरू कर दी। पता नहीं वो क्या था मगर उसकी भीनी-भीनी खुशबू में एक तरह की बेहोशी सी छाने लगी। हाथ-पैर शिथिल से लगने लगे। वो लड़की मंद-मंद मुस्कुराते हुए पैर की मालिश किये जा रही थी। पलकें बोझिल सी होते-होते लगभग बंद सी हो गईं। सम्मोहन की अवस्था से जब बाहर आये तो खुद को उस लड़की के साथ सड़क पर खड़े पाया। तभी ख्याल आया कि हम यहाँ चलकर कैसे आये, पैर में तो चोट लगी थी। गौर किया तो पैर की चोट ज्यों की त्यों थी मगर दर्द पूरी तरह से गायब था। चलने में भी किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं आ रही थी। उसकी तरफ कौतूहल से देखा तो वह आँखें बंदकर सिर्फ मुस्कुरा दी।
पिछले तीन दिनों से इसी सड़क पर कई-कई बार घूमना हुआ मगर इस समय ये सड़क कुछ विशेष लग रही थी। हम दोनों खामोश चले जा रहे थे। मंद-मंद बहती शीतल हवा देह में खुशनुमा एहसास भर रही थी। एक गली की तरफ चलने का इशारा कर वो लड़की उस तरफ मुड़ गई। बिना कुछ सोचे-समझे हम भी उसी के साथ मुड़कर उस गली में चल दिए। कोई दस-बीस कदम चलने के बाद बाँए हाथ पर एक छोटी मठिया सी बनी दिखाई दी। सामान्य सी, बिना किसी सजावट, बिना किसी विशेष आकर्षण के बनी वो मठिया सैकड़ों वर्षों पुरानी अवश्य लग रही थी। आओकहते हुए वो लड़की झुककर उस मठिया के अन्दर चली गई। हम भी यंत्रवत उसके पीछे चल दिए।
अन्दर एकदम घुप्प अँधेरा। हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। उस लड़की ने हमारी उंगलियों में अपनी उंगलियाँ फँसा ली। एकदम सर्द हाथ। बर्फ से भी ज्यादा ठंडक समूचे शरीर में तैर गई। हम वशीभूत से उस लड़की के पीछे-पीछे चल दिए। कुछ देर चलने के बाद ऐसा लगने लगा जैसे आसमान के तारे आसपास उतर आये हों। अनेक रंग की मद्धिम रोशनियाँ आसपास तैर रही थी। अँधेरा होने के बाद भी आसपास की चीजों को महसूस किया जा सकता था। कहीं हलकी-हलकी हवा सा एहसास होता। कहीं-कहीं बादलों का सा आभास होता। उस लड़की के चलने के अंदाज से लग रहा था जैसे वो यहाँ नियमित रूप से आती-जाती हो। यहाँ की स्थिति से भली-भांति परिचित हो। हम उसके हाथ को थामे उसी के कदम से कदम मिलाते हुए चलते जा रहे थे।
अचानक हम दोनों एक चट्टान पर खड़े थे। आसपास पानी ही पानी भरा हुआ था। लड़की हमारा हाथ छोड़ आगे बढ़कर एक छोटी सी चट्टान पर बैठ गई। सामने समुद्र उछाल मार रहा था। शांत, निर्विकार भाव से बैठी लड़की शून्य में ताके जा रही थी। हम उसके बगल में बैठ गए।
“तुम कौन हो? मुझसे क्या चाहती हो? मुझे यहाँ क्यों लाई हो?” जैसे कई सवाल उसी तरफ उछाल कर उसके चेहरे पर नजर टिका दी। उसके चेहरे पर वही निर्विकार ख़ामोशी थी, जो ट्रेन में दिखती थी। होंठ वैसे ही खामोश। आँखें वैसे ही बेजान सी। उसने एक पल को हमारी तरफ देखकर आँखें बंद कर ली और अपने सिर को हमारे कंधे से टिका दिया। लगा कि समूची सृष्टि एक पल को रुक गई हो। रहस्यमयी घेरा और घनीभूत होने लगा। उगते हुए सूर्य ने अपनी गति को थाम लिया। शोर करती समुद्र की लहरों ने उछलना-कूदना बंद कर दिया। उस लड़की के चेहरे पर छाई ख़ामोशी की भांति ख़ामोशी चारों तरफ छा गई। निपट सन्नाटे में एक खनकती आवाज़ सुनाई दी। लाखों घुंघरुओं की खनक जैसा संगीत। हजारों पंछियों के कलरव सरीखी धुन। सैकड़ों बांसुरियों की स्वर-लहरियों का गान। न जाने कितनी शहनाइयों की उत्सवी सरगम की गूँज।
क्या हर सवाल का जवाब आवश्यक होता है? क्या कुछ सवालों का सवाल बने रहना उचित नहीं? क्या निरुत्तर होना पराजय का द्योतक है? क्या निस्वार्थ नींव पर रिश्तों की बुनियाद को खड़ा नहीं किया जा सकता? क्या रिश्तों की सम्पूर्णता के लिए देह का होना अनिवार्य है? क्या आत्मिक रिश्तों का अपना कोई सन्दर्भ नहीं?
कई-कई सवालों के जवाब में कई-कई सवालों के उभर आने से हतप्रभ होने की स्थिति बन गई। उसका स्वरूप एकदम से विराट नजर आने लगा और खुद का वजूद उसी के साये में गुम होता लगने लगा। सम्मोहित सी करने वाली वही आवाज़ पुनः आभामंडल में गूँजने लगी।
समूचा विश्व अपने-पराये के घरौंदों में कैद हो चुका है। ईश्वर, प्रकृति, नश्वरता, आस्तिकता, दर्शन, आत्मा, जीव, जगत, धर्म, संस्कृति, विचार, सम्बन्ध, रिश्ते, मर्यादा आदि को तिरोहित कर हम सब स्व में समाहित हो चुके हैं। सृष्टि को बचाने के लिए लौकिक-परालौकिक, सत्य-मिथ्या, ब्रह्म-जीव, आत्मा-परमात्मा, आकार-निराकार, जड़-चेतन, स्त्री-पुरुष आदि सब एकाकार होकर सृष्टि का ध्वंस कर एक नवीन सृष्टि की रचना करेंगे। हो सकता है तब तुम्हारे अनेकानेक सवालों का जवाब स्वतः मिल जाए।
कंधे से उसने अपना सिर हटाकर आँखों में आँखें डाल दी। आँसुओं से गीली उसकी बेजान आँखों में चंचलता दिखाई दी। निर्विकार चेहरे पर रौनक उतर आई। खामोश होंठ लरज उठे। “अनामिका नाम है मेरा और ये हमारी दोस्ती की निशानी” कहकर उसने एक कड़ा हमारी कलाई में पहना दिया। उसकी चपलता देख प्रकृति भी अपनी जड़ता तोड़ने को व्याकुल हो गई। समुद्र की लहरों का शोर तीव्रता पकड़ने लगा। सूर्य-रश्मियाँ पूर्ण आभा के साथ बिखरने लगीं।
लेकिन हम तो कुछ ला ही नहीं पाए तुम्हारे लिए।अपनी असमर्थता जताई तो उसने अपने दोनों हाथों में हमारी हथेलियों को पूरी ताकत से कैद कर लिया।
तुमने बहुत कुछ दे दिया आज हमेंकहकर वो एक झटके में खड़ी हो गई। भोर का अँधेरा पूरी तरह से मिट चुका था। आश्चर्य हुआ कि जिस छोटी चट्टान पर हम दोनों बैठे कई घंटे बिता चुके थे उसके ठीक पीछे विवेकानन्द रॉक मेमोरियल पूरी शान से चमक-दमक रहा था। हम दोनों भी उसी की आभा में जगमगा रहे थे। एक कदम आगे बढ़कर उसने अपने होंठों को हमारे होंठों से लगा दिया। समुद्र की लहरों ने पूरी तीव्रता से उछाल भरना शुरू कर दिया।
तुम मुझे कभी न छोड़नाचिल्लाती हुई वो लड़की पूरी ताकत से हमसे लिपट गई। सागरों की उछलती-कूदती, शोर करती लहरों ने समूची शिलाखंड को अपने में समाहित कर लिया। सब कुछ बस पानी ही पानी हो गया। न आसमान नजर आ रहा था, न सूर्य, न ही सूर्य की किरणें। रॉक मेमोरियल भी पिघलकर समुद्र में मिल चुका था। हम दोनों एकदूसरे को आलिंगनबद्ध किये खुद में चट्टान बन गए थे, एक प्रतिमा नजर आ रहे थे। एक जगह स्थिर, एक जगह शांत, एक जगह खामोश बस भीगती, भीगती और बस भीगती।
हड़बड़ा कर आँखें खुल गईं। पूरी देह पसीना-पसीना। गला सूखता सा। हम कहीं समुद्र में नहीं, किसी चट्टान पर नहीं अपने होटल के कमरे में थे। पलंग से उतर कर फ्रिज में रखी पानी की बोतल निकाल एक साँस में पूरी गटक ली। पानी गले के नीचे उतरते ही तन्द्रा लौटी। ये क्या, हम तो खड़े हो गए, कोई दर्द नहीं पैर में।पलंग पर बैठकर देखा तो चोट ज्यों की त्यों मौजूद। पैर में सूजन भी ज्यों की त्यों मगर दर्द बिलकुल नहीं। गहरी साँस लेकर खुशबू का एहसास करने की कोशिश की मगर किसी भी तरह का कोई अंश नहीं। हाथ टटोला, वहाँ भी कोई कड़ा नहीं। दरवाजा खोलने की कोशिश की मगर वो बाहर से बंद था। घड़ी दोपहर बाद का एक बजा रही थी। मोबाइल उठाकर दोस्त को फोन किया।
फ्रेश होकर यहीं आ जाओ, बड़ी मौज आ रही है। कमरे की चाबी होटल के रिसेप्शन पर है।दोस्त ने आदेश सा देकर फोन काट दिया। व्यू टावर पहुँच लहरों के किनारे बैठ गए। हमारा मित्र नारियल पानी पीते हुए लहरों का आना-जाना, उठना-गिरना, बनना-बिखरना देखने में मगन था। उसको पूरा सपना बताया तो उसने बिना कुछ कहे पॉलीथीन में बर्फ के बीच कैद एक कैन निकालकर हाथ में थमाई।
ले, इसे गटक जा, इससे सर्द नहीं होगा उसका हाथ। तेरे दिमाग में चढ़ गई है वो भटकती आत्मा। वैसे सपने में सिर्फ किस ही हो पाया या और कुछ भी।।कहते हुए उसने आँख मारी।
क्या यार तुम भी।कहकर कैन मुँह से लगा ली।
वापसी ट्रेन पकड़ने की अनिवार्यता के कारण दो-तीन घंटे समुद्री लहरों के साथ खेलने के बाद हम दोनों मित्र स्टेशन पहुँच गए। ट्रेन छूटने में अभी देर थी। तभी ले तेरी अनामिका आ गईकहते हुए मित्र ने टोका। पहले लगा कि वो हमारी ही मौज ले रहा है। कुछ कहते उससे पहले मित्र ने प्रवेश द्वार की तरफ इशारा किया। आश्चर्य! वाकई वो लड़की उसी प्लेटफ़ॉर्म पर चली आ रही थी। उन्हीं कपड़ों में जैसे कि उसने सपने में पहन रखे थे।
हेल्लो फ्रेंड्स!हमारे सामने रुकते हुए वो बोली। उसने अपना हाथ मिलाने के अंदाज में आगे बढ़ाया और बोली, “हाय, आय एम अनामिका। आज फिर आपके साथ यात्रा पर हूँ।
हम दोनों मित्र आश्चर्य में थे। समझ नहीं आ रहा था कि जो हो रहा है वो सच है या वही सपना शुरू होने वाला है? हम दोनों उसे अपलक निहार रहे थे और वह हमारी आँखों में झांकते हुए बस मुस्कुराए जा रही थी।