मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

परदे में नेता जी की मृत्यु का सच


नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु पर आज तक संदेह बना हुआ है और विद्रूपता ये कि अद्यतन सरकारों द्वारा किसी तरह की ठोस सकारात्मक कार्यवाही नहीं की गई है. इसको प्रसारित करने और एक तरह की सरकारी मान्यता देने कि नेता जी की मृत्यु १८ अगस्त १९४५ को एक विमान दुर्घटना में ही हो गई थी, अधिसंख्यक लोगों द्वारा अस्वीकार कर दिया गया है. नेता जी की मृत्यु की खबर के सन्दर्भ में सामने आते कुछ तथ्यों ने भी समूचे घटनाक्रम को उलझाकर रख दिया है. जहाँ एक तरफ नेता जी की मृत्यु एक बमबर्षक विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने पर बताई जा रही है वहीं ताईवानी अख़बार 'सेंट्रल डेली न्यूज़' के अनुसार १८ अगस्त १९४५ को ताइवान की राजधानी ताइपेह के ताइहोकू हवाई अड्डे पर कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ ही नहीं था. इसी तथ्य पर मिशन नेताजीसे जुड़े अनुज धर के ई-मेल के जवाब में ताईवान सरकार के यातायात एवं संचार मंत्री लिन लिंग-सान तथा ताईपेह के मेयर ने जवाब दिया था कि १४ अगस्त से २५ अक्तूबर १९४५ के बीच ताईहोकू हवाई अड्डे पर किसी विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने का कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है। बाद में २००५ में ताईवान सरकार के विदेशी मामलों के मंत्री और ताईपेह के मेयर ने ‘मुखर्जी आयोग’ के सामने भी इन्हीं बातों को दोहराया था. 

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि नेता जी उस विमान दुर्घटना में जीवित बच गए थे तो फिर वे गए कहाँ थे? तमाम वर्ष उन्होंने कहाँ व्यतीत किये? इन सवालों के जवाब जानने के लिए ये तथ्य जानना आवश्यक है कि आज़ाद हिन्द फ़ौज की स्थापना और इटली, जापान, जर्मनी से मदद लेने के पीछे नेता जी का एकमात्र उद्देश्य भारत को स्वतंत्र करवाना था. ये गतिविधियाँ ब्रिटेन को किसी भी रूप में पसंद नहीं थी अतः उसने नेता जी को अंतर्राष्ट्रीय अपराधी घोषित कर दिया था. अंग्रेज भले ही भारत को स्वतंत्र करना चाह रहे थे किन्तु वे नेता जी को अपराधी घोषित कर मुकदमा चलाने को बेताब थे. इधर नेता जी के सहयोगी रहे स्टालिन और जापानी सम्राट तोजो किसी भी कीमत पर उनको ब्रिटेन-अमेरिका के हाथों नहीं लगने देना चाहते थे. वे इस बात को समझते थे कि मित्र राष्ट्र में शामिल हो जाने के बाद ब्रिटेन-अमेरिका उन पर नेता जी को सौंपने का दवाब बनायेंगे. ऐसे में संभव है कि तत्कालीन स्थितियों में इस दवाब को नकार पाना इनके वश में न रहा हो और इन सहयोगियों ने किसी योजना के तहत नेता जी को अभिलेखों में मृत दिखाकर उन्हें अन्यत्र शरण दिलवा दी हो.

नेता जी की मृत्यु के सच को सामने न आने देने के पीछे कई बार नेहरु जी की मंशा काम करती दिखती है. संसद में जब-जब नेता जी की दुर्घटना की जाँच करवाए जाने की माँग उठी, नेहरू जी ने उस पर ध्यान नहीं दिया. यहाँ तक कि जाँच आयोग बनाये जाने की माँग भी वे कई वर्षों तक टालते रहे. जब जनप्रतिनिधियों ने गैर-सरकारी जाँच आयोग बनाने का निर्णय ले लिया तब नेहरू जी ने सन १९५६ में पहले जाँच आयोग के गठन का निर्णय लिया. इसके साथ ही आज़ादी के बाद न तो नेता जी को और न ही आज़ाद हिन्द फ़ौज के सैनिकों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्ज़ा दिया गया. इसके उलट स्वतंत्र भारत में आज़ाद हिन्द फ़ौज के सैनिकों पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा भी चलाया गया. इस तथ्य के अतिरिक्त स्टालिन द्वारा आज़ादी के बाद नेता जी को वापस भारत बुला लेने के सम्बन्ध में नेहरू जी को लिखा पत्र भी महत्त्वपूर्ण है. इस पत्र के जवाब में नेहरू स्टालिन को लिखते हैं, वे जहाँ हैं, उन्हें वहीं रहने दिया जाये.

नेहरू अथवा सरकार की कार्यप्रणाली ने बराबर संदेह ही पैदा किया है. सत्ता का केन्द्रीयकरण कर चुके लोग नहीं चाह रहे थे कि नेता जी का सत्य किसी भी रूप में सामने आये या फिर खुद नेता जी ही सामने आयें और सत्ता विकेन्द्रित हो जाये. इस मानसिकता के चलते गठित किये गए ‘शाहनवाज़ आयोग’ के निष्कर्षों को बहुतायत सांसदों ने, देश की जनता ने ठुकरा दिया और अंततः साढ़े तीन सौ सांसदों द्वारा पारित प्रस्ताव के बाद १९७० में इंदिरा गाँधी को जस्टिस जी० डी० खोसला की अध्यक्षता में एक दूसरा आयोग गठित करना पड़ा. इस जाँच आयोग के गठन के सम्बन्ध में भी सरकार की नीयत में खोट ही दिखाई देती है क्योंकि खोसला नेहरूजी के मित्र थे और वे जाँच के दौरान ही इन्दिरा गाँधी की जीवनी लिख रहे थे. जाँच के लिए बना तीसरा ‘मुखर्जी आयोग’ कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश के बाद बनाया गया. इसमें सरकार के हस्तक्षेप को नकारते हुए न्यायालय ने स्वयं ही मुखर्जी को आयोग का अध्यक्ष बना दिया तो सरकार ने उनकी जांच में अड़ंगे डालना शुरू कर दिए. जो दस्तावेज ‘खोसला आयोग’ को दिये गये थे, वे ‘मुखर्जी आयोग’ को देखने तक नहीं दिये गए. प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय सहित सभी जगह से नौकरशाहों का रटा-रटाया जवाब आयोग को मिलता कि भारत के संविधान की धारा 74(2) और साक्ष्य कानून के भाग 123 एवं 124 के तहत इन दस्तावेजों को नहीं दिखाने का ‘प्रिविलेज’ उन्हें प्राप्त है. इन तमाम बातों, मानसिकताओं, मतभेदों के साथ-साथ भारत सरकार के रवैये पर संक्षिप्त रूप से निगाह डालें तो इस प्रकरण की जाँच पर प्रश्नवाचक चिन्ह लग जाते हैं. भारत सरकार ने वर्ष १९६५ में गठित 'शाहनवाज आयोग' को ताइवान जाने की अनुमति नहीं दी थी. आयोग ने समूची की समूची जाँच देश में बैठे-बैठे ही पूरी कर ली थी. और शायद इसी का सुखद पुरस्कार उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल करके दिया गया. १९७० में गठित 'खोसला आयोग' को भी रोका गया था किन्तु कुछ सांसदों और कुछ जन-संगठनों के भारी दवाब के कारण उसे ताइवान तो जाने दिया गया मगर किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी संस्था से संपर्क नहीं करने दिया गया. ‘मुखर्जी आयोग’ ने भारत सरकार से जिन दस्तावेजों की मांग की वे आयोग को नहीं दिए गए. रूस में भी जाँच आयोग को पहले तो जाने नहीं दिया गया बाद में आयोग को न तो रूस में नेताजी से जुड़े दस्तावेज देखने दिए गए और न ही कलाश्निकोव तथा कुज्नेट्स जैसे महत्वपूर्ण गवाहों के बयान लेने दिए गए.  

पारदर्शिता बरतने के लिए लागू जनसूचना अधिकार अधिनियम के इस दौर में भी नेता जी से मामले में किसी भी तरह की पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है. नेता जी दुर्घटना का शिकार हुए या अपनों की कुटिलता का; नेता जी देश लौटे या देश की सरकार ने उनको अज्ञातवास दे दिया; वे रूस में ही रहे या फिर कहीं किसी विदेशी साजिश का शिकार हो गए....ये सब अभी भी सामने आना बाकी है. ऐसे में सत्यता कुछ भी हो पर सबसे बड़ा सत्य यही है कि देश के एक वीर सपूत को आज़ादी के बाद भी आज़ादी नसीब न हो सकी. ये हम भारतवासियों का फ़र्ज़ बनता है कि कम से कम आज़ादी के एक सच्चे दीवाने को आज़ाद भारत में आज़ादी दिलवाने के लिए संघर्ष करें... जय हिन्द!!!  
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कुमारेन्द्र सिंह सेंगर 
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उक्त आलेख जनसंदेश टाइम्स, दिनांक-21-04-2015 के सम्पादकीय पृष्ठ पर टिप्पणी कॉलम में प्रकाशित हुआ.

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

आज बड़े कमीने लग रहे हो!!!


कमीनापंथी’.....‘कमीने’.... ये शब्द देखकर चौंक गये होंगे आप? किसी का भी चौंकना स्वाभाविक है इन शब्दों पर क्योंकि ये शब्द एक गाली के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। अभी तक ऐसी स्थिति आई नहीं थी कि इन शब्दों को भद्रजनों की भाषा-शैली में शामिल किया जाये क्योंकि माना जाता रहा है कि गाली तो गाली ही होती है। अब एक सवाल ये उठता है कि क्या समय की आधुनिक परिभाषाओं में इन शब्दों को स्वीकार कर लेना चाहिए? यह सवाल एक हमारे मन में ही नहीं घुमड़ता होगा, कभी न कभी, कहीं न कहीं यह आपको भी परेशान करता होगा। अब करता रहे परेशान तो करे जिसको ये शब्द समाज में प्रचलित करने हैं वे तो कर ही रहे हैं।
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चलिए, आपकोसेक्सीशब्द सुनकर क्या विचार आता है? फिर चौंके? कुछ सालों तक इस शब्द के मायने कुछ अलग थे। इसके उच्चारण में एक प्रकार की झिझक देखने को मिलती थी। आज ये शब्द हम बेधड़क होकर इस्तेमाल करते हैं। बड़े हों या फिर छोटे सेक्सीके प्रयोग में कोई शर्म किसी को महसूस नहीं होती है। और तो और सेक्सी शब्द के मायने अब इस रूप में बदले हैं कि हम अपने नन्हे-मुन्नों के लिए भी इस शब्द को प्रयोग करने लगे हैं। किसी को विशेष ड्रेस पहना देख कर हम अकसर कह देते हैं कि इस ड्रेस में बड़ा सेक्सी लग रहा है। अकसर हम इस शब्द को मजाक के रूप में भी इस्तेमाल कर लेते हैं और क्या हाल है, बड़े सेक्सी बने घूम रहे हो?’ यदि इस शब्द की सहज स्वीकार्यता के सापेक्ष देखा जाये तो क्याकमीनाशब्द इतना सहज स्वीकार्य हो पायेगा? छोड़िये, हो पायेगा का जवाब शायद कोई भी न दे पाये क्योंकि हमारे फिल्म संसार ने लगभग स्वीकार्यता की स्थिति में तो इस शब्द को लाकर खड़ा कर ही दिया है। याद है आपको वो गाना-मुश्किल कर दे जीना, इश्क कमीना’, यह गाना बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ा था, चढ़ा है।  कालांतर में इस गाने का विकास-क्रम बढ़ा और एक फिल्म आ गई कमीने’....। स्वीकार्यता की ओर एक सशक्त कदम क्योंकि जैसे सेक्सी शब्द की स्वीकार्यता बढ़ी थी मेरी पैंट भी सेक्सी, मेरी शर्ट भी सेक्सी........से वैसे ही ‘कमीने’ शब्द की स्वीकार्यता भी बढ़नी चाहिए, इस गीत से। आखिर मित्रों में आपस में चर्चा होगी चल ‘कमीने’ देख आते हैं। माँ के पूछने पर बेटी-बेटे कहेंगे-‘माँ दोस्तों के साथ कमीने देखने जा रहे हैं।’
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अब फ़िल्मी दुनिया से इतर नवोन्मेषी राजनैतिक लोग भी इस शब्द का प्रयोग करने लगे हैं. इससे वे लोग जो फ़िल्मी कलाकारों के बजाय राजनीतिक लोगों को अपना आदर्श मानते हैं, सहजता के साथ इन शब्दों का प्रयोग कर सकेंगे। आखिर झिझक खुलने की बात है, वैसे इससे कहीं आगे जाकर झिझक खोलने का काम ‘एआईबी’ शो ने भी किया है। समझने वाली बात है कि फ़िल्मी दुनिया में अथवा राजनीति में संलिप्त लोग क्या इन शब्दों के अर्थ नहीं समझते? क्या अब समाज में विकृत मानसिकता को ही फैलाने का चलन काम करेगा?
कुछ भी हो किन्तु अब आने वाले समय में इस तरह के वाक्यों से भी रू-ब-रू होने की सम्भावना है ‘‘देखो-देखो मेरे बेटे को, इस ड्रेस में कितना कमीना लग रहा है।’’ ‘‘आज गजब हो गया, तुम्हारे कमीनेपन ने तो मजा बाँध दिया।’’ हो सकता है कि आपके बच्चे ही आपसे कहें, “क्या कमीनापंथी लगा रखी है” या फिर “पापा! आज बड़े कमीने लग रहे हो। क्या आप इसके लिए तैयार हैं?
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डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर 
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ये व्यंग्य दिनांक - 10 अप्रैल 2015 के जनसंदेश टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.

गुरुवार, 26 मार्च 2015

इन्सान देवता की तरह, देवता इन्सान की तरह खेले


विश्वकप क्रिकेट के दौरान तो जैसे एकाएक कारनामा हो गया, हमारे खिलाडी पाकिस्तान के खिलाफ मैच क्या जीते, समूचा मीडिया कह उठा कि ऐसा लगा मानो देवता खेल रहे हों. मीडिया ने कहा तो समूची जनता को भी कहना, मानना पड़ा और देखते ही देखते इंसानी खिलाड़ी भगवान हो गए. हार के पास पहुँच कर भी जीतते-जीतते हमारे देवता फाइनल मैच तक आ गए. अब लगा कि इन देवताओं को भी शक्ति की आवश्यकता है. यज्ञ, हवन, व्रत, उपवास आदि किये जाने लगे; कोई अंक विद्या का ज्ञाता पांच अंक का मन्त्र ज्ञात कर बैठा. समूची शक्ति इन कागजी शेरों (क्रिकेट के देवताओं) को जिताने में लग गई. 
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फाइनल हुआ, देवता इन्सान की तरह खेले और दूसरे इन्सान चैम्पियनों की तरह. हमारे देवता हारे, विपक्षी इन्सान जीते. सारी की सारी आँकड़ेबाज़ी धरी की धरी रह गई. सारे यज्ञ, हवन शांत हो गए, सारे व्रत, उपवास खंडित हो गए, बाकी बचा तो बस आंसुओं का सैलाब, न दांये-बांये का चक्कर काम आया और न ही अंक विद्या का पांच का मन्त्र. तो इसमें निराशा की क्या बात है? सन १९८३ के बाद से और हो क्या रहा है? हर बार हमारी टीम के विश्वकप जीतने की सम्भावना प्रबल होती है और हर बार हम हार जाते हैं. कहीं न कहीं तो कमी रह ही जाती है? कहाँ? बस यही नहीं पता. खैर... अगला विश्वकप सन २००७ में है और यह तो हम निश्चित ही जीतेंगे. कहो कैसे? तो जरा निगाह नीचे भी डालें....
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१. भारत ने पहला विश्वकप जीता था लगातार दो बार की विश्वकप विजेता वेस्टइंडीज़ को हराकर. तब से न कोई लगातार दो बार विश्वकप जीता और न भारतीय टीम ने किसी को हराया. अब आस्ट्रेलिया ने लगातार दो बार विश्वकप जीता, तो अगली बार भारत ही विश्वकप जीतेगा, आस्ट्रेलिया को हराकर.
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२. भारत ने विश्वकप जीता था सन १९८३ में, यानि कि अंक विद्या के अनुसार १+९+८+३=२१=२+१=३, अंक आया तीन. सीधी सी बात है कि भारत उसी वर्ष विश्वकप जीतेगा जिस वर्ष का अंक तीन का गुणांक होगा. इस दृष्टि से आगामी विश्वकप सन २००७ का अंक भी ९ हो रहा है, तो जीत पक्की.
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३. सन १९८३ का विश्वकप तीसरा विश्वकप, वर्ष का अंक भी तीन, इसी तरह आगामी विश्वकप नौंवां और वर्ष का अंक भी तीन. तो समझो कि विश्वकप भारतीय टीम का हो गया.
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४. अंक विद्या वालों को पता होगा कि तीन, छह, नौ के अंक एक ही वर्ग के होते हैं. इस दृष्टि से भारत का विश्वकप छठे अथवा नौंवें विश्वकप में आना पक्का होता. छठा तो गया, आगामी है नौंवां, तो सभी भक्तो मगन हो जाओ और मौज करो.
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आह!!... अब थोड़ी राहत मिली लोगों को, नहीं तो लग रहा था कि जैसे अपनी इज्जत ही हार गए. करोड़ों रुपयों की बर्बादी के बाद भी खाली हाथ!! कभी सोचता हूँ कि आँकड़ेबाज़ी, इतने यज्ञ, हवन, व्रत, उपवास, इतनी मान्यता, इतना धन यदि हम गरीबी, भ्रष्टाचार, आतंक, हिंसा, भूख, बेरोजगारी मिटाने के लिए करें तो शायद कोई समस्या ही नहीं रहे. पर नहीं, हम तो इन्सान हैं, इंसानों को तो सारी समस्याएं सहनी ही पड़ेंगी. आँकड़ेबाज़ी, यज्ञ, हवन, व्रत आदि तो देवताओं के लिए हैं, सो हम लोग कर ही रहे हैं..... फिर देवता कुछ भी करें.... चाहें हारें, चाहें जीतें. हम तो मगन रहेंगे और समस्याओं में जियेंगे, मरेंगे.... फिर अगले विश्वकप के लिए भी तो आँकड़ेबाज़ी, कारीगरी, बाजीगरी करनी है अभी.... है कि नहीं!!
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कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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(वर्ष २००३ में फ़ाइनल में भारतीय टीम की शर्मनाक पराजय के बाद लिखा व्यंग्य. ये व्यंग्य स्थानीय समाचार पत्रों.... दैनिक कर्मयुग प्रकाश और दैनिक अग्निचरण के २९ मार्च २००३ के अंक में प्रकाशित भी हुआ था.)

बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

गणतंत्र विकास हेतु प्रत्येक नागरिक रहे जागरूक



गणतंत्र विकास हेतु प्रत्येक नागरिक रहे जागरूक
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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हमारा स्वतंत्र देश भारत, विश्व के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक राष्ट्रों में शामिल इस देश को की अद्भुत संरचना है। पंद्रह अगस्त को स्वतंत्रता के पश्चात् इस देश में गणतांत्रिक प्रक्रिया की आधारशिला भी रखी गई। ये अपने आपमें एक विशिष्ट अवसर कहा जा सकता है जबकि वर्षों की गुलामी से आज़ादी पाने के साथ ही देश-विभाजन का दंश, दंगों के घाव को पाने के बाद भी देश ने अपना संविधान, अपना गणतंत्र विकसित किया। 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान को लागू किया गया और माना गया कि भारत एक गणतांत्रिक देश है। देश में   भारत के संविधान को लागू किए जाने के पूर्व भी 26 जनवरी का अपना महत्त्व था। 31 दिसंबर सन् 1929 को लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें इस बात की घोषणा की ग‌ई कि यदि अंग्रेजी सरकार 26 जनवरी 1930 तक भारत को उपनिवेश का पद (डोमीनियन स्टेटस) प्रदान नहीं करेगी तो भारत अपने को पूर्ण स्वतंत्र घोषित कर देगा। जैसा कि अंदेशा था कि अंग्रेजी सरकार कुछ नहीं करेगी, वाकई उसने कुछ नहीं किया. तब कांग्रेस ने देश की पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा करते हुए अपना सक्रिय आंदोलन शुरू कर दिया। इसी लाहौर अधिवेशन में पहली बार तिरंगे झंडे को भी फहराया गया और सर्वसम्मति से ये भी फैसला लिया गया कि प्रतिवर्ष 26 जनवरी को पूर्ण स्वराज दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इस दिन सभी स्वतंत्रता सेनानी पूर्ण स्वराज का प्रचार करेंगे। इस तरह 26 जनवरी अघोषित रूप से भारत का स्वतंत्रता दिवस बन गया था। उस दिन से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त होने तक 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा। कालांतर में जब इस तिथि को संविधान लागू किया गया तो 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। 
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गणतंत्र शब्द का आशय एक ऐसी व्यवस्था से लगाई जा सकती है जहाँ सबके लिए सामान रूप से व्यवस्थाएं कार्य करती हैं; जहाँ राज्य सञ्चालन होने के बाद भी एक सर्वोच्च संस्था कार्य करती है। वर्तमान में इसी गणतंत्र को लोकतंत्र के नाम से भी समझा जा सकता है। यहाँ हम गणतंत्र की सैद्धांतिक व्याख्या करने के स्थान पर उसके व्यावहारिक पक्षों का आकलन करें तो पाएंगे कि आज़ादी के बाद के वर्षों में हमने गणतांत्रिक व्यवस्था का दुरूपयोग ही अधिक किया है। जहाँ एक और गणतंत्र का पालन करने में राज्य-संघ का अपना अलग रवैया रहा है वहीं आम नागरिकों ने भी गणतंत्र की आत्मा के साथ छल किया है। यहाँ दोनों पक्षों के कार्यों का आकलन करना भी समीचीन है क्योंकि न तो राज्यों-संघ अकेले से गणतंत्र का सञ्चालन सुगमता से होने वाला है और न ही सिर्फ नागरिकों के जिम्मे इसको सहजता से चलाया जा सकता है। यदि केंद्र-राज्य को एक संस्था के रूप में और नागरिकों को भी एक स्वतंत्र संस्था के रूप में मन लिया जाये तो देखने में आया है कि दोनों संस्थाओं ने अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय नहीं किया और कहीं न कहीं गणतंत्र की मूल भावना को चोट पहुँचाई है।
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यदि राजनैतिक दलों या कहें कि केंद्र-राज्य सञ्चालन करने वाले दलों, सदन में बैठने वाले दलों, उनके प्रतिनिधियों के कार्यों की चर्चा की जाये तो कहीं न कहीं ये लोग कालिख लगे नजर आते हैं। देश हित सर्वोपरि के स्थान पर इनके द्वारा स्वार्थमय राजनीति की जाने लगी। तुष्टिकरण की नीति, किसी भी रूप से सत्ता प्राप्त हो की नीति इनके लिए प्रभावी भूमिका निभाने लगी और इसी का दुष्परिणाम ये हुआ कि देश की संसद को भी शर्मसार होना पड़ा तो कई-कई राज्यों के सदन भी इन जन-प्रतिनिधियों के आपसी झगड़ों के शर्मनाक कृत्यों के गवाह बने। संविधान का निर्माण करने वाले विद्वानों को कभी इस बात का अंदेशा भी नहीं रहा होगा कि देश की संसद में कभी संख्याबल के लिए जोड़-तोड़ की, खरीद-फरोख्त की राजनीति की जाने लगेगी; उन्होंने कभी इस पर भी विचार नहीं किया होगा कि देश के राजनेता, राजनैतिक दल कभी सत्ता के लालच में किसी निर्दलीय को भी राज्य का मुख्यमंत्री बना देंगे। इस देश में राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए वो-वो सब हुआ जो संविधान रचने वालों ने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा। देश की संसद में ऐसा प्रधानमंत्री भी आया जो सदन में नहीं आ सका; संसद में ऐसे व्यक्ति के हाथों में सत्ता दी गई जिसके पास समूचे सदन की संख्या का दसवां हिस्सा तक नहीं था; संसद में ही रिश्वत काण्ड के खुलासे के लिए नोटों को उछाला गया; जहाँ प्रधानमंत्री को रिश्वत के लिए कटघरे में खड़ा किया गया; जहाँ एक समय ऐसा भी आया जबकि देश का प्रधानमंत्री उसी सदन का निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं था। ये सारी स्थितियां वे रहीं जिन पर कभी गर्व नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा स्वार्थपरक, तुष्टिकरण की राजनीति ने देश को कैसे-कैसे दिन, कैसी-कैसी घटनाएँ दिखाई कहना कठिन है, समझना उससे भी अधिक कठिन है।
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गणतंत्र को मजाक समझने की स्थिति में मात्र राजनेता ही आगे नहीं रहे वरन आम नागरिकों ने भी संविधान का, गणतंत्र का मखौल बनाया है। अधिकार पाने की होड़ लगातार नागरिकों में दिखाई दी किन्तु अपने कर्तव्यों के प्रति एक तरह की नकारात्मकता देखने को मिली। यही कारण रहा कि आम इंसान के मन में न तो देश की संसद के प्रति सम्मान रहा, न राजनीति के प्रति, न राजनीतिज्ञों के प्रति। विडम्बना तो इस बात की है कि महज राष्ट्रीय पर्वों पर देशभक्ति गीतों के गाने बजाने; देशभक्ति के नाम पर सड़कों पर बेतरतीब बाइक चलाने, हुडदंग करने; आज़ादी के नाम पर खुद को दूसरे पर कब्ज़ा जमा लेने की मानसिकता रखने; सरकारी संपत्ति को बर्बाद करने की वस्तु मानने; रिश्वत, भ्रष्टाचार आदि को समाज की वास्तविकता स्वीकार्य मानने को ही वास्तविक गणतंत्र समझा जाने लगा। महिलाओं के साथ अपराध, पारिवारिक हिंसा, लूटमार, हत्या, जबरन कब्ज़ा करने की मानसिकता, अपहरण आदि ऐसी स्थितियां हैं जो कदापि गणतंत्र के अनुकूल नहीं कही जा सकती हैं। स्वतंत्रता का दुरूपयोग करके, अपने को सर्वोच्च सिद्ध करने की मानसिकता ने गणतांत्रिक व्यवस्था का रूप विकृत कर दिया है। राजनीति की निराशा आम आदमी के जीवन में दिखाई देने लगी है, ये कदापि उचित स्थिति नहीं कही जाएगी।
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निराशा के बनते चतुर्मुखी माहौल को ऐसा नहीं है कि सुधारा न जा सके, किन्तु इसके लिए बजाय दोषारोपण के समवेत रूप से कार्य करने की आवश्यकता है। राजनीति में सुधार के लिए ये अपरिहार्य है कि राजनेता स्वच्छ छवि के आयें, दागी, अपराधी प्रवृत्ति के लोगों का बहिष्कार किया जाये, धर्म-जाति-क्षेत्र की राजनीति से ऊपर उठकर जनप्रतिनिधियों का चुनाव किया जाये; मतदान को महज अवकाश समझने की बजाय उसको अपना कर्तव्य समझना चाहिए और लोकतंत्र की सशक्तता के लिए आगे आना चाहिए। यदि प्रत्येक व्यक्ति मतदान को अपना कर्तव्य समझकर इसका पालन करे और स्वच्छ छवि के लोगों को निर्वाचित करने का कार्य करे तो भविष्य में स्वतः ही सदन दागी जनप्रतिनिधियों से रहित होगा। कुछ इसी तरह की जागरूकता नागरिकों को भी अपने व्यवहार में लानी होगी क्योंकि किसी भी देश का निर्माण वहाँ के नागरिकों से ही होता है। हम सभी को ये समझना होगा कि हमारी स्वतंत्रता हमारी अभिव्यक्ति के लिए है, हमारे स्वतंत्र जीवन-निर्वहन के लिए, स्वतंत्र रूप से अपने धार्मिक कृत्य करने के लिए है, अपनी रुचि के अनुसार कार्य एवं कार्यक्षेत्र चुनने के लिए है न कि किसी दूसरे की स्वतंत्रता-अधिकार के हनन के लिए। अपने किसी भी कार्य को करवाने के लिए अनुचित साधनों का प्रयोग करना; किसी दूसरे को लाभान्वित करने का लालच देकर कोई भी कार्य संपन्न करवाना; लालच देकर किसी को भी अपने अधीन करने की मानसिकता रखना आदि का यदि प्रत्येक इंसान त्याग कर ले तो समाज से लालच, रिश्वत, भ्रष्टाचार स्वतः ही समाप्त हो जायेगा।
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हमें ये ध्यान रखना होगा कि देश की, हमारी आज़ादी कोई एक-दो दिन का, एक-दो लोगों का प्रयास नहीं है अपितु ये कई-कई वर्षों की, कई-कई शहीदों की तपस्या का सुखद परिणाम है। इसे सुरक्षित रखना, इसको संवर्धित करना हम नागरिकों का कर्तव्य है। अपनी भावी पीढ़ी को हम वर्तमान स्वतंत्रता के लिए किये गए प्रयासों से परिचित करवाएं; इस आज़ादी के लिए किये गए बलिदान का उनको स्मरण करवाएं; इंसान से इंसान का भाईचारे का रिश्ता उनको समझाएं; सामुदायिकता-सहयोग की भावना को विकसित करने का मन्त्र उनको सिखाएं; रोजगार के स्थान पर जनोपयोगी शिक्षा देने का कार्य करें तो ऐसा कतई संभव नहीं कि हमारा लोकतंत्र अक्षुण्य न रहे। देश की महान लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को, गणतांत्रिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए, सुरक्षित रखने के लिए हम सभी नागरिकों को सजग, सचेत, चैतन्य होना चाहिए और इसे अनिवार्य रूप से अपना कर्तव्य समझना चाहिए।
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उक्त आलेख त्रैमासिक पत्रिका 'अदबनामा' के जनवरी-मार्च 2015 के अंक में प्रकाशित क्या गया है.