गुरुवार, 8 मार्च 2018

मातृत्व भी बाजार के हाथों में


शिक्षित व्यक्ति विमर्श करने की क्षमता का विकास कर लेता है. तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर तर्कशील बन जाता है. इधर कुछ समय से लगने लगा है कि आधुनिकता के नाम पर साक्षरता जैसे देह के आसपास सिमटती जा रही है. इस देह में भी उस विमर्श के लिए स्त्री-देह सबसे सहज विषय-वस्तु बन गई है. इसी कारण अब तर्क-वितर्क में बहुधा महिलाओं से सम्बंधित मुद्दे, महिलाओं से सम्बंधित विषय ज्यादा सामने आने लगे हैं. इन विषयों पर, मामलों पर कुतर्क जैसी स्थितियाँ न केवल पुरुषों द्वारा बल्कि स्त्रियों द्वारा भी अपनाई जा रही हैं. विगत कुछ समय से स्त्री-विषयक बहसें लगातार सामने आ रही हैं. समझ से परे है कि ये स्त्रियों को स्वतंत्रता का अधिकार का ज्ञान कराने के लिए हो रहा है या फिर उनकी स्वतंत्रता की आड़ में बाजार को सशक्त किया जा रहा है? कुछ दिनों पहले हैप्पी टू ब्लीड जैसा आन्दोलन चला. जिसके द्वारा महिलाओं की माहवारी को केंद्र में रखा गया. कुछ अतिजागरूक महिलाओं ने खुद को इस आन्दोलन में सूत्रधार की तरह से आगे धकेलते हुए माहवारी के दाग के साथ खुद को प्रदर्शित किया. इस हैप्पीनेस को पाने के बाद इन्हीं आन्दोलनरत महिलाओं ने सेनेटरी पैड के मुद्दे को हवा देने का काम किया. इस बार इनका मुद्दा सस्ते पैड नहीं वरन इन पैड के विज्ञापनों में दिखाए जा रहे नीले रंग को लेकर था. आखिर जब खून लाल रंग का होता है तो फिर पैड के विज्ञापन में नीला रंग क्यों? वाकई स्त्री-सशक्तिकरण के नाम पर धब्बा था ये नीला रंग. आखिर लाल को नीले से परिवर्तित करके पुरुष महिलाओं को रंगों के अधीन भी लाना चाहता होगा.


अब एक नई बहस छिड़ी हुई है स्तनपान को लेकर. एक पत्रिका के कवर पर स्तनपान कराती मॉडल का चित्र बहुतों के लिए अशोभनीय रहा, बहुतों के लिए मातृत्व का परिचायक. इस मॉडल के मातृत्व के पक्ष में बहुतों ने न केवल हिन्दू धार्मिक उदाहरणों को सामने रखा वरन विदेशी संसद की कुछ महिलाओं के उदाहरण भी दिए. इस तरह की चर्चा लगभग दो-तीन साल पहले उस समय भी छिड़ी थी जबकि कुछ मॉडल्स ने नग्न, अर्धनग्न रूप में स्तनपान कराते हुए फोटोसेशन करवाया था. बहरहाल, स्तनपान किसी भी महिला के जीवन का सुखद क्षण होता है, सुखद अनुभूति होती है. स्तनपान की अहमियत को एक महिला, जो माँ बन चुकी है, बखूबी समझ सकती है. किसी पत्रिका के कवर पेज के लिए, भले ही उसका मंतव्य किसी न किसी रूप में स्तनपान की अवधारणा को विकसित करना ही क्यों अ रहा हो, स्तनपान को सार्वजनिक करना मातृत्व का परिचायक नहीं है. बहुत सूक्ष्म रूप में इसे न समझ सहज भाव से समझने की आवश्यकता है कि स्तनपान के द्वारा एक माँ न केवल अपने शिशु को भोजन दे रही होती है वरन उस शिशु के साथ गहरा तादाम्य स्थापित कर रही होती है. उन पावन क्षणों को जिन महिलाओं और पुरुषों ने पावनता के रूप में देखने की कोशिश की होगी उनको इसका अनुभव होगा कि उस क्षण जहाँ शिशु के हाथ-पैर माता के स्तन से खेल रहे होते हैं वहीं माता के हाथ उसके सिर पर आशीष-रूप बने रहते हैं. इस दौरान उन माताओं के हावभाव कम से कम इस पत्रिका की मॉडल जैसी भाव-भंगिमा जैसे नहीं होते हैं. उनके चेहरे की आत्मीयता, संतुष्टि का भाव इसके चेहरे जैसा कामुक नहीं होता है.

समझने वाली बात यह भी है कि जो महिलाएं कुछ दिनों पूर्व तक हैप्पी टू ब्लीड के नाम पर उस मानसिकता से स्वतंत्रता पाना चाहती थीं जो स्त्रियों को माहवारी के दिनों में कैद जैसी स्थिति दे देता है वे आज़ादी के रूप में स्तनपान की सार्वजनिकता चाह रही हैं. यही महिलाएं ब्रा से मुक्ति की चाह में सडकों पर ब्रा की होली जलाती हैं, खुद को बिना ब्रा के प्रदर्शित करती हैं वही महिलाएं अब स्वतंत्रता, सार्वजनिक होने के नाम पर ब्रा-युक्त स्तनपान की अवधारणा पैदा कर रही हैं. आखिर स्वतंत्रता को किस पैमाने पर उतारकर महिलाओं की आजदी के लिए वास्तविक आज़ादी की माँग ये कर रही हैं, इन्हें स्वयं नहीं मालूम. असल में बाजार ने महिलाओं को आधुनिकता के नाम पर उत्पाद बनाकर रख दिया है. स्त्री-सशक्तिकरण से जुडी महिलाएं, अपने आपको मंचों के सहारे महिलाओं की अगुआ बताने वाली महिलाएं ऐसे किसी भी मामले के लिए पुरुष को दोषी ठहराएँ मगर सत्य यही है कि आज महिलाएं स्वतः बाजार के हाथ की कठपुतली बनती जा रही है. न केवल महिलाओं से जुड़े उत्पादों में वरन पुरुषों से जुड़े उत्पादों में भी स्त्री-देह निखर कर सामने आ रही है. विज्ञापनों में महिलाओं को विशुद्ध कामुकता की पुतली बनाकर पेश करने की होड़ लगी हुई है. बॉडी स्प्रे का विज्ञापन हो तो महिला ऐसे दिखाई जाती है जैसे वह सारी उम्र, सारी शर्म छोड़कर सिर्फ देह की चाह रखती है. एक अगरबत्ती का विज्ञापन ऐसे दिखाता है जैसे उसकी महक किसी भी स्त्री को सेक्स के लिए उत्तेजित कर सकती है. चाय हो, ब्लेड हो, बनियान हो, साबुन हो, सौन्दर्य प्रसाधन हो या फिर कोई अन्य उत्पाद सभी के द्वारा महिलाओं को कामुक, उत्तेजक भूमिका में इसी बाजार ने खड़ा कर दिया है.

वर्तमान में उठा स्तनपान का ये मुद्दा विशुद्ध बाजारीकरण की देन है. जिस तरह से उस मॉडल को स्तनपान कराते प्रस्तुत किया गया है वह बाजारी दृष्टि को ही प्रदर्शित करता है. ऐसे बाजार को न माता से मतलब है, न शिशु से मतलब है और न ही स्तनपान से. इसके लिए बस अपने उत्पादों का विक्रय अनिवार्य है. किसी न किसी कीमत पर उनको बेचना उनकी प्राथमिकता है. अब इसके लिए चाहे हैप्पी टू ब्लीड के दाग हों, चाहे पैड का नीला-लाल रंग हो, कंडोम की कामुकता हो, अगरबत्ती में छिपी मादकता हो, ब्रा-पैंटी का उभार हो या फिर स्तनपान के द्वारा स्त्री-देह का प्रदर्शन हो. मातृत्व की आड़ में सामने लाये गए, बहस का विषय बनाये गए स्तनपान के बाद देखिये बाजार किस-किस गोपन को अगोपन बनाकर सामने लाता है?


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यह आलेख जनसंदेश टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर दिनांक 08-03-2018 को प्रकाशित किया गया.

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

प्यार का एहसास - ग़ज़ल

तेरे खुशबू में भरे ख़त मैं जलाता कैसे,
प्यार में भीगे हुए ख़त मैं जलाता कैसे,
तेरे उन खतों को गंगा में बहा सकता नहीं,
आग बहते हुए पानी में लगा सकता नहीं,

वो ख़त आज भी मेरे दिल की दौलत हैं,
तूने जो छोड़ी है मेरे पास वो अमानत है.

जब कभी भी खुद को तन्हा पाता हूँ,
खतों के साथ तेरे पास पहुँच जाता हूँ.

नहीं होगा यकीन तुझको मगर कर ले,
दिल के कोने में ये एहसास जरा भर ले.

मेरे होने में तेरा अक्श नजर आता है,
मेरी आँखों में तेरा रूप उभर आता है.

अपनी मुहब्बत को झूठ बताएं कितना,
जो सच है वाकई में उसे छिपाएं कितना.

तेरी खातिर इक चुप सी लगा लेता हूँ,
तेरे खतों को कहीं अपने में छिपा लेता हूँ.

वो धड़कन हैं, साँसें हैं मेरी कोई क्या जाने,
तू ही न समझी तो कोई और भला क्या जाने.

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कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र
12-09-2017

न सपने तू देखा कर

कितना समझाया है मन मतवाले,
न सपने तू देखा कर-
सपनों की दुनिया में महज छलावे,
न सपने तू देखा कर-
सपनों की दुनिया निर्मोही,
खो जायेगा ओ मनमौजी,
सुख है केवल दो पल का,
वह भी केवल कोरा-कोरा,
मृगतृष्णा सी एक जगाकर,
आ जाते हैं हमें डराने,
कितना समझाया है मन मतवाले,
न सपने तू देखा कर-
सपने हैं इक झील विशाल,
चमके जगमग नीला आकाश,
चांद तारों का रूप दमकता,
मोहित होता तू देख छटा,
झोंका हवा का अगले ही पल,
मचा देता है जैसे हलचल,
जगमग झील का रूप बदलता,
मंजर बस उठती गिरती लहरों का,
ढूँढें किसमें चन्दा तारे,
अब तो बस धारे ही धारे,
कितना समझाया है मन मतवाले,
न सपने तू देखा कर-
सपना एक सजाया फिर भी,
घरौंदा एक बनाया फिर भी,
जुगनू की जगमगाहट जिसमें,
चिड़ियों की चहचहाहट जिसमें,
राह-राह पर फूल खिले हैं,
नहीं कहीं भी शूल मिले हैं,
महकी जिसमें खुशियां ही खुशियां,
नहीं दिलों के बीच दूरियां,
लेकिन जीवन एक हकीकत,
न सपनों से जाये काटे,
कितना समझाया है मन मतवाले,
न सपने तू देखा कर-

तपती दुपहरी की शाम

तपती दुपहरी की शाम 
देखी है कभी?
दिल जब कभी तन्हा सा लगे
साथ होकर कोई साथ न दिखे
ऐसे में कोई लगा कर अपने गले 
रोम-रोम में अपनापन भर दे
तब दिखाई देती है
तपती दुपहरी की शाम।

तपती दुपहरी की शाम 
महसूस की है कभी?
धूप दुखों की फैली हो सिर पर
सुख की छाँव कहीं आये न नजर
ऐसे में बिन बादल कोई बरस कर
तन-मन को कर जाये तरबतर
तब महसूस होती है
तपती दुपहरी की शाम।

तपती दुपहरी की शाम 
सुनी है कभी?
खुद का सन्नाटा चीखने लगे
रोशनी दिन की डराने लगे
ऐसे में मंद पवन चल के
कानों में मंगलगान भर दे
तब सुनाई देती है
तपती दुपहरी की शाम।

तपती दुपहरी की शाम
बनकर देखा है कभी?
तन्हाई में उसको गले लगाकर
दो बोल अपनेपन के उसे सुनाकर
संवेदना की फुहार बरसा कर
आसान कर देते हो उसका सफर
तब बनते हो उसके लिए
तपती दुपहरी की शाम।

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कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र
13-09-2017

शनिवार, 2 सितंबर 2017

जिंदगी को कभी तो ज़िन्दगी बनाओ

जिंदगी को कभी तो ज़िन्दगी बनाओ,
रोना बहुत हुआ अब तो मुस्कुराओ.

चाँद को रोटी बता बहुत बहलाया,
भूखे को अब असली रोटी दिखाओ.

बेबसी से उसका जन्म से नाता है,
एक बार उसे ख़ुशी से मिलवाओ.

ज़िन्दगी लाख बेवफ़ा हो बनी रहे,
इस बेवफ़ा से परिचय तो करवाओ.

मौत के साथ जो रोज खेलता है,
उसको मौत के नाम से न डराओ.

समझना चाहते हो गर दर्द को,
खुद को खुद से ऊपर उठाओ.


रविवार, 6 अगस्त 2017

उलाहना प्यार भरा

उस दिन रविवार था, अगस्त का पहला रविवार. उन दिनों मोबाइल सपने में भी सोचा नहीं गया था. बेसिक फोन की घंटी घनघनाई. रविवार होने के कारण सभी लोग घर में ही थे. कोई विशेष दिन मनाये जाने का न चलन था और अपनी आदत के अनुसार हम भी ऐसे किसी दिन के प्रति सजग-सचेत नहीं थे. सचेत-सजग तो आज भी नहीं हैं. बहरहाल, घनघनाती फोन की घंटी रुकी और उधर से हमको पुकारते हुए अम्मा बोली, किसी लड़की का फोन है. दिमाग की सारी घंटियाँ घनघना गईं.
हैलो के साथ हैप्पी फ्रेंडशिप डे की खनकती आवाज़ कानों में घुल गई. सेम टू यू कहने के बाद कुछ और आगे कहते उससे पहले ही दूसरी तरफ से कमेन्ट मारता हुआ उलाहना आकर कानों में गिरा, 'आप पहले फोन करके विश नहीं कर सकते थे? उलाहना देने का अंदाज़ भी इतना गज़ब कि अपनी आदत के अनुसार ठहाका मारते हुए हमने इतना कहा, दोस्ती में ऐसी औपचारिकता हम नहीं करते.
दो-तीन मिनट के बाद जब फोन रखा तो समझ नहीं आया कि इस तरह की हलकी-फुलकी मधुर नोंक-झोंक के बाद समाप्त हुई या फिर बात शुरू हुई? समय गुजरता रहा. वक्त बदलता रहा. स्थितियाँ-परिस्थितियाँ बदलती रहीं मगर बात ख़तम होकर जहाँ शुरू हुई थी वो न बदली. अगस्त आता रहा. अगस्त का पहला रविवार आता रहा. हर बार की तरह फोन उधर से ही आता रहा. हर बार विश करने के बाद वही मधुर उलाहना दिया जाता रहा, आप पहले फोन करके विश नहीं कर सकते थे? हमारा वो ठहाकेदार जवाब वैसे ही निकलता रहा.

सबकुछ बदलने के बाद भी लगता है जैसे कुछ न बदला. दोस्ती की नोंक-झोंक न बदली. दोस्ती का वो बेलौस अंदाज़ न बदला. अबकी फिर अगस्त आया है. अबकी फिर अगस्त का पहला रविवार आया है.

रविवार, 21 मई 2017

भगवानदास की विदाई - लघुकथा

लोग एक-एक करके मंच पर आते, माइक पर खखारते और फिर लम्बी-लम्बी फेंकना शुरू करते. व्यक्ति-विशेष की तारीफ में हॉल के भीतर ही पुल बनाये जाने लगते हैं. माइक पर शब्दों की लफ्फाजी करता व्यक्ति, बातों के बताशे फोड़ता हुआ तारीफों के बांधे जाते पुल के सहारे धीरे से कम्पनी प्रबंधन की तरफ मुड़ जाता. ऐसा वह कम्पनी प्रबंधन की निगाह में आने के लिए करता. आखिर आज मौका हाथ लगा था. कम्पनी प्रबंधन के चहेते कर्मचारी भगवानदास का विदाई समारोह जो मनाया जा रहा था. वैसे उनका नाम भगवानदास नहीं था मगर अपने आपको परम ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, भगवान भक्ति में लीन रहने वाला दिखाए जाने के कारण उनको कम्पनी में भगवानदास के नाम से जाना-पहचाना जाने लगा था.

कम्पनी प्रबंधन के परम चहेते, अतिविश्वस्त भगवानदास आज कम्पनी से विदा हो रहे थे. कम्पनी के सभी कर्मचारी इस प्रयास में थे कि भगवानदास की कुर्सी एक दिन को भी खाली न रहे. इसी कारण भगवानदास के साथ-साथ कम्पनी प्रबंधन के गुणगान किये जा रहे थे. अपनी बात समाप्त करते और मँहगा सा समझ आने वाला उपहार भगवानदास को थमाते हुए एक अतिरिक्त उपहार कम्पनी प्रबंधक के चरणों में भी अर्पित करते.

अब माइक पर शब्दजाल बिखेरने की बारी मंचस्थ लोगों की आ चुकी थी. भगवानदास ने सबका शुक्रिया अदा किया. खूब तालियाँ बजीं. इन्हीं तालियों के बीच कम्पनी प्रबंधक ने आकर सबकी तारीफ की. भगवानदास की विशेष तारीफ की. उनकी जगह खाली होने का, उनकी कमी का दुःख भी व्यक्त किया. कम्पनी प्रबंधक की एक-एक पंक्ति पर सारे खूब तालियाँ पीटते. तालियों के द्वारा वे अपने होने का एहसास प्रबंधक को कराना चाहते थे. असल में इसके सहारे वे अपना नाम भगवानदास की जगह सुनना चाहते थे. तालियों के शोर के बीच कम्पनी प्रबंधक ने भगवानदास की सेवाओं, समर्पण, ईमानदारी आदि की तारीफ करते हुए अपने अधिकारों का उपयोग कर उन्हें सेवा-वृद्धि देने की घोषणा की. भगवानदास अब नियमित कर्मी न होकर प्रबंधनकर्मी होंगे जो नियत मानदेय पर कम्पनी को अपनी सेवाएँ देंगे.

अब हॉल में सन्नाटा था. तालियाँ का शोर अचानक थम गया. सब समझ गए कि भगवानदास का प्रबंधनकर्मी होना, नियत मानदेय पर आना तो बस छलावा है. असल में वे उन्हीं अधिकारों से लैस होंगे जैसे नियमित सेवा में थे. सब समझ चुके थे कि भगवानदास विदा होकर भी विदा नहीं हुए हैं.