शनिवार, 30 जनवरी 2016

तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त

बचपन से साथ निभाती चली आई स्याही के कार्यों पर हमेशा से गर्व का अनुभव होता रहा है. स्याही जैसी बहुआयामी प्रतिभा को हमने न तो बचपन में नियंत्रित रखा और न ही कभी उसके बाद. कुछ लोगों का मानना है कि स्याही का काम सिर्फ और सिर्फ लेखन के लिए होता रहा है, अब वो भी गुजरे ज़माने की बात हो गई. हमने तो एक पल को भी ऐसा विचार नहीं किया. बचपन से ही स्याही के बहुआयामी व्यक्तित्व को पहचान कर उसको विभिन्न तरीके से अपने उपयोग में लाते रहे थे, आज भी ला रहे हैं. ऐसे में कोई स्याही के बारे में अनर्गल कुछ भी कह दे, गुजरे ज़माने का बता दे तो बहुत कोफ़्त होती है. इसके साथ-साथ एक अजब समस्या से भी सामना करना पड़ जाता है. जब भी स्याही लेने के लिए बाज़ार जाओ या फिर नया फाउंटेनपेन माँगो तो दुकानदार अजब भाव-भंगिमा के साथ ऐसे देखता है जैसे किसी दूसरे ग्रह का प्राणी देख लिया हो. ऐसे देखेगा जैसे ऐसी चीज माँग ली जो अब इस धरती पर उपलब्ध ही नहीं है. कई बार तो ऐसा देख-सुनकर अपराध-बोध जैसा, हीनता-बोध जैसा महसूस होने लगता है, मानो स्याही माँग कर खुद के पिछड़े होने का सबूत दे दिया हो.

बहरहाल, लोगों को स्याही पर हीनता का बोध क्यों न आता रहा हो मगर हमें तो उसके मल्टीडाइमेंशनल होने पर गर्व रहा है. जब भी इच्छा होती उसी स्याही से चित्रकारी करने लग जाते. कभी कागज़ पर, कभी दीवार पर तो कभी कपड़ों पर. इसी तरह जब मन किया तो उसी स्याही से होली का आनंद उठा लिया. सोते में घर-परिवार में भाई-बहिनों की दाढ़ी-मूँछें उगानी हों तो स्याही को याद कर लिया. इसके अलावा घर के कई कामों में भी स्याही की प्रतिभा का उपयोग कर लिया जाता, कभी निशान लगाने के काम, कभी कांच के बर्तनों में भरकर शो-पीस बनाए जाने के काम. हालाँकि अब तो मॉडर्न तरीके के बॉलपेन, रीफिल आने से स्याही की माँग में घनघोर गिरावट देखने को मिली है. अब तो बच्चे उस होली से वंचित रह जाते हैं जो उस प्रिय स्याही के बल पर कभी भी खेली जाने लगती थी.

इधर कुछ समय से भला हो उन नवोन्मेषी राजनैतिक परिवर्तकों का, जिन्होंने स्याही-प्रेमियों के मन में उपजती हीनभावना को भी दूर कर दिया. अब तो जब मर्जी होती है, वे लोग भी हमारे बचपने की तरह होली खेलने में लग जाते हैं. ये और बात है कि इनकी होली में स्याही के रंग का उतना तीखापन नहीं दिखता है जैसा कि हमारे बचपने की होली में होता था किन्तु चेहरे पर, दाढ़ी पर, गाल पर, हाथ पर स्याही के चंद छींटे ही अपनी निशानी को पर्याप्त पुख्ता बनाते हैं. इनकी इस फेंकमफाकी राजनीति से बाज़ार में स्याही का रुतबा एकदम बुलंद हो गया. हमें अपनी स्याही पर गर्व हो रहा है कि भले ही कोई राजनैतिक कारण रहा हो मगर उसने बड़ों-बड़ों को भी उसका साथ लेने को मजबूर कर दिया. गर्व इस कारण से भी हो रहा है कि अब स्याही मांगने पर दुकानदार हमें पिछड़ा नहीं कहेगा, हमें आदिकालीन सभ्यता का प्राणी नहीं समझेगा, हमारी बहुआयामी व्यक्तित्व स्याही को बिसरायेगा नहीं. उधर टीवी पर वे स्याही से रँगा चेहरा साफ़ करते दिखाए जा रहे हैं, इधर हमारा दिल स्याही के अनगिनत कार्यों को याद करते हुए मन ही मन गाना गुनगुनाने लगा कि तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त.


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ये व्यंग्य जन्संदेश टाइम्स, 30-01-2016 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है...

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

सूचना का अधिकार का उपयोग सार्थक और सकारात्मक तरीके से हो

सूचना का अधिकार का उपयोग सार्थक और सकारात्मक तरीके से हो

          इक्कीसवीं सदी के डेढ़ दशक गुजर जाने के बाद भी बहुतायत देशवासी अभी भी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के सार्थकतापूर्ण पालन करने की मानसिकता को विकसित नहीं कर सके हैं. आज भी सुविधाओं, अधिकारों, नियमों का निरंकुश ढंग से उपयोग किया जाने लगता है. उपयोग की इसी स्वतंत्रता, अधिकारों की निरंकुश आज़ादी के चलते बहुधा अतिक्रमण भी कर लिया जाता है. आजकल ऐसा ही सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के साथ किया जा रहा है. सरकारी तंत्र से जानकारी लेने की, गोपनीयता के नाम पर छिपाकर रखी जानकारी को प्राप्त कर लेने की स्वतंत्रता का उपयोग सकारात्मक रूप से जितना होना चाहिए था उससे कहीं अधिक उसका उपयोग नकारात्मक रूप में किया गया. पीएमओ कार्यालय के आरटीआई विभाग के अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2015 में लगभग तेरह हजार आरटीआई आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें बहुतायत में ऐसे रहे जिनका पीएमओ से कोई लेना-देना भी नहीं था. इसके बाद भी वहाँ के आरटीआई विभाग को अधिनियम की बाध्यता के चलते उनका जवाब देने को मजबूर होना पड़ा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कब-कब रोजा-इफ्तार पार्टी में गए? उनका संविधान ज्ञान कितना, कैसा है? उनकी रसोई में कौन सा एलपीजी सिलेंडर प्रयोग होता है? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बायोडाटा, उनका फोटो, उनका मोबाइल नंबर तक आरटीआई आवेदन द्वारा माँगा गया. स्पष्ट है कि इस तरह की जानकारियों के लिए आरटीआई का प्रयोग किया जाना कहीं न कहीं इस सशक्त अधिनियम को कमजोर करने की दिशा में उठाया गया कदम समझा जा सकता है.

कुछ इसी तरह की सूचनाओं की प्राप्ति के आवेदनों के चलते, इस अधिनियम के दुरुपयोग को देखते हुए हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने सूचनाओं की प्राप्ति के लिए संशोधन प्रस्तुत किये हैं. इसके अंतर्गत प्रदेश सरकार ने सूचना प्राप्त करने सम्बन्धी अनुरोध की शब्द-सीमा निर्धारित करते हुए पाँच सौ शब्द निर्धारित कर दी है. माँगी गई सूचना सम्बंधित लोक प्राधिकारी द्वारा रखे गए या उसके नियंत्रणाधीन अभिलेखों का एक भाग होनी चाहिए. इसके साथ-साथ माँगी गई सूचना में प्रश्न ‘क्यों’ जिसके माध्यम से किसी कार्य के किये जाने अथवा न किये जाने के औचित्य की माँग की गई हो, का उत्तर दिया जाना अंतर्ग्रस्त नहीं होना चाहिए; माँगी गई सूचना में काल्पनिक प्रश्न का उत्तर प्रदान करना अंतर्ग्रस्त नहीं होना चाहिए; माँगी गई सूचना इतनी विस्तृत नहीं होनी चाहिए कि उसके संकलन में संसाधनों का अननुपाती रूप से विचलन अंतर्ग्रस्त हो जाने के कारण सम्बंधित लोक प्राधिकारी की दक्षता प्रभावित हो जाये. इससे भी आगे जाते हुए प्रदेश सरकार ने सूचना प्राप्ति के लिए एक अधिकृत प्रारूप का निर्माण भी किया है, भविष्य में अब उसी प्रारूप में सूचना माँगना अनिवार्य किया गया है. कुछ वर्ष पूर्व इस तरह के संशोधन कर्नाटक, महाराष्ट्र सरकारों द्वारा किये जा चुके हैं.

          देखा जाये तो स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद देश में स्वतन्त्रता के अधिकार का हवाला देते हुए इस गोपनीयता कानून को समाप्त करने की, इसमें व्यापक फेरबदल करने की वकालत की जाने लगी थी. देश के विभिन्न आयोगों, संस्थाओं और विभागों आदि की ओर से भी इस कानून में बदलाव की सिफारिश की गई. प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग 1968, भारतीय विधि आयोग 1971, भारतीय प्रेस परिषद् 1981, द्वितीय प्रेस आयोग 1982 आदि ने समय-समय पर गोपनीयता कानून में व्यापक संशोधन की बात को उठाया. वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्रसंघ की आमसभा में सन् 1946 में एक प्रस्ताव में कहा गया कि सूचना का अधिकार मनुष्य का बुनियादी अधिकार है तथा यह उन सभी स्वतन्त्रताओं की कसौटी है, जिन्हें संयुक्त राष्ट्रसंघ ने प्रतिष्ठित किया है. इसी तरह सन् 1948 में अन्तर्राष्ट्रीय कन्वेंशन में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने घोषणा की कि जानकारी पाने की इच्छा रखना, उसे प्राप्त करना तथा किसी माध्यम द्वारा जानकारी एवं विचारों को फैलाना मनुष्य का मौलिक अधिकार है. इन समवेत प्रयासों का सकारात्मक परिणाम यह रहा कि हमारा देश सूचना का अधिकार लागू करने वाला दुनिया का 61वां देश बना. केन्द्रीय स्तर पर मार्च 2005 को एक प्रस्ताव संसद में पेश किया गया और उसी वर्ष 12 मई को राज्यसभा में इसे पारित करने के साथ ही 12 जून 2005 को राष्ट्रपति ने स्वीकृति दे दी.

सूचनाधिकार का उपयोग केवल किसानों, मजदूरों, राशनकार्ड, मस्टररोल, वेतन भुगतान तक ही सीमित नहीं रह गया था. जागरूक संस्थाओं, जनता ने इस अधिकार का प्रयोग करके शासन-प्रशासन के कार्यों में अनियमितताओं, कमियों, भ्रष्टाचार को उजागर किया. सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली में भ्रष्टाचार के उजागर होने के साथ ही मंत्रालयों के कार्यों में अनियमितताओं का मिलना, मंत्रियों द्वारा की जा रही विसंगतियों का पाया जाना भी प्रमुख रहा है. इन सफलताओं के बाद भी अधिनियम की विगत एक दशक की यात्रा में केन्द्रीय सरकार द्वारा तीन बार संशोधन के प्रयास करना अपनी तरह की कहानी कहता है. ये और बात है कि आरटीआई कार्यकर्ताओं के विरोध और अन्य कारणोंवश केन्द्रीय सत्ता द्वारा अधिनियम में संशोधन नहीं किये जा सके हैं किन्तु जिस तरह से आये दिन आरटीआई के दुरुपयोग किये जाने की घटनाएँ सामने आ रही हैं वो अपने आपमें चिंता का विषय है. बहुतायत में ऐसे मामले प्रकाश में आये हैं जिनसे ज्ञात हुआ कि कथित तौर पर आरटीआई कार्यकर्ताओं द्वारा सूचनाएँ मांगे जाने के नाम पर आवेदन करने के बाद सम्बंधित विभाग से, अधिकारियों से लेन-देन करके मामले को दबा दिया गया. ऐसे मामलों और सरकारी भ्रष्टाचार के लगातार उजागर होते जाने के चलते आरटीआई सरकार के गले की फाँस बनता जा रहा है. ऐसे में सरकारी तंत्र द्वारा अधिनयम की विसंगतियों के नाम उसे कमजोर करने के अवसर तलाश रही है और अधिनियम का दुरुपयोग करने वाले बेतुकी, अतार्किक, असंगत सूचनाओं की माँग करके सरकार को संशोधन करने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध करवाते जा रहे हैं.

सत्य तो यह है कि सूचना का अधिकार एक ऐसा वरदान है जिसके पूर्ण रूप से सफल होने के लिए हम सभी को संगठित होने की आवश्यकता है. सामाजिक संगठनों को, जागरूक नागरिकों को इस ओर सकारात्मक, सार्थक कार्य करने की आवश्यकता है. सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 भारतीय नागरिकों के हाथों में व्यापक अधिकारों को सौंपता है. यदि देश की कार्यपालिका के पास शासकीय गोपनीयता कानून है, विधायिका के पास संसदीय विशेषाधिकार है, न्यायपालिका के पास न्यायालय की अवमानना सम्बन्धी कानून है तो भारतीय नागरिकों के पास कारगर और अचूक अधिकार सूचना का अधिकार है. इस अधिकार को बचाए-बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि आरटीआई से जुड़े लोग इसके सदुपयोग को लेकर, इसकी सार्थकता को लेकर, इसकी सकारात्मकता को लेकर भी सजग रहें अन्यथा वो दिन दूर नहीं जबकि सरकार इसकी विसंगतियों को दूर करने के नाम पर आम आदमी के अधिकार को कमजोर कर देगी. 



उक्त आलेख दिनांक 19.01.2016 के जन्संदेश टाइम्स में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है. 

चिल्लाने की रोकथाम - व्यंग्य

चिल्लाने की रोकथाम

पार्टी उनको लेकर संशय में है, वे पार्टी को लेकर संशय में हैं और दोनों अपनी-अपनी गतिविधियों को लेकर संशय में हैं. संशय भी विकट है. पार्टी उनको शत्रु समझ रही है और वे पार्टी को. लोगों में भी संशय इसको लेकर है कि कौन शत्रु की भूमिका में है और कौन मित्र की भूमिका में है. पार्टी ने जब उन पर ध्यान नहीं दिया तो वे चिल्ला-चोट मचाने पर उतर आये. उनको कई बार समझाया भी गया कि हर जगह, हर स्थिति में ऐसे खड़े होकर शोर मचाया उचित नहीं, मगर एक वे हैं कहते हैं कि खामोश, हम तो हर बार खड़े होकर ही चुने जाते हैं, कभी बैठे-बैठे नहीं चुने गए सो खड़े रहना हमारा धर्म है. पार्टी के लोगों ने समझाया कि ठीक है खड़े रहो मगर चिल्ला-चोट तो न करो तो वे फिर चिल्लाये, चिल्लाना भी हमारा नैतिक कर्तव्य है क्योंकि चिल्लाते-चिल्लाते, नारे लगाते-लगाते ही हम यहाँ पहुँचे हैं.

उनकी बात सही भी लगती है. पहले तो पार्टी ने उनको चिल्लाने के, शोर मचाने के अवसर उपलब्ध करवाए, फिर उनको खड़ा भी किया. एक बार नहीं कई-कई बार खड़ा किया. अब जब व्यक्ति को खड़ा रहने की आदत पड़ ही गई है तो वो खड़ा ही रहेगा, चाहे पार्टी के पक्ष में खड़ा हो अथवा पार्टी के विरोध में. पार्टी को भी बहुत देर में ये बात समझ में आई कि उनका खड़ा होना, चिल्लाना न तो कम होने वाला है और न ही थमने वाला है तो पार्टी ने इसका हल निकालने का विचार बनाया. संशय में पड़ी पार्टी अब फिर से संशय में है कि खड़े किये गए शत्रु को अब किस तरह बैठाने की व्यवस्था की जाये. यदि इस खड़े व्यक्ति को बैठाया न गया तो लगातार बवाल करता रहेगा. कभी अपनी पार्टी के विरोध में हल्ला करेगा, कभी जाकर विरोधियों के सुर से सुर मिलाकर उनके साथ खड़ा होगा. पार्टी है कि उन्हें बैठने के लिए कोई कुर्सी देने के मूड में नहीं है और वे भी बिना जगह लिए बैठने के मूड में नहीं हैं. ऐसे में पार्टी और उनके शुभचिंतकों ने बीच की राह खोजी है, जिससे मित्ररुपी शत्रु के बैठने का इन्तेजाम भी हो जाये और पार्टी को भी कोई कुर्सी खाली न करनी पड़े. मध्यस्थ लोगों की राय से प्रसन्न होकर पार्टी ने एक धरने की तैयारी कर ली है, जहाँ खड़े हुए असंतुष्टों को बैठने का, चीखने का अवसर दिया जायेगा. वे भी प्रसन्न हैं कि चलो पार्टी ने कहीं तो उनको बैठाने का, चिल्लाने का इंतजाम किया. बैठने की, चिल्ला-चोट करने की इस आधुनिक, तात्कालिक व्यवस्था से वे भी खुश हैं और पार्टी भी राहत की सांस लेती दिख रही है. 



उक्त व्यंग्य दिनांक - 19.01.2016 के दैनिक हिंदुस्तान समाचार-पत्र के सम्पादकीय पृष्ठ पर 'नश्तर' कॉलम में प्रकाशित किया गया है. 

गुरुवार, 26 नवंबर 2015

प्रकृति के नियम में भी असहिष्णुता

जो ऊपर जायेगा वो नीचे भी आएगा, जो कहीं चढ़ा है वो वहाँ से उतरेगा, ये प्रकृति का नियम है. इधर देखने में आ रहा है कि प्रकृति के इस नियम ने अपने आपको माहौल के अनुसार ढाल लिया है. अब देखिये न, कई-कई वस्तुओं के दाम एक-एक करके लगातार अपने आपको ऊपर ले जा रहे हैं किन्तु नीचे आने का नाम ही नहीं ले रहे हैं. दाल ने अपने रूप को विकराल करना शुरू किया तो फिर थामा ही नहीं. देखादेखी अब टमाटर गुस्से के मारे लाल होकर लगातार दाल के समकक्ष खड़ा होने का मन बनाने लगा है. हालाँकि बीच-बीच में प्याज ने उठने की कोशिश की किन्तु उसने प्रकृति के नियम का पालन करते हुए वापस आने में ही भलाई समझी. दाल, टमाटर की बढ़ती कीमतों के न घटने वाले स्वरूप से जैसे-तैसे समझौता करके मान लिया गया कि ये वापस अपने रूप में लौटने वाले नहीं हैं. मन को संतोषम परम सुखम की घुट्टी पिलाकर इनको इसी वर्तमान स्वरूप में ग्रहण करना शुरू कर लिया गया.

अभी देह को मंहगाई के झटकों से कुछ राहत मिलने का एहसास होने ही वाला था कि कुछ और जगह से रूप विस्तार की खबरें आनी शुरू हो गईं. देश को स्वच्छ करने के नाम पर रेलवे ने नागरिकों की जेबें साफ़ करने का मंतव्य स्पष्ट किया. देश को स्वच्छ रखने की जिम्मेवारी रेलवे ने अपने यात्रियों के सिर मढ़ दी. अब यात्रा किराये के बढ़ते स्वरूप को तो वापसी करनी ही नहीं है भले ही प्रकृति का नियम चाहे जो कुछ बना रहे. प्रकृति से लगातार इस तरह की छेड़छाड़ करने वाले किसी भी रूप में समाज का भला नहीं कर सकते.


इस बात की भी सम्भावना है कि या तो प्राकृतिक नियम को खरीद लिया गया है या फिर वो भी जन-विरोधी हो गई है. देखा जाये तो ये भी एक तरह की भक्ति है और शायद इसी भक्ति में प्रकृति का ये नियम अपनी सहिष्णुता खो बैठा है. वैसे इस असहिष्णुता के माहौल में, जबकि सब कुछ जन-विरोधी होता दिख रहा है, एकमात्र शराब ही ऐसी सहायक सामग्री है जो प्रकृति के नियम का अक्षरशः पालन कर रही है. पूरे सुरूर में चढ़ती है तो उसी सुरूर में उतर भी जाती है. 

बुधवार, 4 नवंबर 2015

स्वागत हो आने वाले का

एक उम्र के बाद हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि बढ़ती आयु में उसके घर-परिवार वाले उसका ख्याल रखें. इस अभिलाषा के मोहपाश में सभी घिरे होते हैं, वो चाहे अमीर हो अथवा गरीब, राजा हो अथवा फ़कीर, दयालु हो या क्रूर, निरपराध हो या फिर अपराधी. यदि इसी अभिलाषा के चलते छोटा सा राजन वापस घर आने की तत्परता दिखा रहा है तो इसमें बुरा क्या है? एक तो उसकी उम्र बढ़ती जा रही है, जिसके लिए उसे सहारे की आवश्यकता है. दूसरे उसके काम भी इतने महान रहे हैं कि सहारा देने वाले उसको टपकाने में कुछ कमी नहीं रखेंगे. इसके अलावा वो एक बात विशेष रूप से जानता है कि सम्पूर्ण विश्व में हमारे देश में चिकित्सा सेवा भले ही वैश्विक स्तर पर किसी भी श्रेणी की हो पर चिकित्सकीय खर्चों में हम सबसे कम खर्चीले देश में शुमार किये जाते हैं. चिकित्सा सेवा के साथ-साथ अतिथि देवो भव, सर्वे भवन्तु सुखना, वसुधैव कुटुम्बकम जैसे अमर वाक्यांशों के चलते हमारे देश की मेहमाननवाजी की अपनी ही विशिष्टता है. उस पर भी यदि ये सारी सुविधाएँ सरकारी खर्चों पर उपलब्ध हो जाएँ तो फिर सोने पर सुहागा हो जाता है. अब ऐसे में उस बेचारे मासूम से छोटे ने घर वापसी का मन बना लिया है तो हम सभी को उसका स्वागत करना चाहिए. 

स्वागत इस कारण से भी किया जाना चाहिए कि कल को पता नहीं कि किस काले कोट वाले की बुद्धि की कृपा पाकर वो देश की सडकों पर स्वतंत्र, निरपराधी बना टहलता मिले; क्या पता किस राजनैतिक दल की नज़रें इनायत हों और वह सांसद, विधायक, मंत्री बना हम पर शासन करता दिखे; क्या पता किस विमर्शवादी की चपेट में आकर शांति के नोबल पुरस्कार हेतु नामित दिखे. वैसे भी मृत्यु तो सबको ही आनी है, उसे भी आएगी, उससे पहले वो जिस प्रशासन से तमाम उम्र भागता रहा, कुछ वर्ष उसी प्रशासन की सुख-सुविधाओं में, छत्र-छाया में गुजार कर मौज मना ले तो क्या बुराई है? मरने के बाद अपने घर की मिट्टी में मिल जाना भी उसके लिए कम सुखद नहीं रहता जो ताउम्र घर से बाहर ही कामधाम करता रहा हो. 

आइये हम सब उसकी इच्छा का सम्मान करते हुए उसके आतिथ्य के लिए अपने को सहज भाव से तत्पर करें, क्या पता कल को उसकी मृत्यु के बाद उसकी समाधि तीर्थस्थल ही बन जाये?

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

शाब्दिक विकृति से बचने की आवश्यकता है


भूमंडलीकरण के इस दौर में संचार-साधनों ने अपनी उपयोगिता को सिद्ध किया है. सूचना युग होने के कारण से संचार माध्यमों की महत्ता जनसम्पर्क के लिए और बढ़ जाती है. जनसंचार क्रांति के इस दौर में जहाँ संचार-माध्यमों ने विकास किया है वहीं ये भी माना जा रहा है कि हिन्दी ने भी उत्तरोत्तर अपना विकास किया है. अंग्रेजी को आज भले ही विश्वव्यापी संपर्क भाषा के रूप में स्वीकार किया जा रहा हो किन्तु इसके साथ-साथ हिन्दी ने भी वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई है. बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने हिन्दीभाषियों के मध्य अपने उत्पादों के लिए व्यापक बाज़ार देखने के बाद हिन्दी को महत्त्व देना आरम्भ किया है. उन्होंने अपने यहाँ के कर्मचारियों, अधिकारियों को हिन्दी सीखने के निर्देश दिए साथ ही ऐसी कंपनियों के विज्ञापन हिन्दी में देखे जा सकते हैं. सबसे बड़ी बात ये है कि ऐसा सिर्फ भारत में नहीं वरन विदेशों में भी हो रहा है. 

बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हिन्दी-प्रेम के बाद इंटरनेट ने भी हिन्दी को विकसित होने के पर्याप्त अवसर प्रदान किये. सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों के द्वारा हिन्दीभाषियों ने अपनी भाषा में अपनी विचाराभिव्यक्ति करके हिन्दी को समृद्ध करने का कार्य किया. आस-पड़ोस की घटना हो या फिर प्रादेशिक-राष्ट्रीय स्तर की कोई खबर, सोशल मीडिया के कारण वो तुरंत हमारे-आपके बीच उपस्थित होती है और वो भी हमारी अपनी भाषा में. इसके अतिरिक्त हिन्दी साहित्य को लेकर भी समृद्धता देखने को मिली है. शब्द-भंडार में वृद्धि हुई है, रचनाओं की बहुलता देखने को मिली है, दुर्लभ रचनाओं ने परदे के पीछे से निकल कर इंटरनेट पर अपना स्थान बनाया है. हिन्दी न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिष्ठित हुई है.

इस प्रतिष्ठा के बाद भी कभी-कभी लगता है कि जनसंचार माध्यमों ने हिन्दी के साथ दोहरा रवैया अपनाया हुआ है. एक तरफ हिन्दी के विकास को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं; इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा हिन्दी को लेकर सकारात्मकता दिखाई जाती है; मीडिया में बड़े-बड़े आयोजन हिन्दी को लेकर किये जाते हैं; सितम्बर माह आते ही हिन्दी भाषा की याद सभी को सताने लगती है किन्तु वास्तविकता में एहसास होता है कि यही माध्यम हिन्दी को दोयम दर्जे का बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं. हिन्दी के साथ नकारात्मक रवैया अपनाने में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ-साथ प्रिंट मीडिया भी शामिल है. जिस तेजी से भूमंडलीकरण ने, वैश्वीकरण ने अपने पैर पसारे हैं, जिस तेजी से औद्योगिकीकरण ने आम आदमी में सहज उपस्थिति बना ली है, जिस तरह से आधुनिकता ने समाज में अपनी स्वीकार्यता बना ली है उसमें अपेक्षा की जाती है कि आम आदमी भी तकनीकी रूप से समृद्ध हो. इसका सीधा सा तात्पर्य उपकरणों के प्रयोग के साथ-साथ भाषाई जड़ता से मुक्ति पाने से भी लगाया जाता है. देखने में आया है कि तकनीकी रूप से मानव ने समृद्ध होकर उपकरणों पर अपनी निर्भरता बहुत अधिक बना ली है वहीं नई युवा पीढ़ी ने भाषाई जड़ता को तोड़ते हुए भाषा के सभी बने-बनाये मानदंडों को ध्वस्त कर दिया है, हालाँकि ऐसा अंग्रेजी भाषा के साथ बहुतायत में हो रहा है जहाँ कि इसका उपयोग मोबाइल सन्देश में, सोशल मीडिया के अन्य दूसरे माध्यमों में किया जा रहा है. हिन्दी में ये आज़ादख्याल युवा विखंडन की स्थिति को पैदा नहीं कर सके हैं, ये अलग बात है कि इनका रुझान बजाय हिन्दी भाषा के अंग्रेजी भाषा की तरफ बढ़ा है. हिन्दी में इस तरह की नकारात्मक स्थिति को, भाषाई विखंडन, भाषाई विद्रूपता की स्थिति को हिन्दी माध्यमों के संचार-साधनों ने बढ़ाया है.

जनसंचार माध्यमों में चाहे प्रिंट मीडिया रहा हो अथवा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, दोनों में हिन्दी भाषा के प्रति उपेक्षा का भाव बना हुआ है. यद्यपि ये देखने में अवश्य आ रहा है कि इनके द्वारा हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है; कार्यक्रम, समाचार, विज्ञापन आदि हिन्दी भाषा में दिखाए-प्रकाशित किये जा रहे हैं तथापि उनकी भाषा में ही विसंगति उत्पन्न करके हिन्दी भाषा की उपेक्षा सी की जा रही है. हिन्दी-भाषी समाचार-पत्रों में, समाचार चैनलों में हिन्दी के स्थान पर जबरन अंग्रेजी के शब्दों को ठूंस कर, वाक्य संरचना विकृत करके, वाक्य-विन्यास बिगाड़ कर, वर्तनी की अशुद्धियों के द्वारा, भाव-बोध, क्रिया-बोध को अशुद्ध रूप में प्रस्तुत करके हिन्दी भाषाई अवमूल्यन का बोध कराया जा रहा है. चंद उदाहरण से इसे सहजता से समझा जा सकता है.

यूनिवर्सिटी के वी०सी० हटाये गए. (विश्वविद्यालय के स्थान पर यूनिवर्सिटी और कुलपति के स्थान पर वी०सी० का प्रयोग). एस०सी०/एस०टी० विद्यार्थियों को एडमीशन के लिए निशुल्क फॉर्म वितरण. (अनुसूचित जाति/जनजाति के स्थान पर एस०सी०/एस०टी० का, प्रवेश के स्थान पर एडमीशन तथा आवेदन-पत्र के स्थान पर फॉर्म का प्रयोग किया जाना). तालाब में लाश तैरती पाई गई. (यहाँ क्रियात्मक त्रुटि है, लाश बेजान है जो सकर्मक क्रिया नहीं कर सकती, जबकि तैरना सकर्मक क्रिया है.). मजिस्ट्रेट द्वारा भगाई गई लड़की का बयान दर्ज किया गया. (यहाँ क्रम विपर्यय और अंग्रेजी शब्द का प्रयोग है, शुद्ध वाक्य भगाई गई लड़की का बयान न्यायाधीश द्वारा दर्ज किया गया होना चाहिए). महिला लेखिकाओं ने गोष्ठी में विचार व्यक्त किये. (लेखिकाओं होने के बाद महिला की आवश्यकता नहीं रह जाती है). अनेकों नागरिकों ने जन-धन योजना में खाता खुलवाया. (अनेक अपने आपमें बहुवचन है और उसका बहुवचन बनाना शाब्दिक विकृति ही कही जाएगी). गंगा खतरे के निशान से ऊपर. (यहाँ शब्द लोप है, गंगा नदी का प्रयोग होना चाहिए था)

उज्ज्वल के स्थान पर उज्जवल, संन्यासी के स्थान पर सन्यासी, तत्त्व के स्थान पर तत्व, पूजनीय के स्थान पर पूज्यनीय आदि का प्रयोग किया जाना बहुतायत में हो रहा है, जो सर्वथा गलत है. अनुस्वार और अनुनासिका लगाने में किसी तरह का भेद नहीं किया जा रहा है. अनुनासिका के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग सहजता से होते देखा जा रहा है. इसके अलावा वर्तनी की अशुद्धियाँ, शाब्दिक अशुद्धियाँ बहुतायत में देखने को मिलती हैं. यद्यपि लोगों द्वारा इन गलतियों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है तथापि भाषाई दृष्टि से ऐसा होना गलत और निंदनीय है.

भाषाई सम्पन्नता का अर्थ यह नहीं है कि शब्दों का प्रयोग किसी भी रूप में होने लगे, भले ही वे बहुतायत में प्रयुक्त हो रहे हों. भाषाई समृद्धता का अर्थ भाषा के, शब्दों के उचित क्रियान्वयन से है. यदि हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो कहीं न कहीं भाषाई रूप से अपनी विपन्नता को प्रकट कर रहे हैं. इसके पीछे हमारा अपनी भाषा से दूर होते जाना है. यही कारण है कि आज हम हिन्दी में बातचीत करते समय हर दो-तीन शब्दों के बाद अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करते हैं. हिन्दी भाषा का, हिन्दी शब्दों का प्रयोग करना फूहड़ता नहीं है; विदेशी भाषा के शब्दों का प्रयोग करना हमारी मानसिक विकृति को नहीं दर्शाता है बशर्ते कि हम भाषा का, शब्दों का सही ढंग से प्रयोग कर रहे हों. जनसंचार माध्यमों, विशेष रूप से प्रिंट माध्यमों को इस बात को समझना होगा कि हम आज भी आधुनिकता के इस दौर में किसी भी प्रकाशित कागज को माँ सरस्वती के रूप में देखते हैं; उस पर पैर लग जाने पर उसे सम्मान से माथे पर लगाते हैं, ऐसे में उनकी जिम्मेवारी बनती है कि वे भाषाई शुद्धता का विशेष ख्याल रखें. उन्हें समझना होगा कि यदि आज वे इस तरह की भाषाई विकृति पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करेंगे तो वे भविष्य की एक पीढ़ी को न केवल भाषाई विकास से अछूता कर रहे हैं बल्कि कहीं न कहीं उनमें हिन्दी भाषाई विपन्नता भी पैदा कर रहे हैं.
 


बुधवार, 9 सितंबर 2015

मत रोना मुझे चाहने वालो, मैं चलती हूँ

मत रोको मुझे रोकने वालो, मैं चलती हूँ.

मत रोना मुझे चाहने वालो, मैं चलती हूँ.
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अंश थी मैं वीणावादिनी का, ऋग्वेद की एक ऋचा थी,
रूद्र जटाओं से जो निकली, वो लहर थी सुर सरिता की,
रूप कोई हो, रंग कोई हो, हर स्वरूप में मैं बसती हूँ,
मत रोको मुझे रोकने वालो, मैं चलती हूँ.
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संगीत मेरा अस्तित्व बनेगा, शब्द मेरी पहचान बनेंगे,
मेरे गीत, ग़ज़ल और कविता, कोटि-कोटि कंठों में सजेंगे,
सुर में, लय में और ताल में, धुन बन कर मैं सजती हूँ,
मत रोको मुझे रोकने वालो, मैं चलती हूँ.
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नश्वरता में न खोजो मुझको, अंतर्मन में देखो मुझको,
मनसा, वाचा और कर्मणा की दुनिया में खोजो मुझको,
प्रेम, स्नेह, आदर, सम्मान के, रिश्तों में मैं पलती हूँ,
मत रोको मुझे रोकने वालो, मैं चलती हूँ.
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आज (09-09-2015) डॉ० वीना श्रीवास्तव 'वीणा' आंटी की त्रयोदशी-संस्कार था. ऐसा लगा जैसे वे अप्रत्यक्ष रूप से सबको एक सन्देश दे रही हों....